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    Home » मोहन भागवत का आईना दिखाता संदेश
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    मोहन भागवत का आईना दिखाता संदेश

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 8, 2026No Comments5 Mins Read
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    नेपाल की राजनीति
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    मोहन भागवत का संदेश: सुरक्षा, समरसता और राष्ट्र दृष्टि

    सीमाओं के पार हिंदू सुरक्षा से लेकर भीतर की सामाजिक समरसता तक

    देवानंद सिंह:-
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत का हालिया बयान केवल एक संगठनात्मक वक्तव्य नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की बदली हुई राजनीतिक–सामाजिक परिस्थितियों में भारत की वैचारिक दृष्टि, सुरक्षा चिंताओं और सामाजिक दर्शन को एक साथ सामने रखने वाला संदेश है। बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति, भारत के भीतर जनसांख्यिकीय बदलाव, अवैध घुसपैठ, जातिगत भेदभाव और मुस्लिम बहुल इलाकों में संघ की कार्यशैली इन सभी मुद्दों को जोड़ते हुए भागवत ने यह स्पष्ट किया है कि संघ का दृष्टिकोण केवल राष्ट्रवाद तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास से भी जुड़ा है।

    मोहन भागवत का यह कहना कि यदि बांग्लादेश के लगभग सवा करोड़ हिंदू अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए डटकर खड़े होते हैं, तो उन्हें दुनिया भर के हिंदुओं का समर्थन मिलेगा—अपने आप में दूरगामी राजनीतिक और वैचारिक अर्थ रखता है। यह बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश में तख्तापलट, सत्ता परिवर्तन और कट्टरपंथी तत्वों की सक्रियता के बीच अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं, पर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं।
    प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद पैदा हुए सत्ता शून्य और छात्र नेतृत्व वाले ‘जुलाई विद्रोह’ ने जिस तरह से अस्थिरता को जन्म दिया, उसका सीधा असर समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ा। भारत विरोधी कट्टरपंथी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद भड़की हिंसा ने यह संकेत दिया कि राजनीतिक असंतोष किस तरह सांप्रदायिक हिंसा में बदल सकता है। ऐसे माहौल में भागवत का बयान बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए मनोवैज्ञानिक संबल है, तो दूसरी ओर यह भारत की सांस्कृतिक जिम्मेदारी का भी संकेत देता है।
    हालांकि आलोचक इसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देख सकते हैं, लेकिन संघ इसे मानवाधिकार और सांस्कृतिक एकजुटता के चश्मे से देखता है। यह संदेश यह भी दर्शाता है कि भारत अब अपने पड़ोस में हो रहे अत्याचारों को केवल कूटनीतिक भाषा तक सीमित नहीं रखना चाहता।

    भागवत का यह कथन कि “अब भारत को कोई तोड़ नहीं सकता” केवल एक नारा नहीं, बल्कि पिछले कुछ दशकों के अनुभवों से निकला आत्मविश्वास है। उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों पर जनसंख्या पैटर्न में हो रहे बदलावों की अनदेखी का आरोप लगाया और इसके लिए जन्म दर तथा अवैध घुसपैठ को जिम्मेदार ठहराया।
    यह मुद्दा लंबे समय से भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा है। अवैध घुसपैठ केवल सीमा सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन, संसाधनों के बंटवारे और राष्ट्रीय पहचान से भी जुड़ा विषय है। भागवत की अपील कि लोग अवैध घुसपैठियों को पहचानें और पुलिस को सूचना दें, यह दिखाती है कि संघ इस मुद्दे को केवल सरकार के भरोसे नहीं छोड़ना चाहता, बल्कि समाज की भागीदारी को भी आवश्यक मानता है।

    संघ की फंडिंग को लेकर उठने वाले सवालों पर भागवत का जवाब उसकी कार्यशैली को रेखांकित करता है। स्वयंसेवकों से जुटाए गए संसाधन, होटलों के बजाय कार्यकर्ताओं के घरों में ठहरना और अपना टिफिन साथ रखना ये बातें संघ की उस छवि को मजबूत करती हैं, जिसमें सादगी और अनुशासन को संगठन की रीढ़ माना जाता है।
    यह संदेश अप्रत्यक्ष रूप से उस राजनीति से भी तुलना करता है, जहां बड़े-बड़े कॉर्पोरेट चंदे और भव्य आयोजनों के जरिए शक्ति प्रदर्शन किया जाता है। संघ अपने लिए ‘साधन’ नहीं, ‘साधना’ की बात करता है।
    जातिगत भेदभाव पर स्पष्ट रुख
    “ब्राह्मण होना कोई योग्यता नहीं और SC-ST होना कोई अयोग्यता नहीं”—भागवत का यह बयान संघ के भीतर और बाहर, दोनों जगह गहरे अर्थ रखता है। लंबे समय से संघ पर यह आरोप लगता रहा है कि वह जातिगत ढांचे को मजबूत करता है। लेकिन इस बयान के जरिए उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि संघ की नेतृत्व संरचना जाति आधारित नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण आधारित है।
    उन्होंने सही ही कहा कि यदि भेदभाव मिटाना है, तो पहले मन से जाति का विचार निकालना होगा। यह एक सामाजिक संदेश है, जो केवल संघ कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है।

    मुस्लिम बहुल इलाकों में संघ की कार्यशैली पर भागवत की टिप्पणी महत्वपूर्ण है। उनका यह कहना कि संघ टकराव से बचता है और अपशब्दों का जवाब नहीं देता, यह दर्शाता है कि संघ खुद को केवल विरोध की राजनीति तक सीमित नहीं रखना चाहता। यह नीति व्यावहारिक भी है, क्योंकि लगातार प्रतिक्रिया संघर्ष को बढ़ाती है, समाधान नहीं देती।
    संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दिया गया यह संदेश बताता है कि संगठन अपने अगले चरण में सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय सुरक्षा को साथ लेकर चलना चाहता है।

    मोहन भागवत का यह बयान एक साथ कई स्तरों पर संवाद करता है—सीमाओं के पार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, देश के भीतर जनसांख्यिकीय संतुलन, सामाजिक समानता और संगठनात्मक सादगी। यह स्पष्ट है कि संघ खुद को केवल एक सांस्कृतिक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का सक्रिय पक्षकार मानता है। सवाल यह नहीं कि इन बयानों से कौन सहमत या असहमत है, बल्कि यह है कि क्या भारतीय समाज इन मुद्दों पर गंभीर, संतुलित और संवेदनशील बहस के लिए तैयार है। क्योंकि अंततः राष्ट्र की मजबूती केवल सीमाओं से नहीं, बल्कि समाज की एकता से तय होती

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