लेखक: देवानंद सिंह
जवाबदेही और पत्रकारिता
लोकतंत्र में प्रेस को चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जवाबदेही का दायित्व भी है। स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता शासन, प्रशासन और जनता के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य करती है। लेकिन जब पत्रकारिता की आड़ में व्यक्तिगत स्वार्थ, भय पैदा करने की प्रवृत्ति या अवैध गतिविधियां पनपने लगें, तब इस पर गंभीर मंथन आवश्यक हो जाता है।
दिल्ली हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी इसी चिंता को सामने लाती है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन इसका दुरुपयोग किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि आज मोबाइल फोन और माइक्रोफोन के सहारे कोई भी स्वयं को पत्रकार घोषित कर देता है, जबकि पत्रकारिता केवल उपकरणों का नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, नैतिकता, तथ्यों की पुष्टि और सामाजिक उत्तरदायित्व का विषय है।
डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति को आसान बनाया है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर दिया है। यह लोकतंत्र की सकारात्मक उपलब्धि है, लेकिन इसके साथ फर्जी पत्रकारिता, ब्लैकमेलिंग, अफवाह फैलाने और “प्रेस” के नाम पर अवैध लाभ लेने जैसी प्रवृत्तियां भी बढ़ी हैं। इससे सबसे अधिक नुकसान उन ईमानदार पत्रकारों को होता है, जो कठिन परिस्थितियों में भी निष्पक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता करते हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सरकार से एक प्रभावी नियामक ढांचा तैयार करने की आवश्यकता पर दिया गया सुझाव इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हालांकि, यह भी उतना ही आवश्यक है कि ऐसा कोई भी ढांचा प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने का माध्यम न बने। जवाबदेही और स्वतंत्रता दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है।
उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति द्वारा फर्जी पत्रकारों और “प्रेस” लिखे अवैध वाहनों के खिलाफ अभियान चलाने की घोषणा भी इसी बहस का हिस्सा है। यदि यह अभियान निष्पक्ष, पारदर्शी और केवल वास्तविक फर्जीवाड़े के विरुद्ध संचालित होता है, तो इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता मजबूत हो सकती है। लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस प्रक्रिया में स्वतंत्र और ईमानदार पत्रकार किसी प्रकार के अनावश्यक उत्पीड़न का शिकार न हों।
झारखंड में भी इसकी सुगबुगाहट तेज हो रही है
आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल तकनीक नहीं, बल्कि विश्वास की है। समाज उसी पत्रकार पर भरोसा करता है, जो तथ्यों की पुष्टि करता है, निष्पक्ष रहता है और सत्ता हो या विपक्ष दोनों से समान दूरी बनाए रखता है। प्रेस की पहचान उसके कैमरे, माइक या वाहन पर लिखे “प्रेस” शब्द से नहीं, बल्कि उसकी सत्यनिष्ठा और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता से होती है।
प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आधारशिला है, लेकिन हर स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। फर्जी पत्रकारिता पर रोक लगाना समय की आवश्यकता है, पर इसके नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश नहीं लगना चाहिए। आवश्यकता ऐसे संतुलित तंत्र की है, जहां ईमानदार पत्रकार सुरक्षित रहें, फर्जी तत्वों पर प्रभावी कार्रवाई हो और जनता का मीडिया पर विश्वास पहले से अधिक मजबूत हो। यही स्वस्थ, जिम्मेदार और लोकतांत्रिक पत्रकारिता की पहचान है।

