लेखक: प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
रसोई का गणित सरकार के अर्थशास्त्र से क्यों नहीं मिलता?
महंगाई को समझना हो तो अर्थशास्त्र नहीं, किराने की दुकान जाइए
रसोई का दरवाजा खुलते ही आज सबसे पहले बजट नजर आता है। चीनी महँगी है, तेल जेब का हिसाब बिगाड़ रहा है, दाल का हर निवाला सोचकर खाना पड़ रहा है और सब्जियों के बढ़ते दाम थाली का संतुलन बिगाड़ रहे हैं। दूध की मलाई अब सामान्य सुविधा नहीं रही। महंगाई ने सवाल बदल दिया है—पहले पूछा जाता था, आज क्या पकाएँ; अब सोचना पड़ता है, क्या छोड़ें। रोटी अब सिर्फ भोजन नहीं, मासिक बजट का हिस्सा बन गई है। जरूरी चीजें महँगी हों तो सबसे पहले बचत घटती है, फिर इच्छाएँ सीमित होती हैं। सहनशीलता को ताकत कहा जाता है, लेकिन लगातार बढ़ती कीमतों के बीच वही मजबूरी बन जाती है।
सरकारी दावों और बाजार की हकीकत के बीच दूरी साफ दिखती है। महंगाई नियंत्रण में होने की बात कही जाती है, लेकिन किराने की दुकान पर उसका असर नहीं दिखता। आँकड़े प्रतिशत में राहत दिखा सकते हैं, पर परिवार का बजट रुपये में चलता है। दाल महँगी हो तो वैश्विक कारण, तेल बढ़े तो अंतरराष्ट्रीय बाजार का हवाला मिलता है। सवाल है, सस्ताई के समय यही वैश्विक परिस्थितियाँ असरदार क्यों नहीं दिखतीं? आम आदमी बिना किसी आर्थिक डिग्री के महंगाई समझता है। चीनी, तेल, दूध और प्याज के भाव से वह महीने का अनुमान लगाता है। उसके लिए महंगाई कोई आर्थिक शब्द नहीं, रोज का अनुभव है। यही सरकारी भाषा और रसोई की भाषा के बीच बढ़ते भरोसे के अंतर की वजह है। RBI के आंकड़े भी इस अंतर को उजागर करते हैं।
महंगाई ने ऐसा मध्यमवर्ग खड़ा कर दिया है जिसकी आय स्थिर है, लेकिन जरूरतों की कीमत लगातार बढ़ रही है। कागज पर वह गरीब नहीं, पर महीने के अंत में आय-व्यय का हिसाब उसे असुरक्षित कर देता है। घरों में अब बच्चों को उन दिनों की सस्ती चीजों के बारे में बताना पड़ता है, जो कभी सामान्य थीं। ‘सस्ता’ शब्द धीरे-धीरे अनुभव से निकलकर स्मृति बन रहा है। महंगाई का असर सिर्फ थाली पर नहीं, बचत, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की योजनाओं पर भी पड़ता है। आय का बड़ा हिस्सा जरूरी खर्च में जाए तो सपनों की जगह अपने आप छोटी हो जाती है। इस दबाव को केवल औसत आँकड़े पूरी तरह नहीं समझा सकते।
महंगाई पर नियंत्रण के उपायों की कमी नहीं, लेकिन नतीजे सीमित हैं। गोदाम खोलने, आयात बढ़ाने, जमाखोरी पर कार्रवाई, बैठकों और घोषणाओं की खबरें आती रहती हैं। सरकारें कदम उठाती हैं, लेकिन उपभोक्ता को राहत तभी मिलती है जब बाजार की कीमत घटे। चुनावों में महंगाई रोकने के वादे होते हैं, फिर कुछ समय बाद वही चिंता लौट आती है। समस्या यह नहीं कि सरकार कुछ नहीं करती, बल्कि यह है कि प्रयास और आम आदमी को मिली राहत के बीच दूरी बनी रहती है। नियंत्रण की घोषणा तभी सार्थक है, जब उसका असर किराने की सूची पर दिखे। चीनी की पुड़िया और तेल की बोतल भाषण नहीं, कीमत समझते हैं।
