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    Home » भारतीय ज्ञान-मीमांसा: मिथिला विवि में व्याख्यान
    बिहार राष्ट्रीय शिक्षा

    भारतीय ज्ञान-मीमांसा: मिथिला विवि में व्याख्यान

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 23, 2026No Comments5 Mins Read
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    भारतीय ज्ञान-मीमांसा
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    लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता

    दरभंगा, 23 जून। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग, दर्शनशास्त्र विभाग एवं डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्वावधान में पीजी संस्कृत विभाग सभागार में ‘भारतीय ज्ञान-मीमांसा के विविध आयाम’ विषय पर एक महत्वपूर्ण एकल व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और सामान्य जिज्ञासुओं को भारतीय ज्ञान-मीमांसा के गहन सिद्धांतों से अवगत कराना था, जो भारतीय दर्शन का एक अविभाज्य अंग है। यह व्याख्यान आधुनिक संदर्भ में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब सत्य और असत्य का भेद करना अधिक चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।

    ज्ञान-मीमांसा का महत्व: अज्ञान से आनंद की ओर

    कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय के सह आचार्य डॉ. विकास सिंह ने भारतीय दर्शन में ज्ञान-मीमांसा के गहन महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि मानव दुःख का मूल कारण अज्ञान है, और सत्य ज्ञान के माध्यम से ही आनंदमय जीवन की प्राप्ति संभव है। डॉ. सिंह ने भारतीय दर्शन के विभिन्न संप्रदायों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने के तरीकों और उसके परिणामों पर विस्तृत चर्चा की। उनके अनुसार, भारतीय परंपरा में ज्ञान केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा साधन है जो व्यक्ति को अज्ञान के बंधन से मुक्त कर परम सुख की ओर ले जाता है। उन्होंने अविद्या (अज्ञान) को समस्त दुखों का मूल बताया और सत्य के विभिन्न रूपों तथा उनकी प्राप्ति के साधनों पर गहन विवेचन किया। यह व्याख्यान वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ज्ञान के सही अर्थ को समझने और उसे जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा देता है।

    मोक्ष और आत्म-साक्षात्कार से संबंध

    इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत झा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान-मीमांसा केवल बौद्धिक विमर्श तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मोक्ष और आत्म-साक्षात्कार जैसे आध्यात्मिक लक्ष्यों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने ज्ञान-मीमांसा को तत्त्वमीमांसा (तत्वज्ञान) और नीतिशास्त्र (आचारशास्त्र) के साथ भारतीय दर्शन के तीन प्रमुख आधार स्तंभों में से एक बताया। डॉ. झा ने समझाया कि ज्ञान की तलाश भारतीय परंपरा में केवल दार्शनिक जिज्ञासा नहीं है, बल्कि यह जीवन के परम उद्देश्य, अर्थात् दुखों से मुक्ति और आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानने की दिशा में एक यात्रा है। यह इंगित करता है कि भारतीय दर्शन में ज्ञान और मुक्ति अविभाज्य हैं।

    भारतीय दर्शन में ज्ञान-मीमांसा के विविध आयाम

    भारतीय ज्ञान-मीमांसा भारतीय दर्शन की वह शाखा है जो ज्ञान की प्रकृति, उसके स्रोतों, उसकी वैधता और उसकी सीमाओं का अध्ययन करती है। इसे ‘प्रमाणशास्त्र’ भी कहा जाता है, जहाँ ‘प्रमाण’ का अर्थ है वैध ज्ञान के स्रोत। भारतीय दार्शनिकों ने ज्ञान प्राप्त करने के विभिन्न साधनों पर गहन विचार किया है। प्रमुख प्रमाणों में प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष बोध या इंद्रिय अनुभव), अनुमान (तर्क या अनुमान लगाना), उपमान (तुलना), और शब्द (विश्वसनीय ग्रंथों या व्यक्तियों के वचन) शामिल हैं। कुछ दर्शनों में अर्थापत्ति (अर्थ का अनुमान) और अनुपलब्धि (अनुपस्थिति का ज्ञान) जैसे अतिरिक्त प्रमाणों को भी स्वीकार किया गया है। इन सभी प्रमाणों का उद्देश्य सही ज्ञान प्राप्त करना और भ्रांति को दूर करना है, जिससे व्यक्ति जीवन के सत्य को समझ सके।

    न्याय दर्शन, उदाहरण के लिए, प्रमाणों के व्यवस्थित अध्ययन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जबकि वेदान्त दर्शन उपनिषदों के ‘शब्द’ प्रमाण को सर्वोच्च मानता है। बौद्ध दर्शन और जैन दर्शन भी ज्ञान के विभिन्न साधनों और उनकी सीमाओं पर अपने अनूठे दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। यह विविधता ही भारतीय दर्शन की richness है, जहाँ प्रत्येक संप्रदाय ज्ञान के स्वरूप और उसकी प्राप्ति के मार्ग पर अपनी गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। ज्ञानमीमांसा हमें यह समझने में मदद करती है कि हम दुनिया को कैसे जानते हैं और क्या हम अपने ज्ञान पर भरोसा कर सकते हैं। यह न केवल अकादमिक स्तर पर महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारे दैनिक जीवन के निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।

    कार्यक्रम की विस्तृत सहभागिता और सफलता

    यह व्याख्यान केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह ज्ञान के प्रति गहरी आस्था और जिज्ञासा का प्रतीक था। कार्यक्रम में दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. शिखर वासिनी, डॉ. संजीव कुमार साह, मुकेश कुमार झा सहित 50 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से सहभागिता की। यह व्यापक उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि भारतीय पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों में आज भी व्यापक रुचि है और लोग ऐसे विचारों पर गंभीर विमर्श के लिए उत्सुक हैं। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. ममता स्नेही द्वारा किया गया, जबकि स्वागत उद्बोधन डॉ. संजीव कुमार साह ने दिया। अंत में, फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने सभी उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। ऐसे आयोजनों से न केवल अकादमिक वातावरण समृद्ध होता है, बल्कि यह नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और दार्शनिक विरासत से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करता है। [INTERNAL_LINK_HOLDER]

    भविष्य की दिशा और भारतीय दर्शन का प्रभाव

    यह व्याख्यान भारतीय ज्ञान-मीमांसा के क्षेत्र में और अधिक शोध और चर्चा के लिए एक मंच प्रदान करता है। भारतीय दर्शन की गहराई और उसकी व्यावहारिकता आज भी विश्व को शांति और ज्ञान का मार्ग दिखा सकती है। भारतीय ज्ञान-मीमांसा हमें सिखाती है कि सत्य की खोज एक सतत प्रक्रिया है, और प्रत्येक व्यक्ति को अपने अनुभव, तर्क और विश्वसनीय स्रोतों के माध्यम से इसे प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय जैसे संस्थान ऐसे आयोजनों के माध्यम से इस परंपरा को जीवित रखने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह ज्ञान, जो सदियों से हमारी धरोहर रहा है, आज भी मानव अस्तित्व के fundamental प्रश्नों का उत्तर देने की क्षमता रखता है। इन विषयों पर और अधिक जानकारी के लिए आप भारतीय दर्शन पर विकिपीडिया पृष्ठ देख सकते हैं।

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