लेखक: मृत्युंजय बर्मन
झारखंड की राजनीति में 9 अगस्त इस बार सिर्फ विश्व आदिवासी दिवस नहीं रहेगा। उसी दिन से केंद्र का ‘हर घर तिरंगा’ अभियान भी शुरू होगा और राज्य में भाजपा तिरंगा यात्रा के जरिए राष्ट्रवाद का संदेश देगी। दूसरी ओर झामुमो विश्व आदिवासी दिवस के मंच से आदिवासी अस्मिता, पहचान और अधिकार की अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करेगा। एक ही दिन दो प्रतीक आमने सामने होंगे, आदिवासी अस्मिता और राष्ट्रवाद।
विश्व आदिवासी दिवस का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
यहां तारीख का महत्व समझना जरूरी है। विश्व आदिवासी दिवस कोई राजनीतिक दल द्वारा तय किया गया अवसर नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने 1994 में 9 अगस्त को विश्व के आदिवासी लोगों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित किया था और 1995 से यह दिवस मनाया जा रहा है। झारखंड में, जहां आदिवासी पहचान राजनीति की प्रमुख धुरी रही है, 9 अगस्त का महत्व और बढ़ जाता है।
हर घर तिरंगा अभियान की टाइमिंग
दूसरी ओर इस वर्ष केंद्र सरकार ने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के लिए 9 से 17 अगस्त की अवधि तय की है। पिछले वर्ष अभियान 2 अगस्त से शुरू हुआ था। यानी 2026 में 9 अगस्त को अभियान का पहला दिन बनाया गया है। भाजपा की तिरंगा यात्रा इसी राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा है। इसलिए इसे केवल भाजपा द्वारा विश्व आदिवासी दिवस के सामने रखा गया कार्यक्रम कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन आदिवासी बहुल झारखंड में इसके राजनीतिक संदेश पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्योंकि 9 अगस्त को झामुमो अपनी सबसे मजबूत राजनीतिक जमीन, आदिवासी अस्मिता पर खड़ा होगा और भाजपा उसी दिन अपनी सबसे पहचानी जाने वाली राजनीतिक भाषा राष्ट्रवाद के प्रतीक तिरंगे के साथ मैदान में होगी।
प्रतीकों की प्रतिस्पर्धा
दिलचस्प बात यह है कि दोनों पक्षों के लिए दूसरे के प्रतीक से पूरी तरह दूरी बनाना भी संभव नहीं है। भाजपा आदिवासी समाज से दूरी का संदेश नहीं चाहती और झामुमो तिरंगे के सम्मान से पीछे हटने की छवि नहीं बना सकता। यही वजह है कि 9 अगस्त की राजनीति सीधे टकराव से ज्यादा प्रतीकों की प्रतिस्पर्धा बनती दिखाई देती है।
चम्पाई सोरेन का प्रसंग
सरायकेला में चम्पाई सोरेन का प्रसंग इस तस्वीर में एक अलग रंग भरता है। लंबे समय तक झामुमो की राजनीति करने के बाद अब भाजपा के विधायक बने चम्पाई सोरेन राजनगर में विश्व आदिवासी दिवस मनाने की तैयारी में हैं। यह घटनाक्रम अपने आप में बताता है कि आदिवासी अस्मिता की रेखा राजनीति दल की सीमाओं से बड़ी है।
निष्कर्ष: पहचान बनाम राष्ट्रवाद
इसलिए 9 अगस्त का सवाल केवल यह नहीं कि कौन कौन-सा कार्यक्रम कर रहा है। असली सवाल यह है कि झारखंड के मतदाता के सामने कौन-सा नैरेटिव अधिक प्रभावी होगा पहचान का या राष्ट्रवाद का? और शायद यही 9 अगस्त की सबसे दिलचस्प सियासत है एक ही दिन, दो प्रतीक; दोनों के अपने दावे, और दोनों को एक-दूसरे की जमीन पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की जरूरत।

