लेखक: कृष्ण कुमार निर्माण
अभी जेन-जी का आंदोलन पूरे देश ने देखा और आंदोलन के समाप्त होने के बाद भी अब तक राजनीतिक गलियारों में, मीडिया में और बुद्धिजीवियों में उसी जेन-जी के आंदोलन की चर्चा है, अलग-अलग तरह से, उसी आंदोलन पर अपने-अपने तरीके से बयानबाजी जारी है।
जेन-जी आंदोलन का ऐतिहासिक असर
निश्चित रूप से यह आंदोलन सदियों तक याद किया जाता रहेगा क्योंकि जहाँ इस आंदोलन ने सरकार को झुकाकर इतिहास रचा, वहीं आंदोलन की कार्यप्रणाली, नारे और तमाम तरह की बातों को लेकर यह आंदोलन विवाद का केंद्र बना और सम्भवतः बना रहेगा, पुलिस की कार्यप्रणाली पर बहुत सारे सवाल यह उठा गया और पीएम तक को जेन-जी की तरह रात को वीडियो बनाने पर विवश कर गया, जिसका जेन-जी द्वारा तरह-तरह के मीम बनाकर जमकर मजा लिया जा रहा है।
यह आंदोलन यह लकीर भी खींच गया कि जिस जेन-जी के बारे में हम लोगों का अलग विचार है, वह जेन-जी न केवल अपने अधिकारों के बारे में जागरूक है बल्कि देश में घट रही हर गतिविधि पर पैनी नजर रखता पर उसका आंदोलन करने का नजरिया भी बहुत अलग है।
यह सब देश के नेताओं, पार्टियों, अभिभावकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, विश्लेषकों, समाजविज्ञानियों, मनोवैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, साहित्यकारों को लंबे समय तक सोचने के लिए विवश करेगा, जो कि लोकतंत्र के लिए, समाज के लिए और देश के लिए अच्छा संकेत हैं।
इस आंदोलन की खास बात यह भी रही कि इसका अगुआ एक अनुसूचित जाति का लड़का रहा और उसमें तमाम जातियों, धर्मों के युवा शामिल थे।
जेन-अल्फा का स्वतः स्फूर्त आंदोलन
अभी इस आंदोलन को लोग दिमाग से नहीं निकाल पाए थे कि जेन-अल्फा ने देश के तीन राज्यों के तीन हिस्सों में आंदोलन करके नए भारत की तस्वीर पेश करने के साथ-साथ पूरी शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी।
बिहार के गया, उत्तरप्रदेश के फतेहपुर और राजस्थान के जालोर के जेन-अल्फा ने स्वतः स्फूर्त ऐसा आंदोलन किया कि वहाँ के एसडीएम, डीएम ने अपने कार्यक्रम न केवल बीच में छोड़ने पड़े बल्कि उनके आंदोलन को शांत करने के लिए अच्छे-खासे पापड़ बेलने पड़े।
गजब की बात यह रही कि जेन-अल्फा के आंदोलनों में कोई भी जाति-धर्म, लिंग का कोई मतभेद नहीं था, जैसा कि हमने जेन-जी के आंदोलन में देखा, यकीन मानिए यह नए भारत की तस्वीर की ओर इशारा करता प्रतीत होता है, जिसमें जाति-धर्म, मजहब, ऊंच-नीच, रंग-रूप, नस्ल भेद का कोई अवरोध नहीं है बस अपने अधिकारों की रक्षार्थ अपने तरीके का आंदोलन है, जिसमें गालियाँ भी प्रतीक हैं, नारे भी बिंब हैं और आपसी सहयोग इनका संस्कार है, हर बात का मजा जेन-जी और अल्फा को लेना आता है, आंदोलन को कैसे आगे बढ़ाना है, कैसे अपनी मांगों पर अड़े रहना है, इन्हें बड़ों से भी अच्छे से पता है?
जेन-अल्फा का आंदोलन तीनों राज्यों के तीनों हिस्सों में बिजली-पानी की व्यवस्था, मिड-डे-मील की खामियों आदि-आदि को लेकर था।
सम्भवतः समाधान कर दिया होगा लेकिन यह समाधान इतना भी आसान नहीं और इस पर कोई कड़ा कानून भी नहीं बनाया जा सकता।
व्यवस्थागत बदलाव की जरूरत
खैर, आलोचक अपने तरीके से दोनों की आलोचना करेंगे और खुले दिलों-दिमाग से देखने वाले दोनों को उसी तौर-तरीके से देखेंगे और यह चलता रहेगा, बस जो छूट जाएगा, वह यह कि जो सवाल इन दोनों आंदोलनों के द्वारा उठाए गए हैं, क्या उन सवालों पर संजीदगी से विचार किया जाएगा और पूरी शिक्षा व्यवस्था में कोई आमूलचूल परिवर्तन की ओर मिलकर कदम बढ़ाएंगे या फिर मेरी शर्ट से ज्यादा मैली तेरी शर्ट है, वाली कहावत चरितार्थ होती रहेगी, जो भविष्य के लिए अच्छा संकेत तो नहीं होगी?
क्योंकि फिलवक्त जो देखा जा रहा है, वह बहुत भयावह है क्योंकि कोई कुछ टिप्पणी कर रहा है, कोई कुछ बोल रहा है और गजब तो इस बात का भी हो रहा है कि गोदी मीडिया की इतनी फजीहत होने के बाद भी उसका रवैया नहीं बदला है बल्कि कुछ ज्यादा गोदियाना हो गया है।
शायद! गोदी मीडिया आँखें बंद किए हुए है और करीब-करीब यही हाल हमारे तमाम नेताओं/पार्टियों का हो चला है और जो बुद्धिजीवी, पत्रकार, जनप्रतिनिधि पक्षपाती हैं, वो उसी रौ में बह रहे हैं जो कि नितांत अनुचित है।
आइए! इन आंदोलनों से सबक लें और व्यवस्थागत बदलाव की ओर बढ़े।
अगर एक कदम भी बढ़े तो निःसन्देह यह बहुत बड़ी बात होगी। यह जरूरी है, बेहद जरूरी है।
आइए! पक्षपात के मुखौटे उतार फेंकें, पार्टियों के प्रति निष्ठा रखते हुए देश और देश की जनता की बात करें, नेताओं के प्रति वफादारी रखते जेन-जी और अल्फा की भाषा, भाव, भंगिमा को समझें, जानें और उनके हितों की ओर बढ़े, तमाम तरह के पूर्वग्रहों से बचते हुए कुछ सकारात्मक कदम उठाए जाने की सख्त जरूरत है।
कृष्ण कुमार निर्माण (शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, साहित्यकार, समीक्षक और स्तम्भकार)
करनाल, हरियाणा
9034875740

