नई दिल्ली. किसी व्यक्ति के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज होना अपने आप में उसे शहर या जिले से बाहर करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि शहर-निकाले यानी एक्सटर्नमेंट की कार्रवाई असाधारण प्रकृति की होती है और इसे लागू करने से पहले कानून में निर्धारित प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करना जरूरी है. अदालत ने छत्तीसगढ़ में एक व्यक्ति के खिलाफ जारी एक साल के एक्सटर्नमेंट आदेश को रद्द करते हुए कहा कि संबंधित व्यक्ति को आरोपों की जानकारी देकर प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रखने का अवसर देना अनिवार्य है.
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने यह फैसला विजय कुमार राजपूत उर्फ विज्जू की अपील पर सुनाया. मामला छत्तीसगढ़ राज्य सुरक्षा अधिनियम, 1990 के तहत रायगढ़ और आसपास के जिलों से एक वर्ष के लिए बाहर किए जाने के आदेश से जुड़ा था. सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जिला मजिस्ट्रेट ने जिस तरीके से कार्रवाई की, उसमें अधिनियम की धारा 8 के तहत निर्धारित आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. अदालत ने साफ किया कि सुनवाई के अधिकार को केवल औपचारिकता के तौर पर पूरा नहीं किया जा सकता.
मामले की शुरुआत अपीलकर्ता के खिलाफ 2009 से 2019 के बीच दर्ज आपराधिक मामलों से हुई थी. जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई कार्यवाही में यह तथ्य सामने आया कि संबंधित मामलों में अपीलकर्ता को बरी किया जा चुका था. इसके अलावा वर्ष 2019 के बाद उसके खिलाफ कोई नई पुलिस रिपोर्ट भी प्रस्तुत नहीं की गई थी. इन परिस्थितियों को देखते हुए जिला मजिस्ट्रेट ने उस समय कार्यवाही समाप्त कर दी थी. हालांकि उसे भविष्य में आपराधिक गतिविधियों से दूर रहने की चेतावनी दी गई थी.
इसके बाद अपीलकर्ता के खिलाफ दो नई प्राथमिकी दर्ज हुईं. इनमें से एक प्राथमिकी सतनामी समुदाय के पूजनीय व्यक्तित्व बाबा गुरु घासीदास के संबंध में कथित रूप से अपमानजनक टिप्पणी वाले वीडियो को रिकॉर्ड करने और प्रसारित करने से जुड़ी थी. इस मामले में पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट ने पहले समाप्त की जा चुकी कार्यवाही को दोबारा सक्रिय कर दिया. इसके बाद अपीलकर्ता को अपना पक्ष रखने का प्रभावी अवसर दिए बिना उसे एक वर्ष के लिए रायगढ़ और उससे लगे जिलों में प्रवेश करने से रोकने का आदेश जारी कर दिया गया.
सुप्रीम कोर्ट ने इसी प्रक्रिया को मामले का केंद्रीय बिंदु माना. अदालत ने कहा कि शहर-निकाले की कार्रवाई सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि व्यक्ति की आवाजाही और उसके सामान्य जीवन पर गंभीर असर डालने वाला असाधारण उपाय है. इसलिए जिस व्यक्ति के खिलाफ ऐसी कार्रवाई प्रस्तावित हो, उसे उसके खिलाफ लगाए गए मुख्य आरोपों और कार्रवाई के आधार की पर्याप्त जानकारी मिलनी चाहिए. इसके बाद उसे अपनी सफाई रखने का वास्तविक और प्रभावी अवसर दिया जाना चाहिए.
पीठ ने कहा कि धारा 8 का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि संबंधित व्यक्ति को प्रस्तावित कार्रवाई के खिलाफ अपना पक्ष रखने का सार्थक अवसर मिले. यदि कानून द्वारा निर्धारित ये बुनियादी शर्तें पूरी किए बिना आदेश जारी किया जाता है तो ऐसा आदेश कानूनी रूप से टिक नहीं सकता. अदालत ने धारा 8 की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने को शहर-निकाले के आदेश को गैर-कानूनी ठहराने का महत्वपूर्ण आधार माना.
