बातचीत की आड़ में बढ़ता युद्ध: पश्चिम एशिया का खतरनाक मोड़
देवानंद सिंह
पश्चिम एशिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां कूटनीति और युद्ध साथ-साथ चल रहे हैं और यही सबसे बड़ा खतरा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां ईरान के साथ बातचीत का दावा कर रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि मिसाइलें गिर रही हैं, शहर दहल रहे हैं और आम नागरिक इसकी सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं।
ईरान द्वारा इजराइल और खाड़ी देशों पर लगातार हमले, और उसके जवाब में इजराइल की बेरूत पर बमबारी, इस बात का संकेत हैं कि यह संघर्ष सीमित नहीं रहने वाला। क्षेत्रीय शक्तियों के साथ-साथ वैश्विक ताकतों की प्रत्यक्ष और परोक्ष भागीदारी ने इसे और जटिल बना दिया है। ऐसे में “बातचीत” की बात तब तक खोखली लगती है, जब तक जमीन पर हिंसा थमती नहीं।
ट्रंप द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दी गई समयसीमा बढ़ाना एक रणनीतिक नरमी का संकेत हो सकता है, लेकिन ईरान का स्पष्ट इनकार इस पूरे दावे को संदेह के घेरे में खड़ा करता है। अगर बातचीत वास्तव में हो रही होती, तो कम से कम उसके संकेत तनाव में कमी के रूप में दिखते। लेकिन यहां तो स्थिति उलट है हमले तेज हो रहे हैं, बयानबाजी आक्रामक होती जा रही है।
इस संघर्ष का सबसे खतरनाक पहलू इसका संभावित विस्तार है। खाड़ी देशों में हमलों, ड्रोन हमलों की नाकामी और मिसाइल अलर्ट ने यह साफ कर दिया है कि यह युद्ध किसी एक देश तक सीमित नहीं रहेगा। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद होता है, तो इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। तेल की कीमतों में उछाल इसका शुरुआती संकेत है।
मानवीय दृष्टिकोण से स्थिति और भी भयावह है। हजारों लोगों की मौत, लाखों के जीवन पर संकट, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं पर खतरा—ये सब संकेत हैं कि यह संघर्ष केवल सैन्य नहीं, बल्कि मानवीय आपदा में बदलता जा रहा है।
ऐसे समय में सबसे बड़ी जरूरत है विश्वसनीय और पारदर्शी कूटनीति की। आधे-अधूरे दावे, राजनीतिक बयानबाजी और शक्ति प्रदर्शन इस संकट को और गहरा ही करेंगे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी अब दर्शक बने रहने के बजाय सक्रिय भूमिका निभानी होगी, वरना यह संघर्ष एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है।
अंततः सवाल यही है क्या दुनिया एक और लंबे और विनाशकारी युद्ध की ओर बढ़ रही है, या अभी भी संवाद के जरिए इसे रोका जा सकता है? फिलहाल हालात यह संकेत दे रहे हैं कि अगर जल्द ठोस पहल नहीं हुई, तो “बातचीत” केवल एक शब्द बनकर रह जाएगी और युद्ध ही वास्तविकता तय करेगा।

