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    Home » क्षत्रियों की विरासत अतुलनीय और गौरवशालीः सरयू राय
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    क्षत्रियों की विरासत अतुलनीय और गौरवशालीः सरयू राय

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarJanuary 19, 2026No Comments4 Mins Read
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    क्षत्रियों की विरासत अतुलनीय और गौरवशालीः सरयू राय

    राष्ट्र संवाद संवाददाता

    जमशेदपुर। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा है कि क्षत्रिय समाज का अतीत, उसका विरासत अतुलनीय है। उन्होंने साझी विरासत को मजबूत करने और सनातन संस्कृति को भी मजबूत करने पर विशेष बल दिया।

    आदित्यपुर में झारखंड क्षत्रिय संघ के बैनर तले आयोजित परिवार मिलन समारोह में सरयू राय ने कहा कि धर्म, समाज, देश और संस्कृति के लिए लड़ने का उम्दा इतिहास क्षत्रियों के अलावे किसी और का नहीं है। हम लोगों ने अपने आत्मबल और रणनीति के माध्यम से इतिहास में एक ऐसा मुकाम कायम किया, जहां तक पहुंचना किसी के लिए भी संभव नहीं है।

    उन्होंने ऐसे आयोजनों की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे सम्मेलनों में एक साथ वक्त व्यतीत करने का मौका मिलता है। हम लोग अतीत से जुड़ते हैं। अतीत से जुड़ने का फायदा यह होता है कि हम अपने वर्तमान और भविष्य के बारे में अपनी भूमिका तय कर पाते हैं, चिंतन कर पाते हैं। हमारी अपनी परंपराएं हैं, विरासत हैं, इतिहास का गौरवशाली पक्ष है। हमें उन्हें भी याद करने का मौका मिलता है।

    सरयू राय ने कहा कि आज हम इस विरासत के तले ही यहां उपस्थित हैं। वर्तमान और भविष्य में भी, चाहे जिस तरह का भी समाज रहे, जिस तरह की व्यवस्था रहे, हमारी विरासत सदैव हमारे लिए गौरवशाली रहेगी, हमारे अभिमान का कारण रहेगी।

    उन्होंने कहा कि आज समाज में जिस तरह की लड़ाईयां हो रही हैं, उसकी तुलना क्षत्रिय समाज के गौरवशाली अतीत से नहीं हो सकती है। शासन अपने लिए ही प्रचार-प्रसार का साधन इकट्ठा करने लगता है। भीलों ने अपने लिए कुछ नहीं किया। उनके योगदान को समाज ने संभाल कर कर रखा, इस तरह से चित्रित किया कि जब तक यह सृष्टि है, उनके योगदान को कोई बिसार नहीं पाएगा।

    उधर, सिदगोड़ा टाउन हॉल में चंद्रवंशी एकता मंच के तत्वावधान में आयोजित वनभोज कार्यक्रम* में सरयू राय ने कहा कि चंद्रवंशी समाज अपने आपको महाराज जरासंध का वारिस मानता है। जरासंध उनके प्रतीक पुरुष हैं। जरासंध की वीरता, उनकी अन्य विशेषताएं प्रशंसनीय हैं लेकिन हमको यह देखना चाहिए कि महाराज जरासंध राजा कंस के नजदीकी रिश्तेदार थे। श्रीकृष्ण के मामा थे कंस। जब श्रीकृष्ण ने कंस को मार दिया, तब जरासंध ने मथुरा पर इतने हमले किये कि श्रीकृष्ण को मथुरा छोड़ कर जाना पड़ा। उन्होंने कहा कि कुंती, श्रीकृष्ण की बुआ थीं। वह पांडु वंश की थीं। भीष्म पितामह उनके पूर्वज थे। भीष्म ने अपने जीवनकाल में महान त्याग किया। भीष्म के पिता की लालसा थी कि वह निषाद वंश की कन्या से विवाह करें तो उन्होंने (भीष्म ने) आजीवन शादी न करने का व्रत ले लिया। ये सारी कड़ियां उसी कालखंड की हैं और एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इसलिए हमें पूरी विरासत को साझा विरासत के रुप में देखना चाहिए। उसमें से कोई क्षत्रिय हो गया, कोई चंद्रवंशी हो गया, कोई कुछ और वंश का हो गया है। हमें साझी विरासत को आगे बढ़ाना चाहिए, तभी हमारी सनातन संस्कृति की रक्षा हो सकेगी। अगर सनातन संस्कृति नहीं रहेगी, तो जितने महापुरुष हैं, जिनका हम नाम लेते हैं, उनमें से किसी को कोई याद नहीं करेगा। अरब से, यूरोप से कोई दूसरे ही महापुरुष आ जाएंगे। यह समय की जरूरत है कि हम लोग साझी विरासत के रुप में देश को, इसकी सनातन संस्कृति को मजबूत करें।

    भविष्य में वही अपना हक लेगा, जो शिक्षित होगा

    उधर, सोनारी के ट्राइबल कल्चर सेंटर में कानू समाज के वनभोज कार्यक्रम में सरयू राय ने कहा कि कानू विकास संघ से उनका आत्मीय रिश्ता रहा है। यह समाज इसलिए आगे बढ़ रहा है क्योंकि इस समाज ने बच्चों की पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया है। आज भी जिन दर्जन भर बच्चों को पारितोषिक दिया गया है, उत्कृष्टता का प्रमाणपत्र दिया है, वे सभी 95 प्रतिशत अंक लाकर उतीर्ण हुए है। वह कई वर्षों से कानू विकास संघ के वार्षिक कार्यक्रम में आ रहे हैं और उन्होंने पाया कि हर वर्ष बच्चे-बच्चियों का शिक्षा के प्रति लगाव बढ़ता ही जा रहा है। भविष्य में वही समाज आगे बढ़ेगा और अपना हक लेगा, जो शिक्षित होगा। शिक्षा भविष्य में विकास का सबसे सशक्त हथियार होगा। जो पढ़ेगा वह आगे बढ़ेगा।

    क्षत्रियों की विरासत अतुलनीय और गौरवशालीः सरयू राय
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