सुप्रीम कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट की दूसरी कार्रवाई पर भी गंभीर सवाल उठाए. अदालत ने कहा कि एक बार कार्यवाही समाप्त हो जाने के बाद जिला मजिस्ट्रेट के पास उसे ऐसे दोबारा खोलने का अधिकार नहीं था, मानो उनके पास अपने पुराने आदेश की समीक्षा करने की शक्ति हो. पीठ के अनुसार, प्रशासनिक अधिकारी वही अधिकार इस्तेमाल कर सकता है जो कानून ने उसे स्पष्ट रूप से दिया है. केवल नई परिस्थितियों के सामने आने से पहले समाप्त की गई कार्यवाही को मनमाने तरीके से पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता.
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के दृष्टिकोण की भी आलोचना की. हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की रिट याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा था कि संबंधित कानून के तहत वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध है. इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि जब किसी मामले में कानून की अनिवार्य प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लंघन दिखाई दे रहा हो, तब केवल वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के आधार पर हाईकोर्ट अपनी संवैधानिक रिट अधिकारिता से पीछे नहीं हट सकता.
पीठ ने कहा कि इस मामले में हाईकोर्ट को रिट याचिका पर विचार करना चाहिए था. अदालत के अनुसार, धारा 8 के तहत सुनवाई की आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा बंद हो चुकी कार्यवाही को फिर से खोलने के अधिकार पर भी गंभीर कानूनी सवाल मौजूद था. ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को केवल अधिनियम की धारा 9 के तहत वैकल्पिक उपाय अपनाने के लिए भेजना उचित नहीं था.
फैसले का व्यापक महत्व इसलिए है क्योंकि एक्सटर्नमेंट की कार्रवाई का सीधा असर किसी व्यक्ति की स्वतंत्र आवाजाही, रोजगार, परिवार और सामाजिक जीवन पर पड़ सकता है. सामान्य तौर पर ऐसी कार्रवाई का उद्देश्य किसी क्षेत्र में लगातार आपराधिक गतिविधियों से उत्पन्न खतरे को रोकना होता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह रेखांकित किया कि इस असाधारण शक्ति का इस्तेमाल कानून की निर्धारित सीमाओं के भीतर ही किया जा सकता है.
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल पुराने आपराधिक मामलों की संख्या को देखकर किसी व्यक्ति को क्षेत्र से बाहर करने की कार्रवाई उचित नहीं मानी जा सकती. खासकर तब, जब उन मामलों में व्यक्ति बरी हो चुका हो और बाद की अवधि में उसके खिलाफ पर्याप्त नई सामग्री उपलब्ध न हो. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर और निरंतर आपराधिक गतिविधियों के मामलों में एक्सटर्नमेंट की शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. महत्वपूर्ण यह है कि कार्रवाई वास्तविक सामग्री, वैधानिक अधिकार और उचित प्रक्रिया पर आधारित हो.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह सिद्धांत एक बार फिर स्पष्ट हुआ कि प्रशासनिक शक्तियां कितनी भी व्यापक क्यों न हों, वे कानून से ऊपर नहीं हो सकतीं. किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और आवाजाही पर गंभीर प्रतिबंध लगाने वाली कार्रवाई में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और वैधानिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है. अदालत ने इसी आधार पर विजय कुमार राजपूत उर्फ विज्जू के खिलाफ जारी एक्सटर्नमेंट आदेश को रद्द कर दिया और हाईकोर्ट के उस आदेश को भी पलट दिया, जिसमें उसे वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने के लिए कहा गया था.
यह फैसला जिला प्रशासन और पुलिस के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है कि शहर-निकाले जैसी कठोर कार्रवाई करते समय केवल आपराधिक इतिहास का हवाला देना पर्याप्त नहीं होगा. कार्रवाई के लिए मौजूदा परिस्थितियों, उपलब्ध सामग्री और कानून में निर्धारित प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से सामने रखना होगा. संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का वास्तविक अवसर देना होगा और प्रशासन को अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के भीतर ही निर्णय लेना होगा. इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण प्रशासनिक शक्ति के इस्तेमाल और नागरिक के कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन की सीमा को स्पष्ट कर दिया है.

