समाधि के फूल
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मेरी मृत्यु के दिन
तुम सिसक-सिसक कर मत रोना,
मैं अब और तुम्हें परेशान नहीं करूँगी।
मेरी परिचित हवा की बयार से पूछोगे,
तो तुम्हें पता चल जाएगा मेरी अंतिम यात्रा का हाल।
आधी रात तक जगकर
प्रेम, कोमलता और कविताओं से खेल खेलने के लिए,
मैं अब और तुम्हें परेशान नहीं करूँगी।
जीवन की दहकती आग में हाथ सेंककर
मेरे लिए तुम दुखी मत होना,
सिसक-सिसक कर मत रोना तुम।
जैसे सागर अपनी लहरों को समेट कर रखता है,
वैसे ही अपने दुखों को समेट कर रख लेना।
मेरी पुरानी अलमारी में
दिल के दर्द के साथ स्मृतियाँ ढूँढकर
रोने का बिलखता स्वर मत उठाना तुम,
सीने के भीतर हाहाकार कर
वेदना से अपना हृदय मत तोड़ना।
एक पल के लिए सब कुछ भूलकर,
एक लाल कपड़े से तुम
मुझे ढँक देना।
लाल रंग प्रिय है मेरा,
इसीलिए कह रही हूँ—
मेरी निश्चल देह के समीप
लाल कपड़े की परतों में
मैं तुम्हें ढूँढ लूँगी।
तुम्हारे स्पर्श के उसी उन्माद में
मैं जीवित रहूँगी
समाधि के भीतर।
लेखिका: मनीषा शर्मा
पता: झालुकबारी

