लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता जमशेदपुर
जमशेदपुर के सिदगोड़ा थाना क्षेत्र में प्रशासन और टाटा स्टील की संयुक्त कार्रवाई के बाद जमीन विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। बुधवार को शिव सिंह बागान सी रोड स्थित विवादित जमीन पर हुई इस कार्रवाई ने स्थानीय निवासियों और प्रशासन के बीच तनाव बढ़ा दिया है। यह मामला न केवल जमीन के स्वामित्व बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया और न्यायिक समयसीमा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
पृष्ठभूमि: दशकों पुराना विवाद
जमशेदपुर में टाटा स्टील की स्थापना के बाद से ही भूमि अधिग्रहण और अतिक्रमण के मामले सामने आते रहे हैं। शिव सिंह बागान क्षेत्र में कई परिवार पीढ़ियों से रह रहे हैं, जबकि कंपनी का दावा है कि यह जमीन उनकी लीज का हिस्सा है। वर्ष 2009 से यह मामला न्यायालय में लंबित है, जिससे दोनों पक्षों में अनिश्चयता बनी हुई है।
विवादित जमीन पर संयुक्त कार्रवाई का ब्यौरा
सिदगोड़ा थाना क्षेत्र के शिव सिंह बागान सी रोड स्थित विवादित जमीन पर बुधवार को प्रशासन और टाटा स्टील की संयुक्त कार्रवाई के बाद मामला फिर चर्चा में आ गया। प्रशासनिक टीम की मौजूदगी में स्थल को कथित कब्जे से मुक्त कराने की कार्रवाई की गई। इस दौरान बुलडोजर चलाए जाने की भी जानकारी सामने आई है।
विरोधी पक्ष का दावा
कार्रवाई का विरोध कर रहे पक्ष का दावा है कि जमीन को लेकर वर्ष 2009 से न्यायालय में विवाद लंबित है और कई परिवार करीब चार दशक से वहां मकान बनाकर रह रहे हैं। उनका कहना है कि पूर्व में संबंधित मामलों में उनके पक्ष में न्यायालय अथवा प्रशासनिक स्तर से आदेश भी पारित हुए हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
कानूनी आधार पर सवाल
विरोध कर रहे पक्ष के अधिवक्ता ने कार्रवाई के कानूनी आधार पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को निर्धारित है। ऐसे में सुनवाई से कुछ दिन पहले कार्रवाई किस न्यायालयी अथवा प्रशासनिक आदेश के आधार पर की गई, यह स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने कार्रवाई की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
प्रशासन और कंपनी का पक्ष
दूसरी ओर, जमीन के वास्तविक स्वामित्व, कब्जे और प्रशासनिक कार्रवाई की वैधानिकता को लेकर अंतिम स्थिति राजस्व अभिलेखों, न्यायालयी आदेशों और प्रशासनिक दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल इस कार्रवाई को लेकर विरोध कर रहे पक्ष और प्रशासन के संभावित आधिकारिक पक्ष के बीच तथ्य सामने आना महत्वपूर्ण है। विशेषकर 20 अगस्त की न्यायालयी सुनवाई से पहले जो हुई कार्रवाई का आधार क्या था और प्रशासन के पास कौन-से आदेश अथवा दस्तावेज थे, यह सवाल पूरे विवाद के केंद्र में है।
टाटा स्टील का बयान
कंपनी के अनुसार जमीन पर चारदीवारी बनाने का भी प्रयास किया जा रहा था। इसके बाद कंपनी ने अतिक्रमण हटाने और जमीन की सुरक्षा के लिए जिला प्रशासन से सहयोग मांगा। धालभूम एसडीओ के आदेश पर बुधवार को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की गयी। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मौके पर मजिस्ट्रेट और पुलिस बल की तैनाती की गयी थी। टाटा स्टील ने कहा कि कंपनी न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करती है और जमीन से जुड़े सभी मामलों का निपटारा कानून के अनुसार ही किया जाएगा। कंपनी ने अपनी संपत्ति की सुरक्षा और अतिक्रमण रोकने के लिए जिला प्रशासन एवं पुलिस को सहयोग जारी रखने की बात कही है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का मानना है कि जब मामला न्यायालय में विचाराधीन हो, तब किसी भी पक्ष द्वारा यथास्थिति बदलने की कार्रवाई न्यायालय की अवमानना के दायरे में आ सकती है। हालांकि, यदि प्रशासन के पास अतिक्रमण हटाने का स्वतंत्र आदेश हो, तो कार्रवाई वैध मानी जा सकती है। इस संबंध में झारखंड भूमि राजस्व विभाग के अभिलेख निर्णायक साबित होंगे।
आगे क्या?
अब सभी की निगाहें 20 अगस्त की न्यायालयी सुनवाई पर टिकी हैं। उस दिन न्यायालय न केवल जमीन के स्वामित्व बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई की वैधानिकता पर भी अपना रुख स्पष्ट कर सकता है। तब तक क्षेत्र में तनाव बरकरार रहने की आशंका है, जिसे देखते हुए पुलिस बल की तैनाती जारी है।

