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    Home » यूसीएल कॉलोनी की सड़क जर्जर लोगों के लिए बना रही है जानलेवा 10 करोड़ का टेंडर केवल कागज पर धरातल पर शून्य
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    यूसीएल कॉलोनी की सड़क जर्जर लोगों के लिए बना रही है जानलेवा 10 करोड़ का टेंडर केवल कागज पर धरातल पर शून्य

    Aman OjhaBy Aman OjhaJuly 6, 2026No Comments2 Mins Read
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    राष्ट्र संवाद संवाददाता

     

    यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी यूसील की कॉलोनी की सड़कें अब सिर्फ जर्जर नहीं रहीं, बल्कि लोगों की जान के लिए खतरा बन गई हैं। 20 साल से टूटी-फूटी सड़कों पर हर दिन हादसे का डर सता रहा है। सबसे बड़ी विडंबना ये कि कंपनी के सीएमडी डॉ. कंचन आनंद राव और उनकी धर्मपत्नी भी रोजाना इसी सड़क से गुजरते हैं, फिर भी मरम्मत के नाम पर सिर्फ घोषणाएं हो रही हैं।

     

    *10 करोड़ का टेंडर, काम जीरो*

    कुछ महीने पहले सीएमडी स्तर पर कॉलोनी की सड़कों के लिए 10 करोड़ रुपये का टेंडर पास करने की घोषणा हुई थी। लेकिन आज तक एक भी मजदूर जमीन पर नहीं उतरा। वहीं दूसरी तरफ तुरामडीह में सड़क निर्माण का काम शुरू हो चुका है। इससे कॉलोनी वासियों और यूनियन नेताओं में भारी नाराजगी है।

     

    स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारी वाले क्वार्टर की सड़कें चमक रही हैं, लेकिन मजदूर क्वार्टर, हॉस्पिटल रोड और मेन गेट से अंदर जाने वाली सड़कें पूरी तरह ध्वस्त हैं।

     

    *रोज की परेशानी, हर कदम पर खतरा*

    1. *गड्ढे और धसाव*: जगह-जगह 1-1 फीट गहरे गड्ढे। बाइक सवार कई बार गिरकर घायल हो चुके हैं।

    2. *धूल का कहर*: गर्मियों में पूरे दिन धूल उड़ती है। बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा के मरीजों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है।

    3. *रात में अंधेरा + गड्ढे*: स्ट्रीट लाइट कम और सड़क टूटी होने से रात 8 बजे के बाद निकलना जोखिम भरा है। बरसात में गड्ढे पानी से भर जाते हैं, पता ही नहीं चलता कहां कितना गहरा है।

    4. *स्कूल-कॉलेज के बच्चे परेशान*: कॉलोनी के बच्चे बस और ऑटो से स्कूल जाते हैं। झटके और धूल की वजह से रोज कपड़े खराब हो जाते हैं।

    *यूनियन में आक्रोश, आंदोलन की चेतावनी*

    यूनियन नेताओं ने कई बार प्रबंधन को ज्ञापन सौंपा है। उनका कहना है – “जब तुरामडी की सड़क बन सकती है तो कॉलोनी की क्यों नहीं? अगर 15 दिन में काम शुरू नहीं हुआ तो गेट जाम और आंदोलन किया जाएगा।”

    कर्मचारियों का सीधा सवाल है – “क्या आम मजदूर की जान की कीमत नहीं है।

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