महंगाई ने परिवार की बातचीत और प्राथमिकताएँ बदल दी हैं। पहले घरेलू बजट एक व्यवस्था था, अब वह बदलती कीमतों से जूझता हिसाब बन गया है। पत्नी सब्जी, तेल और चीनी का अनुमान लगाती है, पति वेतन और बाकी खर्च का। समस्या एक ही है—जरूरतें अनेक, पैसा सीमित। कई परिवारों को भोजन की गुणवत्ता, बचत और छोटी इच्छाओं में से चुनाव करना पड़ता है। महंगाई सिर्फ चीजें महँगी नहीं करती, परिवार के फैसले भी बदलती है। आय का बड़ा हिस्सा जरूरी खर्च में जाए तो शिक्षा, स्वास्थ्य, यात्रा और आकस्मिक जरूरतों के लिए पैसा कम पड़ता है। यही रोजमर्रा का दबाव महंगाई को आर्थिक से बढ़ाकर सामाजिक समस्या बनाता है।
बढ़ती कीमतों ने आर्थिक दूरी को समझने का तरीका बदल दिया है। अब केवल आय नहीं, यह भी देखना जरूरी है कि उस आय से परिवार कितनी जरूरतें पूरी कर पा रहा है। महंगाई का असर गरीब पर सबसे तीखा है, क्योंकि उसकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन और जरूरी वस्तुओं पर खर्च होता है। मध्यमवर्ग भी इससे अछूता नहीं, क्योंकि उसकी बचत और भविष्य की योजनाएँ प्रभावित होती हैं। रिश्तेदारों और मित्रों की बातचीत में भी अब दाम जगह बना चुके हैं—तेल कहाँ सस्ता है, सब्जियाँ किस बाजार में कम हैं, दाल कितने की है। महंगाई ने सिर्फ बाजार नहीं, लोगों की प्राथमिकताएँ और बातचीत भी बदल दी हैं।
अर्थशास्त्र के सिद्धांत अपनी जगह हैं, लेकिन महंगाई की असली परीक्षा घर की थाली में होती है। मांग-आपूर्ति, वैश्विक बाजार और मुद्रास्फीति जैसे शब्द तभी मायने रखते हैं, जब उनका असर परिवार के खर्च में साफ दिखे। विशेषज्ञ इसे अस्थायी बताते हैं, लेकिन लंबे समय तक बनी ऊँची कीमतें आम आदमी के लिए अस्थायी नहीं रह जातीं। लगातार बढ़ती लागत से बचत घटती है, खर्च की प्राथमिकताएँ बदलती हैं और भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ती है। इसलिए महंगाई को केवल आर्थिक सूचकांक मानना अधूरा होगा। असली तस्वीर यह है कि एक सामान्य परिवार अपनी आय से कितना भोजन, ईंधन, शिक्षा और बचत सुरक्षित रख पा रहा है। यही महंगाई का वास्तविक असर है।
आम आदमी की परेशानी समझने का सबसे सीधा रास्ता उसकी रसोई से होकर जाता है। बड़ी घोषणाओं की सफलता तभी मानी जाएगी, जब रोजमर्रा की जरूरी चीजें उसकी पहुँच में रहें। नियंत्रण की बातें तभी भरोसा जगाएँगी, जब उनका असर बाजार में दिखे। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए चीनी, तेल, दाल, दूध और सब्जियाँ मामूली वस्तुएँ नहीं, बुनियादी जरूरतें हैं। इनके दाम बढ़ते हैं तो सबसे पहले भोजन, फिर बचत और अंततः भविष्य प्रभावित होता है। आम आदमी को भाषण नहीं, राहत चाहिए। उसकी आवाज आँकड़ों में नहीं, थाली में सुननी होगी। जब तक जरूरी चीजें उसकी पहुँच में नहीं आतीं, महंगाई पर नियंत्रण का दावा अधूरा रहेगा।

