नई दिल्ली, 2 जुलाई: कला और संस्कृति की राजधानी दिल्ली में पूर्वोत्तर की पारंपरिक शिल्प प्रदर्शनी ने एक अनूठी पहचान बनाई है। यह प्रदर्शनी, जिसका नाम ‘लिविंग हेरिटेज इन मेटल, बैम्बू एंड क्ले: ट्रेडिशनल यूटेंसिल्स ऑफ नॉर्थईast इंडिया’ है, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन (एनएमसीएम) द्वारा आयोजित की गई है। इस महत्वपूर्ण अवसर पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव श्री चंचल कुमार ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया और पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को करीब से जाना। उनका यह दौरा शिल्पकारों के अथक प्रयासों और उनकी कला के प्रति समर्पण को एक नई पहचान देता है, जो भारतीय संस्कृति की विविधता को उजागर करता है।
पूर्वोत्तर की कला और संस्कृति का अद्भुत संगम
पूर्वोत्तर की पारंपरिक शिल्प प्रदर्शनी केवल कलाकृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि उन कहानियों का एक दर्पण है, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं। श्री चंचल कुमार ने यहाँ प्रदर्शित मणिपुर की प्रसिद्ध लॉन्गपी पॉटरी, मेघालय की लार्नाई पॉटरी और असम की मनमोहक बेल-मेटल शिल्पकला की विशेष सराहना की। इन अद्वितीय शिल्प कलाओं के साथ, पूर्वोत्तर के बाँस शिल्प और अन्य पारंपरिक हस्तशिल्प भी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। प्रदर्शनी में हर वस्तु अपनी भौगोलिक पहचान और सांस्कृतिक गहराई को दर्शाती है, जो इसे केवल एक कला प्रदर्शन से कहीं अधिक बनाती है। यह कलाकारी न केवल सुंदरता के लिए है, बल्कि यह क्षेत्र के लोगों की दैनिक जीवनशैली और उनके पर्यावरण के साथ गहरे जुड़ाव को भी दर्शाती है, जहाँ प्रत्येक उत्पाद में एक कहानी छिपी है।
शिल्पकारों से संवाद: एक मानवीय स्पर्श
सचिव श्री कुमार ने केवल प्रदर्शनी का अवलोकन ही नहीं किया, बल्कि वहाँ उपस्थित प्रतिभाशाली शिल्पकारों से व्यक्तिगत रूप से संवाद भी किया। उन्होंने उनकी कला के पीछे की प्रेरणा, उन्हें विरासत में मिले कौशल और अपनी सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने के उनके प्रयासों की दिल खोलकर प्रशंसा की। ऐसे संवाद कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत होते हैं और उन्हें अपनी कला को और आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह एक ऐसा क्षण था जब दिल्ली में एक उच्च अधिकारी ने जमीन से जुड़े उन कलाकारों से सीधा संपर्क साधा, जो सदियों पुरानी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। उन्होंने शिल्पकारों की जीवन शैली और उनकी कलाकृतियों के निर्माण में लगने वाले समय और मेहनत को भी समझा, जिससे इन शिल्पों के प्रति उनका सम्मान और गहरा हुआ।
प्रधानमंत्री की ‘अष्टलक्ष्मी’ परिकल्पना और सांस्कृतिक मानचित्रण
इस प्रदर्शनी का आयोजन राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन (एनएमसीएम) द्वारा किया गया है। यह मिशन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘अष्टलक्ष्मी’ परिकल्पना से प्रेरित है, जिसका उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित करना है। ‘अष्टलक्ष्मी’ पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को संदर्भित करती है, जिन्हें प्रधानमंत्री भारत के विकास का आठ स्तंभ मानते हैं। इस परिकल्पना के तहत, इन राज्यों की अनूठी पहचान, कला, संगीत, नृत्य, और शिल्प को बढ़ावा दिया जा रहा है। एनएमसीएम का लक्ष्य देश के हर कोने की सांस्कृतिक धरोहर का दस्तावेजीकरण करना और उसे संरक्षित करना है। यह प्रदर्शनी इसी व्यापक लक्ष्य का एक हिस्सा है, जो पूर्वोत्तर की अद्भुत विविधता को सामने ला रही है। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने इस अवसर पर श्री चंचल कुमार का स्वागत किया और मिशन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला, जिससे प्रदर्शनी का महत्व और बढ़ गया।
कला और अर्थव्यवस्था का मेल: पूर्वोत्तर की पहचान
पूर्वोत्तर भारत की ये पारंपरिक शिल्प कलाएँ केवल कला का प्रदर्शन नहीं हैं, बल्कि ये क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी हैं। बेल-मेटल के बर्तन, बाँस के उत्पाद और विभिन्न प्रकार की पॉटरी शिल्पकारों और उनके परिवारों के लिए आजीविका का साधन हैं। इन कलाकृतियों को बढ़ावा देने से स्थानीय कारीगरों को सशक्तिकरण मिलता है और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। यह एक सतत विकास मॉडल है जहाँ परंपराओं का सम्मान करते हुए आधुनिक बाजार की जरूरतों को भी पूरा किया जाता है। इन शिल्पों की मांग न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी तेजी से बढ़ रही है, जो इनकी विशिष्टता और गुणवत्ता को दर्शाता है। ये उत्पाद न केवल सौंदर्यपूर्ण होते हैं, बल्कि अक्सर पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ भी होते हैं, जो इन्हें और भी आकर्षक बनाता है।
सांस्कृतिक संरक्षण का महत्व
आधुनिक युग में जहाँ वैश्विक संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है, ऐसे में पारंपरिक शिल्पों और कलाओं का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। पूर्वोत्तर की पारंपरिक शिल्प प्रदर्शनी जैसे आयोजन हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं और नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित कराते हैं। ये शिल्प कलाएँ प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीवन जीने का संदेश देती हैं, क्योंकि इनमें से अधिकतर उत्पाद स्थानीय और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके बनाए जाते हैं। यह न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है, बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा देता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को और गति मिलती है। सरकार और विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों के ऐसे प्रयास सराहनीय हैं जो इन अमूल्य कला रूपों को लुप्त होने से बचाते हैं और उन्हें एक नई पहचान प्रदान करते हैं।
भविष्य की ओर एक कदम
इस तरह की प्रदर्शनियाँ न केवल अतीत की कला को प्रस्तुत करती हैं बल्कि भविष्य के लिए एक सेतु भी बनती हैं। ये शिल्पकारों को नए बाजारों और अवसरों से जोड़ती हैं, उन्हें अपनी कला को और विकसित करने के लिए प्रेरित करती हैं। राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन का प्रयास है कि देश की हर कला को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाया जाए ताकि वह विश्व भर में सुलभ हो सके। यह तकनीक और परंपरा का एक सुंदर मेल है। दिल्ली में यह प्रदर्शनी न केवल पूर्वोत्तर की कला का उत्सव थी, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी प्रतीक थी। यह हमें याद दिलाती है कि हमारे देश की विविधता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। अधिक जानकारी के लिए आप सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं: mib.gov.in। यह प्रदर्शनी हमें प्रेरित करती है कि हम अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करें और उसे भविष्य की पीढ़ियों के लिए सहेज कर रखें, ताकि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनी रहे।

