लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
UCIL यानी यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड पर देश के 70 फीसदी से ज्यादा यूरेनियम उत्पादन की जिम्मेदारी है, लेकिन इसकी मौजूदा हालत 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा के सपने पर सवाल खड़े करती है।
100 GW का लक्ष्य और जादूगोड़ा का बोझ
देश जब परमाणु ऊर्जा के नए युग में प्रवेश का दावा कर रहा है, तब उसकी नींव कहे जाने वाले जादूगोड़ा की जमीन पर सवाल गहरे हो गए हैं।
वियना में चल रहे IAEA के 70वें जनरल कांफ्रेंस में परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार मोहंती ने भारत का विजन रखा – 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता। मौजूदा 8,880 मेगावाट से 1 लाख मेगावाट तक का सफर। इसमें बड़े स्वदेशी 700 मेगावाट PHWR, कम से कम पांच स्वदेशी SMR को 2033 तक चालू करना और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी का पूरा कानूनी फ्रेमवर्क शामिल है।
इस बड़े सपने की पहली कड़ी है – यूरेनियम। और देश की 70% से ज्यादा यूरेनियम की जिम्मेदारी जिस कंपनी पर है, वो है जादूगोड़ा में बैठी UCIL।
UCIL के CMD डॉ. के. आनंद राव ने खुद 15 अगस्त को जादूगोड़ा में तिरंगा फहराते हुए कहा था कि UCIL प्रधानमंत्री के निर्देश पर 100 GW के लक्ष्य के लिए न्यूक्लियर फ्यूल सप्लाई में लीडिंग रोल निभाएगी और कंपनी लगातार अपनी माइनिंग और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ा रही है। उन्होंने आंध्र प्रदेश के तुम्मालापल्ले समेत दूसरे राज्यों में नई साइटों पर काम का भी जिक्र किया।
केंद्र ने फ्यूल सिक्योरिटी के लिए विदेशी मोर्चा भी संभाला है। जुलाई 2026 में भारत और ऑस्ट्रेलिया ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए दीर्घकालिक यूरेनियम सप्लाई का ऐतिहासिक एडमिनिस्ट्रेटिव अरेंजमेंट फाइनल किया, जो IAEA सेफगार्ड के तहत होगा।
लेकिन सवाल ये है कि जब विदेश से यूरेनियम लाना पड़ रहा है, तो घर की खान क्या कर रही है?
UCIL की बदहाल स्थिति : अंदरूनी घमासान से लेकर उत्पादन तक
जादूगोड़ा, भाटिन, नरवापहाड़, तुरामडीह, बागजाता, महुलडीह और बंदुहुरांग – ये सिर्फ खदानें नहीं, देश के परमाणु इतिहास की पहचान हैं। लेकिन इनकी मौजूदा स्थिति पर स्थानीय स्तर पर गहरी चिंता है।
1. उत्पादन पर चुप्पी और गिरावट की चर्चा
UCIL प्रबंधन उत्पादन के आंकड़ों को रणनीतिक और देशहित का हवाला देकर सार्वजनिक नहीं करता। यह परंपरा पुरानी है। लेकिन पिछले 2-3 सालों से मजदूर संगठनों और स्थानीय सूत्रों में उत्पादन में अपेक्षित बढ़ोतरी के बजाय गिरावट की चर्चा लगातार तेज है। कंपनी की डायमंड जुबली (4 अक्टूबर से) के मौके पर भी विस्तार के दावे हैं, पर जमीन पर पुरानी खदानों में डी-वाटरिंग, वेंटिलेशन और मशीनों की उपलब्धता बड़ी चुनौती बनी हुई है।
2. प्रबंधन में अस्थिरता
कंपनी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब टेक्निकल डायरेक्टर स्तर के अधिकारी को हटाया गया। नवंबर 2024 में टेक्निकल डायरेक्टर मनोज कुमार को DAE के आदेश पर पद से हटाया गया, और सीएमडी डॉ. राव को ही अतिरिक्त प्रभार दिया गया। यह कार्रवाई पूर्व सीएमडी डॉ. संतोष सत्यपथी की शिकायत पर प्रशासनिक अनुशासनहीनता के आरोप में हुई बताई गई। इससे पहले जून 2025 में 18 अधिकारियों के तबादले को लेकर भी अंदरूनी घमासान की खबरें आई थीं।
3. नई परियोजनाएं कागजों में
UCIL खुद कह रही है कि उसने राजस्थान, छत्तीसगढ़ में यूरेनियम माइनिंग प्लांट की योजना बनाई है, लेकिन प्रोजेक्ट क्लियरेंस का इंतजार है। झारखंड में हिंदुस्तान कॉपर की टेलिंग से यूरेनियम निकालने के लिए रिकवरी प्लांट लगाने की योजना भी इसी दबाव का हिस्सा है।
4. जादूगोड़ा का पर्यावरण और स्वास्थ्य का सवाल
टेलिंग पॉन्ड, रेडिएशन सेफ्टी और विस्थापित गांवों के पुनर्वास का मुद्दा जादूगोड़ा में कभी खत्म नहीं हुआ। जब देश 100 GW की बात कर रहा है, तो इस पुरानी यूनिट को मॉडर्न सेफ्टी, ऑटोमेशन और स्किल्ड मैनपावर की सबसे ज्यादा जरूरत है।
UCIL की चुनौतियाँ और आगे का रास्ता
राष्ट्र संवाद का सवाल
एक साल पहले 1 सितंबर 2025 को CMD की कुर्सी संभालने के बाद डॉ. आनंद राव के सामने दोहरी चुनौती थी – पुरानी खदानों को रिवाइव करना और नई खदानों को तेज करना।
सरकार IAEA के मंच से दुनिया को बता रही है कि भारत क्लीन एनर्जी के लिए परमाणु की तरफ जाएगा। लेकिन जब तक जादूगोड़ा की खदान से निकलने वाले पीले केक की रफ्तार नहीं बढ़ेगी, तब तक 100 GW का सपना आयातित यूरेनियम पर ही टिका रहेगा।
जादूगोड़ा को सिर्फ एक खदान के तौर पर नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा संप्रभुता के तौर पर देखने का वक्त आ गया है। लगातार UCIL में भ्रष्टाचार के मामले उजागर हो रहे हैं इनिशियल के रोटेशन पॉलिसी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
निष्कर्षतः, UCIL को अपनी आंतरिक चुनौतियों से पार पाते हुए उत्पादन क्षमता बढ़ानी होगी, तभी भारत का परमाणु ऊर्जा सपना साकार हो सकेगा।
