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    Home » शर्मिला धनखड़: घरेलू हिंसा से राष्ट्रमंडल चैंपियन बनने तक की प्रेरणादायक कहानी
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    शर्मिला धनखड़: घरेलू हिंसा से राष्ट्रमंडल चैंपियन बनने तक की प्रेरणादायक कहानी

    Devanand SinghBy Devanand SinghJuly 28, 2026No Comments4 Mins Read
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    शर्मिला धनखड़
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    लेखक: अपराजिता उपाध्याय

    शर्मिला धनखड़ का संघर्ष और स्वर्णिम सफलता

    ग्लास्गो, 28 जुलाई (भाषा) घरेलू हिंसा और विपरीत परिस्थितियों का सामना करने वाली पैरा एथलीट शर्मिला धनखड़ ने 37 दिन की नवजात बेटी के साथ घर से निकाले जाने के दर्दनाक दौर को पीछे छोड़ते हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर संघर्ष की मिसाल कायम की।

    वर्षों तक घरेलू हिंसा की यातना झेलना उनके लिए एक नई शुरुआत का कारण बनी। उस समय पोलियो से प्रभावित और मानसिक रूप से टूट चुकी शर्मिला को यह नहीं पता था कि जिंदगी उन्हें किस मुकाम तक ले जाएगी लेकिन एक दशक से अधिक समय बाद 40 वर्षीय शर्मिला ने राष्ट्रमंडल खेलों में महिलाओं की एफ-57 वर्ग की गोला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया।

    घरेलू हिंसा का दर्दनाक दौर

    शर्मिला ने पीटीआई से बातचीत में अपने पहले पति के साथ बिताए कठिन दिनों को याद करते हुए कहा, “सब लोग कहते थे कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा, इसलिए मैं लंबे समय तक सब कुछ सहती रही।”

    उन्होंने आरोप लगाया कि उनका पहला पति शराब का आदी था, कोई काम नहीं करता था और घर का सामान बेच देता था। दो बेटियों के जन्म पर वह उन्हें बेरहमी से पीटता था। यहां तक कि उनकी बड़ी बेटी भी घरेलू हिंसा का शिकार हुई।

    शर्मिला ने कहा, “मेरे (पहले) पति की कोई आमदनी नहीं थी। वह घर का सामान बेच देता था। दो बेटियां होने की वजह से मुझे मारता था और मेरी बड़ी बेटी को भी पीटता था।”

    उन्होंने बताया, “जब मेरी दूसरी बेटी पैदा हुई तो वह बड़ी बेटी को भी मारने लगा। छोटी बेटी सिर्फ 37 दिन की थी, तभी उसने हमें घर से निकाल दिया। इसके बाद मेरा परिवार मुझे अपने साथ ले आया और मेरा तलाक करा दिया।”

    पोलियो और आर्थिक तंगी

    दोनों बेटियों के साथ मायके लौटने के बाद शर्मिला ने अगले छह वर्षों तक संघर्ष करते हुए अपनी जिंदगी को दोबारा संवारने की कोशिश की।

    उन्हें हालांकि मुश्किलों का सामना शादी से बहुत पहले से करना पड़ रहा था। दो वर्ष की उम्र में उन्हें पोलियो हो गया था, जिससे उनका दाहिना पैर हमेशा के लिए प्रभावित हो गया।

    उन्होंने कहा, “जब मैं दो साल की थी, तब मुझे पोलियो हो गया। बुखार का इंजेक्शन लगाने के बाद मेरा दाहिना पैर प्रभावित हो गया।”

    शर्मिला का बचपन भी आर्थिक तंगी में बीता। उनकी मां दृष्टिबाधित थीं और उनकी शादी अपने से 20 वर्ष बड़े व्यक्ति से हुई थी। सीमित संसाधनों के बावजूद उनके माता-पिता ने बच्चों की पढ़ाई कभी नहीं रुकने दी।

    उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “घर में आर्थिक दिक्कतें थीं, लेकिन माता-पिता ने हमें पढ़ाया। पहली से दसवीं कक्षा तक मैं कभी दूसरे स्थान पर नहीं आई, हर परीक्षा में अव्वल रही।”

    आर्थिक तंगी के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई और कम उम्र में उनकी शादी कर दी गई।

    दूसरी शादी और खेलों में प्रवेश

    उनके जीवन में असली बदलाव दूसरी शादी के बाद आया।

    शर्मिला ने बताया, “मेरे दूसरे पति ने ही मुझे खेलों से परिचित कराया। उनके पास जो भी था, उन्होंने मेरी खेल यात्रा पर लगा दिया।”

    जब आर्थिक संसाधन कम पड़े तो उनकी मां ने भी अपनी जमीन बेचकर उनका साथ दिया।

    कोच टेक चंद का सहयोग

    कोच टेक चंद ( 2018 एशियाई पैरा खेलों में बैठकर गोला फेंक स्पर्धा के कांस्य पदक विजेता रह चुके हैं) ने शर्मिला की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें इस स्पर्धा में आगे बढ़ाया।

    शुरुआत में शर्मिला को खुद भी भरोसा नहीं था कि वह कभी बड़ा खिताब जीत पाएंगी।

    उन्होंने कहा, “शुरुआत में मुझे कभी नहीं लगा था कि मैं जीत सकती हूं।”

    स्वर्णिम सफलता और बेटियों का सपना

    उनका आत्मविश्वास हर प्रतियोगिता के साथ बढ़ता गया। 2022 के बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में वह चौथे स्थान पर रहीं, इस वर्ष फज्जा अंतरराष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता और अब ग्लासगो में राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाकर अपने संघर्ष को ऐतिहासिक सफलता में बदल दिया।

    यह जीत सिर्फ एक स्वर्ण पदक नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के विश्वास और समर्थन की जीत भी थी, जिन्होंने उनके सबसे कठिन समय में उनका साथ दिया।

    आज उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा उनकी दोनों बेटियां हैं। 15 वर्षीय बड़ी बेटी भाला फेंक खिलाड़ी है, जबकि 12 वर्षीय छोटी बेटी लंबी कूद में अपना भविष्य बना रही है।

    शर्मिला ने गर्व से कहा, “मेरी बेटियों ने मुझसे कहा है कि भारत में होने वाले अगले राष्ट्रमंडल खेलों में हम तीनों भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे और तीनों पदक जीतकर लौटेंगे।”

    अधिक जानकारी के लिए पैरालंपिक आधिकारिक वेबसाइट देखें।

    घरेलू हिंसा पैरा एथलीट प्रेरणा राष्ट्रमंडल खेल स्वर्ण पदक
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