लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
विहिप ने संसद परिसर में भगवा वस्त्र पहनने के मामले को लेकर देशव्यापी चिंता व्यक्त की है। संगठन का मानना है कि इस घटना से साधु-संतों और सनातन समाज की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
विहिप का विरोध और मांग
विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के सिंहभूम विभाग मंत्री अरुण सिंह ने संसद परिसर में सांसद पप्पू यादव द्वारा भगवा वस्त्र धारण किए जाने और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की उपस्थिति को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस घटना से साधु-संतों और सनातन समाज की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं।
अरुण सिंह ने प्रेस को जारी बयान में कहा कि इस घटना को लेकर देशभर में संत समाज और सनातन धर्मावलंबियों में रोष है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसके नेताओं ने पहले भी हिंदू आस्था से जुड़े मुद्दों पर आपत्तिजनक रुख अपनाया है।
विहिप नेता ने कहा कि यदि किसी धर्म विशेष की वेशभूषा का सम्मान किया जाता है तो सभी धर्मों के प्रतीकों और संतों का भी समान सम्मान होना चाहिए। उन्होंने इस मामले में सार्वजनिक रूप से माफी की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की घटनाएं जारी रहीं तो संगठन लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराएगा।
यह घटना संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान हुई जब सांसद पप्पू यादव ने भगवा वस्त्र पहनकर सदन में प्रवेश किया। विहिप ने इसे सनातन परंपरा का अपमान बताया और कहा कि इससे देश भर के संत समाज में रोष व्याप्त है।
विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने मीडिया से बातचीत में कहा कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की उपस्थिति ने मामले को और गंभीर बना दिया है। संगठन ने मांग की कि संसद की आचार संहिता के तहत दोषियों पर त्वरित कार्रवाई हो।
इस बीच, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस मुद्दे पर आवाज उठाई है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने The Hindu में लिखा कि धर्मनिरपेक्ष संसद में धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिकरण खतरनाक है।
विहिप ने चेतावनी दी कि यदि सरकार इस मामले पर संज्ञान नहीं लेती तो देशव्यापी शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे। संगठन ने सभी हिंदू संगठनों से एकजुट होकर आवाज उठाने का आह्वान किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की घटनाएं सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करती हैं और कानूनी ढांचे में स्पष्ट दिशानिर्देशों की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। विहिप की मांग को देखते हुए सरकार को संसदीय मर्यादा बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।

