लेखक: मृत्युंजय बर्मन
सरायकेला के संजय डालमिया के घर ईडी की इंट्री से झारखंड और ओडिशा के सात ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई शुरू हो गई है।
झारखंड-ओडिशा के सात ठिकाने जांच के घेरे में
सरायकेला के चर्चित को-ऑपरेटिव बैंक प्रकरण में शुक्रवार को जांच की आंच ठेकेदार संजय कुमार डालमिया के घर तक पहुंच गई। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की रांची टीम ने पटनायक टोला स्थित उनके आवास पर तलाशी अभियान शुरू किया। बताया जा रहा है कि झारखंड और ओडिशा में कुल सात ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई की जा रही है। अचानक हुई इस कार्रवाई से सरायकेला में दिनभर हलचल बनी रही।
35 करोड़ के ऋण से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं की जांच
ईडी की कार्रवाई करीब 35 करोड़ रुपये के सहकारी बैंक ऋण से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच के सिलसिले में बताई जा रही है। जांच एजेंसी बैंक से जुड़े लेन-देन, वित्तीय दस्तावेजों और धन के प्रवाह की पड़ताल कर रही है। आवास पर तलाशी के दौरान दस्तावेजों तथा अन्य संभावित साक्ष्यों की जांच किए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, ईडी की ओर से अभी तक बरामदगी का विस्तृत आधिकारिक ब्योरा जारी नहीं किया गया है।
पुराने बैंक प्रकरण में सजा का ऐलान
इस प्रकरण की जड़ें वर्ष 2017-18 में सामने आई बैंकिंग अनियमितताओं से जुड़ी हैं। पुराने मामले की जांच में करीब 4.14 करोड़ रुपये के कथित फर्जी हस्तांतरण/निकासी का मामला भी सामने आया था। इसी व्यापक प्रकरण में करीब 35 करोड़ रुपये के ऋण से जुड़े आरोपों की जांच हुई।
मामले में एसीबी की विशेष अदालत अप्रैल 2026 में संजय डालमिया और तत्कालीन शाखा प्रबंधक सुनील सतपति को 10-10 वर्ष तथा बैंक कर्मचारी मनीष देवगम को पांच वर्ष की सजा सुना चुकी है। अब ईडी की कार्रवाई ने इस पुराने बैंक प्रकरण को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।
संजय डालमिया के घर ईडी की इंट्री: आगे की जांच पर नजर
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि जांच के दौरान 35 करोड़ रुपये के ऋण से जुड़े वित्तीय लेन-देन की कौन-कौन सी कड़ियां सामने आती हैं। तलाशी पूरी होने और ईडी की आधिकारिक जानकारी जारी होने के बाद ही बरामदगी और आगे की कार्रवाई की तस्वीर साफ होगी।
पृष्ठभूमि: सरायकेला को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले की पूरी कहानी
सरायकेला-खरसावां जिले का को-ऑपरेटिव बैंक प्रकरण झारखंड के बहुचर्चित वित्तीय घोटालों में से एक रहा है। वर्ष 2017-18 में इस बैंक में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का खुलासा हुआ था। जांच में पता चला कि बैंक के अधिकारियों और कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर करोड़ों रुपये के ऋण बांटे गए थे। इस मामले में करीब 4.14 करोड़ रुपये की फर्जी निकासी और हस्तांतरण का आरोप लगा था। तत्कालीन शाखा प्रबंधक सुनील सतपति और बैंक कर्मी मनीष देवगम की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी। ठेकेदार संजय कुमार डालमिया पर आरोप है कि उन्होंने अपने रसूख का इस्तेमाल कर बैंक से 35 करोड़ रुपये का ऋण नियमों को ताक पर रखकर हासिल किया। इस ऋण की अदायगी नहीं होने पर बैंक की माली हालत खराब हो गई और जमाकर्ताओं का पैसा डूबने की कगार पर पहुंच गया।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की भूमिका और जांच की दिशा
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत वित्तीय अपराधों की जांच करती है। इस मामले में ईडी की एंट्री इसलिए अहम है क्योंकि स्थानीय पुलिस और एसीबी की जांच जहां अपराधिक पहलू तक सीमित थी, वहीं ईडी धन के लेन-देन, संपत्ति की खरीद-फरोख्त और मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से जांच करेगी। ईडी के पास संपत्ति जब्त करने और कुर्क करने के व्यापक अधिकार होते हैं। शुक्रवार को रांची से आई ईडी की टीम ने पटनायक टोला स्थित संजय डालमिया के आवास के अलावा झारखंड और ओडिशा के छह अन्य ठिकानों पर एक साथ दबिश दी। इस समन्वित कार्रवाई से साफ है कि जांच एजेंसी के पास पुख्ता इनपुट थे। सूत्रों के मुताबिक, ईडी की टीम बैंक ऋण के पैसे के डायवर्जन, शेल कंपनियों के जरिए रकम के हेरफेर और अचल संपत्ति में निवेश के दस्तावेज तलाश रही है।
संजय डालमिया का कारोबारी साम्राज्य और राजनीतिक कनेक्शन
संजय कुमार डालमिया सरायकेला के जाने-माने ठेकेदार और कारोबारी हैं। उनके पास सड़क निर्माण, भवन निर्माण और सरकारी टेंडरों में मजबूत पकड़ मानी जाती है। इलाके में उनकी पहचान एक रसूखदार व्यक्ति के रूप में है। पूर्व में भी उन पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन यह पहली बार है जब केंद्रीय एजेंसी ने सीधे उनके आवास पर दस्तक दी है। राजनीतिक गलियारों में भी उनकी पहुंच बताई जाती है, जिसके चलते लंबे समय तक स्थानीय स्तर पर कार्रवाई नहीं हो सकी। एसीबी की विशेष अदालत द्वारा अप्रैल 2026 में उन्हें 10 वर्ष की सजा सुनाए जाने के बाद भी वे जमानत पर बाहर थे। अब ईडी की कार्रवाई से उनकी मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है।
आम जनता और जमाकर्ताओं की उम्मीदें
इस बैंक घोटाले का सबसे बुरा असर आम जमाकर्ताओं पर पड़ा है। सरायकेला और आसपास के ग्रामीण इलाकों के हजारों छोटे बचतकर्ताओं की गाढ़ी कमाई इस बैंक में जमा है। बैंक की वित्तीय सेहत बिगड़ने के कारण जमाकर्ताओं को अपनी ही रकम निकालने के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है। कई बुजुर्ग पेंशनभोगी और गरीब परिवार अपनी जमा पूंजी के लिए बैंक के चक्कर काटते नजर आते हैं। ईडी की इस कार्रवाई से जमाकर्ताओं में एक उम्मीद जगी है कि शायद अब दोषियों की संपत्ति जब्त कर उनकी रकम वापस मिल सके। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया लंबी है और रिकवरी में वक्त लगेगा। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि केवल छापेमारी से काम नहीं चलेगा, बल्कि जब्त संपत्ति की नीलामी कर जमाकर्ताओं को भुगतान करने की ठोस योजना बननी चाहिए।

