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    Home » सूचना आयुक्तों की नियुक्ति: ‘बंटवारे’ की राजनीति | राष्ट्र संवाद
    राजनीति राष्ट्रीय संपादकीय

    सूचना आयुक्तों की नियुक्ति: ‘बंटवारे’ की राजनीति | राष्ट्र संवाद

    Devanand SinghBy Devanand SinghApril 10, 2026No Comments3 Mins Read
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    जनप्रतिनिधियों की त्याग भावना
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    सूचना आयुक्तों की नियुक्ति पर सवाल: क्या ‘बंटवारे’ की राजनीति पर लगेगा विराम?

    देवानंद सिंह
    झारखंड में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर शासन-प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कांग्रेस, झामुमो और भाजपा के बीच आपसी सहमति से इन पदों का ‘बंटवारा’ किया गया था। यदि यह सच है, तो यह न केवल सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 की मूल भावना के खिलाफ है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी गहरा आघात पहुंचाता है।
    राज्यपाल द्वारा इस नियुक्ति प्रक्रिया को लौटाना एक महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम माना जा सकता है। यह निर्णय संकेत देता है कि संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों में निष्पक्षता और पारदर्शिता से समझौता स्वीकार्य नहीं है। सूचना आयोग जैसे संस्थान, जो आम नागरिकों को शासन से जवाबदेही सुनिश्चित कराने का अधिकार देते हैं, उनकी निष्पक्षता पर किसी भी प्रकार का संदेह पूरे तंत्र को कमजोर करता है।
    राजनीतिक दलों के बीच ‘सहमति’ लोकतंत्र में असामान्य नहीं है, लेकिन जब यह सहमति योग्यता और निष्पक्षता को दरकिनार कर केवल राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए हो, तो यह चिंता का विषय बन जाती है। सूचना आयुक्त का पद किसी दल विशेष का प्रतिनिधित्व करने के लिए नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए होता है। ऐसे में इन पदों पर राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े व्यक्तियों की नियुक्ति, और वह भी कथित बंटवारे के आधार पर, सवालों के घेरे में आना स्वाभाविक है।
    यह भी आवश्यक है कि चयन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो। चयन समिति की सिफारिशें, उम्मीदवारों की योग्यता और उनके चयन के आधार सार्वजनिक किए जाएं, ताकि आम जनता को यह भरोसा हो सके कि नियुक्तियां निष्पक्ष तरीके से की गई हैं। सुप्रीम कोर्ट भी समय-समय पर इस प्रकार की नियुक्तियों में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जोर देता रहा है।
    इस पूरे प्रकरण ने राजनीतिक दलों की नैतिक जिम्मेदारी को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। यदि वास्तव में पदों का बंटवारा हुआ है, तो यह आत्ममंथन का समय है। जनता अब अधिक जागरूक है और वह केवल राजनीतिक बयानबाजी से संतुष्ट नहीं होती।
    यह मामला केवल कुछ नियुक्तियों का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं की साख का है। राज्यपाल का हस्तक्षेप एक अवसर है प्रक्रिया को सुधारने, पारदर्शिता स्थापित करने और जनता के विश्वास को पुनः अर्जित करने का। अब यह जिम्मेदारी राजनीतिक दलों और सरकार की है कि वे इस अवसर का सही उपयोग करें और यह साबित करें कि लोकतंत्र में जनता का विश्वास सर्वोपरि है।

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