लेखक: इंद्र यादव
एक वक्त था जब उस शख्स की एक दहाड़ से पूरा घर संभल जाता था। उसके कदमों की आहट मात्र से बच्चे अपनी शैतानियां छोड़ देते थे और हर मुश्किल वक्त में परिवार की ढाल वही बनता था। लेकिन वक्त का पहिया घूमा, बच्चे बड़े हुए, अपने आशियानों में व्यस्त हो गए और वही मजबूत इंसान आज घर के किसी एक कोने में चुपचाप बैठा नजर आता है। यह कोई आम खामोशी नहीं है—यह एक बूढ़े बाप की खामोशी है, जो चीख-चीखकर बता रही है कि जिंदगी अब कितनी अकेली हो चुकी है।
उम्मीद और इंतजार का थका हुआ सफर
आज इस बूढ़े बाप की दुनिया सिमटकर सिर्फ एक दरवाजे तक रह गई है। उसे अब न तो पैसों की चमक चाहिए और न ही किसी ऐशो-आराम की चाहत। उसकी सारी ख्वाहिशें बस इस बात पर आकर टिक जाती हैं कि कोई आए, उसके पास बैठे और प्यार से पूछ ले—”पिताजी, आप कैसे हैं?”
लेकिन विडंबना देखिए कि आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में बच्चों के पास पूरी दुनिया के लिए वक्त है, सिवाय उस शख्स के जिसने उन्हें इस दुनिया में चलना सिखाया था। वह रोज शाम को दरवाजे की तरफ देखता है, उम्मीद भरी नजरों से राह ताकता है, पर कई बार यह छोटा सा सवाल भी उसके नसीब में नहीं होता। उसकी आंखें बहुत कुछ बयां करना चाहती हैं, लेकिन उसके होंठ सिल जाते हैं।
बच्चों की खुशियों के आगे घुटता हुआ दम
आखिर क्यों चुप रहता है एक बाप? क्या उसकी जुबान पर ताले लग जाते हैं? नहीं! असलियत यह है कि वह अपनी तकलीफों से ज्यादा अपने बच्चों की दुनिया उजड़ने से डरता है। उसे इस बात का डर होता है कि अगर उसने अपना दर्द बयां कर दिया, तो उसके बच्चे परेशान हो जाएंगे।
वह खुद अंदर ही अंदर घुटता रहता है, आंसू पीता रहता है, लेकिन चेहरे पर एक झूठी मुस्कान सजाए रखता है ताकि उसके बच्चों को कोई गिल्ट या तनाव न हो। वह अपने हिस्से का सुख चुपचाप त्याग देता है, ताकि उसकी औलाद की जिंदगी में जरा भी अंधेरा न आए।
खामोशी के समंदर में दबे अनगिनत दर्द
यह खामोशी महज शब्दों की अनुपस्थिति नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि इंसान अंदर से कितना टूट चुका है। इस खामोशी के पीछे छिपे होते हैं!
- हजारों अनकहे आंसू, जिन्हें उसने तकिए में मुंह देकर छिपाया है।
- लाखों पुरानी यादें, जब उसके बच्चे उससे लिपटकर सोया करते थे।
- अनगिनत अधूरी बातें, जो वह अपनी औलाद के साथ बैठकर साझा करना चाहता है।
आज की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई
आज समाज में रिश्तों की परिभाषा बदल चुकी है। जिस मां-बाप ने अपनी पूरी जवानी, अपनी हर एक खुशी अपनी औलाद को काबिल बनाने में झोंक दी, बुढ़ापे में वही औलाद उन्हें बोझ समझने लगती है। यह इस दौर की सबसे दर्दनाक और शर्मनाक सच्चाई है।
हमें यह समझने की सख्त जरूरत है कि बूढ़ा बाप जब खामोश हो जाए, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उसे किसी चीज की जरूरत नहीं है या उसे दर्द नहीं होता। इसका सीधा मतलब यह है कि वह अंदर से पूरी तरह बिखर चुका है।
वक्त रहते संभल जाइए! इससे पहले कि वह दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो जाए और वह कुर्सी हमेशा के लिए खाली हो जाए, अपने बूढ़े बाप के पास बैठिए। उसकी खामोशी को पढ़िए, उसका हाथ थामिए और उसे महसूस कराइए कि वह आज भी इस घर की सबसे बड़ी और कीमती ताकत है। वरना एक दिन सिर्फ पछतावा हाथ लगेगा, और तब वह खामोशी कभी न टूटने वाले सन्नाटे में बदल जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बुजुर्गों की देखभाल समाज की जिम्मेदारी है।

