लेखक: इंद्र यादव
कल्याण पश्चिम के संदीप होटल से खड़कपाड़ा इलाके में रविवार दोपहर से एक आवारा सफेद कुत्ते ने ऐसा धमाल मचाया कि पूरा इलाका थर-थर कांप उठा। महज 7 घंटे में करीब 125 से 130 लोगों को उसने काट लिया। मतलब हर दो-तीन मिनट में एक शिकार! बच्चे, बुजुर्ग, राहगीर… कोई नहीं बचा।
आवारा सफेद कुत्ते का 7 घंटे का आतंक
रुक्मिणीबाई अस्पताल में मरीजों की कतार लग गई। डॉक्टरों के मुताबिक अकेले उस दिन 48 मामले वहां पहुंचे, बाकी प्राइवेट अस्पतालों में भाग गए। कई बच्चों के गहरे घाव हो गए। एक छोटी लड़की (रिपोर्ट्स में 11 साल या आसपास की उम्र बताई जा रही है) की हालत गंभीर बताई गई और उसे बेहतर इलाज के लिए सायन अस्पताल रेफर किया गया। बाकी लोगों को एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगाए गए।
अस्पतालों में मची भगदड़ और गंभीर मामले
अब सवाल यह है कि यह कुत्ता इतना बहादुर कैसे हो गया? क्या उसे कोई ‘सुपरपावर’ मिल गई थी या फिर हमारे नगर निगम और प्रशासन की लापरवाही ने उसे यह मौका दे दिया? सालों से आवारा कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण और नियंत्रण की बातें होती रहती हैं, लेकिन जब असल में जरूरत पड़ती है तो टीम देर रात तक खोजती फिरती है। आखिरकार प्रशासन, पुलिस और स्थानीय लोगों ने मिलकर देर रात करीब 1:30 बजे उस कुत्ते को पकड़ा। तब तक नुकसान हो चुका था।
प्रशासन की लापरवाही और देरी से कार्रवाई
मुंबई में भी बीएमसी वाले कुत्ते पकड़ते नजर आए। अच्छा है, कम से कम दिखने के लिए तो कुछ कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि कब तक सिर्फ ‘दिखाने’ वाले काम चलेंगे? आवारा कुत्तों की समस्या सालों पुरानी है। हर महीने सैकड़ों काटने के मामले आते हैं, फिर भी व्यवस्था वैसी की वैसी। लोग सड़क पर निकलने से डर रहे हैं, बच्चे खेलने नहीं जा पा रहे, और प्रशासन फाइलों में रिपोर्ट लिखता रहता है। अधिक जानकारी के लिए WHO रेबीज़ फैक्ट शीट देखें।
व्यवस्थागत नाकामी का आईना
यह घटना सिर्फ एक कुत्ते की नहीं है। यह हमारी व्यवस्था की नाकामी का आईना है। जहां कुत्ते 7 घंटे तक ‘फ्री हैंड’ से घूम-घूमकर काटते रहें और पकड़ने वाले रात को जागें, वहां सुरक्षा का दावा करना खुद पर मजाक कसने जैसा है।
कल्याण वाले अब भी डरे हुए हैं। उम्मीद है कि इस बार प्रशासन सिर्फ कुत्ता पकड़कर संतुष्ट नहीं होगा, बल्कि पूरे इलाके में नसबंदी और नियंत्रण का असली काम भी शुरू करेगा। वरना अगली बार कोई और कुत्ता ‘रिकॉर्ड’ तोड़ने निकलेगा।

