लेखक: मनीषा शर्मा
प्राचीन भारत का गौरव और ज्ञान का प्रकाशस्तंभ रहे नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही हृदयविदारक भी है। पाँचवीं शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक ज्ञान-विज्ञान की आभा से पूरे विश्व को आलोकित करने वाला नालंदा, उस समय दुनिया का सबसे बड़ा और पहला पूर्ण आवासीय शिक्षा केंद्र था।
स्थापना और संरक्षण
वर्तमान बिहार राज्य में स्थित इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय की स्थापना पाँचवीं शताब्दी में गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल में हुई थी। बाद में कन्नौज के राजा हर्षवर्धन और पाल वंश के शासकों ने भी इस ज्ञानपीठ की समृद्धि के लिए भारी सहायता और राजकीय संरक्षण प्रदान किया।
ज्ञान का महासमुद्र: नालंदा विश्वविद्यालय एक अंतरराष्ट्रीय केंद्र
शिक्षार्थियों और शिक्षकों की संख्या के मामले में नालंदा ज्ञान का एक विशाल महासमुद्र था। पूरी तरह से आवासीय परिवेश वाले इस विश्वविद्यालय में एक ही समय में 10,000 से अधिक देशी-विदेशी छात्र निवास करते थे और उच्च शिक्षा प्राप्त करते थे। उनका मार्गदर्शन करने के लिए लगभग 2,000 अत्यंत विद्वान पंडित और आचार्य थे। केवल भारत से ही नहीं, बल्कि चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, इंडोनेशिया और फारस (ईरान) जैसे सुदूर देशों से भी ज्ञान-पिपासु छात्र यहाँ खिंचे चले आते थे।
अनूठी शिक्षा प्रणाली और कड़ा अनुशासन
निःशुल्क शिक्षा
नालंदा की पूरी शिक्षा व्यवस्था निःशुल्क थी। छात्रों के रहने-खाने, कपड़े और चिकित्सा का सारा खर्च राजाओं द्वारा दान किए गए सौ या दो सौ गाँवों से एकत्र किए गए राजस्व (कर) से वहन किया जाता था।
कठिन प्रवेश परीक्षा
नालंदा में प्रवेश की प्रक्रिया अत्यंत कठिन थी। विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर तैनात ‘द्वारपंडित’ उम्मीदवारों की उच्च स्तरीय मौखिक परीक्षा लेते थे। इस कठिन परीक्षा में केवल 20 से 30 प्रतिशत मेधावी छात्र ही उत्तीर्ण होकर भीतर प्रवेश कर पाते थे।
दिनचर्या और ज्ञान-साधना
सुबह से शाम तक यहाँ शास्त्रों पर चर्चा, वाद-विवाद और गहन शोध चलता रहता था। जब तक छात्रों के मन का संदेह पूरी तरह दूर नहीं हो जाता था, तब तक शिक्षक अत्यंत धैर्य के साथ शिक्षण कार्य करते थे। शाम के समय सभी लोग सामूहिक रूप से ध्यान लगाकर मन को संयमित और शांत करते थे।
प्रसिद्ध यात्रियों के वृत्तांत
सातवीं शताब्दी में चीन के प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु, यात्री और विद्वान ह्वेनसांग (Hiuen Tsang) और इत्सिंग (I-Tsing) नालंदा आए थे। उन्होंने यहाँ कई वर्ष बिताए और बौद्ध दर्शन तथा अन्य शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उनके यात्रा वृत्तांत नालंदा की महानता, शिक्षा प्रणाली और उसकी महत्ता के जीवंत और प्रामाणिक दस्तावेज हैं।
‘धर्मगंज’ — विश्व का सबसे बड़ा ज्ञान-भंडार
नालंदा विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी संपत्ति उसका पुस्तकालय था, जिसका नाम था ‘धर्मगंज’— अर्थात ‘सत्य का बाजार’। यह विशाल पुस्तकालय ‘रत्नसागर’, ‘रत्नदधि’ और ‘रत्नरंजक’ नामक तीन गगनचुंबी बहुमंजिला इमारतों से सुशोभित था। यहाँ धर्मशास्त्र, विज्ञान, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, व्याकरण और दर्शन की लाखों दुर्लभ हस्तलिखित पुस्तकें और पांडुलिपियाँ सुरक्षित थीं।
पतन का काला इतिहास और बर्बरता
सन् 1193 में तुर्क-अफ़गान आक्रमणकारी इख्तियार-उद्-दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने बिहार पर आक्रमण कर इस पवित्र ज्ञानपीठ को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।
इतिहासकारों के अनुसार, खिलजी एक बार किसी असाध्य बीमारी से पीड़ित हो गया था। उसके अपने हकीमों के तमाम प्रयासों के बाद भी वह ठीक नहीं हो पा रहा था। आखिरकार, नालंदा के आयुर्वेद विभाग के प्रधान आचार्य राहुल श्रीभद्र ने एक विशेष उपाय से खिलजी को पूरी तरह स्वस्थ कर दिया।
लेकिन खिलजी ने आभार व्यक्त करने के बजाय एक गहरी हीनभावना और ईर्ष्या पाल ली कि एक भारतीय वैद्य का ज्ञान उसके अपने हकीमों से श्रेष्ठ कैसे हो गया!
भारतीय ज्ञान और बौद्ध धर्म के इस मुख्य केंद्र को नेस्तनाबूद करने के इरादे से उसने पूरे नालंदा में आग लगवा दी। खिलजी की बर्बर सेना ने हजारों निर्दोष बौद्ध भिक्षुओं और विद्वानों की बेरहमी से हत्या कर दी। ‘धर्मगंज’ पुस्तकालय में लगाई गई आग इतनी भयानक थी कि उसमें रखी 90 लाख से अधिक दुर्लभ पुस्तकें और पांडुलिपियाँ लगभग तीन से छह महीने तक लगातार जलकर राख होती रहीं।
एक अपूरणीय क्षति और पुनरुत्थान के प्रयास
नालंदा का पतन केवल एक इमारत का विध्वंस नहीं था, बल्कि यह संपूर्ण मानव सभ्यता के ज्ञान-विज्ञान की एक अपूरणीय क्षति थी। यदि खिलजी के क्रोध की अग्नि में वे लाखों अमूल्य पुस्तकें नष्ट न हुई होतीं, तो आज की दुनिया विज्ञान, प्रौद्योगिकी और चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत आगे होती।
वर्तमान में, भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक स्थल को विश्व धरोहर स्थल के रूप में संरक्षित किया है और इसके समीप ही एक नया ‘नालंदा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय‘ स्थापित कर इसके खोए हुए गौरव और विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है।

