निर्णायक भूमिका के लिए कांग्रेस को अपने भीतर चल रहे आत्मसंघर्ष और अनिच्छा से बाहर निकलने की जरूरत
देवानंद सिंह
भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान दौर में सबसे बेचैन करने वाला प्रश्न यह नहीं है कि सत्ता कितनी मजबूत है, बल्कि यह है कि विकल्प कितना कमजोर हो गया है। लोकतंत्र सत्ता और विपक्ष, इन दो ध्रुवों के संतुलन से चलता है। जब एक ध्रुव असामान्य रूप से ताकतवर और दूसरा लगातार दिशाहीन होता जाए, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है। आज कांग्रेस इसी प्रश्न के केंद्र में खड़ी है। एक ऐसी पार्टी, जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी, संविधान को आकार दिया, लोकतांत्रिक संस्थाओं को जन्म दिया, और दशकों तक सत्ता तथा विपक्ष दोनों भूमिकाओं को निभाया। लेकिन आज वही कांग्रेस अपने अस्तित्व, अपनी भूमिका और अपने नेतृत्व को लेकर असमंजस में दिखती है।
यह संकट केवल चुनाव हारने या सत्ता से बाहर रहने का नहीं है। भारतीय राजनीति में कई दल लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहे और फिर वापसी की। संकट कांग्रेस के भीतर चल रहे आत्मसंघर्ष का है, उस अनिच्छा का, जो उसे निर्णायक भूमिका निभाने से रोक रही है। कांग्रेस आज उस चौराहे पर खड़ी है, जहां से दो ही रास्ते निकलते हैं या तो स्पष्ट नेतृत्व, स्पष्ट संघर्ष और स्पष्ट दिशा, या फिर धीरे-धीरे राजनीतिक अप्रासंगिकता की ओर बढ़ता हुआ अवसान।
कांग्रेस के अधिकांश प्रवक्ता, नेता और समर्थक आज जिस सबसे आसान तर्क का सहारा लेते हैं, वह है“मीडिया बिक चुका है।” इसमें आंशिक सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता। मुख्यधारा का बड़ा हिस्सा आज सत्ता की भाषा बोलता है, सवालों से अधिक प्रचार में रुचि रखता है, लेकिन यह सच्चाई कांग्रेस की विफलताओं पर परदा नहीं डाल सकती। इतिहास गवाह है कि जब कोई राजनीतिक आंदोलन जमीन पर मजबूत होता है, तो मीडिया को भी अंततः उसकी अनदेखी करना कठिन हो जाता है। समस्या यह है कि कांग्रेस ने मीडिया को दुश्मन मानकर उससे लड़ने की रणनीति तो बना ली, लेकिन जनता से सीधे संवाद का कोई ठोस ढांचा नहीं खड़ा किया। टीवी स्टूडियो में बहस जीतना राजनीति नहीं होती। राजनीति गांव में, मोहल्ले में, कारखाने में, खेत में और विश्वविद्यालय में होती है। कांग्रेस आज भी मीडिया के उसी फ्रेम में खुद को देखने की कोशिश कर रही है, जिसे वह पक्षपाती मानती है। यह एक बुनियादी विरोधाभास है।
संस्थाओं पर सवाल, लेकिन रणनीति में भ्रम
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगाते हैं कि लोकतंत्र के स्तंभ, चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई, मीडिया, यहां तक कि कभी-कभी न्यायपालिका सत्ता के प्रभाव में हैं। यह बहस जरूरी है और कई मामलों में तथ्यात्मक भी, लेकिन सवाल यह है कि इसके बाद रणनीति क्या है?
हर चुनाव के बाद सवाल उठाना, हर संवैधानिक संस्था पर संदेह जताना, और फिर न्यायपालिका की शरण में जाना, यह राजनीति नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया है। संघर्ष की राजनीति प्रतिक्रिया से नहीं, पहल से चलती है। यदि, कांग्रेस को लगता है कि चुनावी प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं, तो उसे केवल अदालतों में याचिकाएं दाखिल करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे एक जनांदोलन का मुद्दा बनाना चाहिए। क्या कभी चुनाव सुधार, संस्थागत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संतुलन को लेकर कांग्रेस ने देशव्यापी संघर्ष छेड़ा? जवाब निराशाजनक है।
‘जनता अपने आप खड़ी होगी’। एक खतरनाक भ्रम
कांग्रेस के भीतर एक गहरी मानसिक थकान दिखती है। यह थकान उस कथन में झलकती है। जिस दिन जनता खड़ी होगी, उस दिन सब बदल जाएगा। यह कथन इतिहास, राजनीति और समाज—तीनों की गलत समझ पर आधारित है। जनता कभी स्वतः खड़ी नहीं होती। जनता को विचार से, संगठन से, नेतृत्व से और संघर्ष से
खड़ा किया जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय जनता अपने आप खड़ी नहीं हुई थी, उसे खड़ा किया गया था। आपातकाल के बाद सत्ता परिवर्तन अपने आप नहीं हुआ था, विपक्षी एकजुटता और जनसंघर्ष ने रास्ता बनाया था। आज कांग्रेस जिस प्रतीक्षा की राजनीति में फंसी है, वह उसे धीरे-धीरे निष्क्रिय बना रही है। राजनीति में प्रतीक्षा हमेशा पतन की ओर ले जाती है।
यह कांग्रेस की सबसे बड़ी त्रासदी है कि उसके पास आज भी वह सब कुछ है, जो किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए
इतिहास, वैचारिक विरासत और एक स्थायी सामाजिक आधार पर एक जीवनरेखा होती है। मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस का वोट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। वह आज भी हर राज्य, हर ज़िले, हर विधानसभा में मौजूद है। लेकिन यह उपस्थिति निष्क्रिय है, बिखरी हुई है और नेतृत्वविहीन है। संगठन के निचले स्तर पर कार्यकर्ता भ्रमित है, उसे नहीं पता कि पार्टी की लड़ाई किस दिशा में है। शीर्ष नेतृत्व स्पष्ट संदेश नहीं देता, और मध्य स्तर केवल संतुलन साधने में लगा रहता है। नतीजा यह है कि कांग्रेस का सबसे बड़ा संसाधन उसका कैडर हतोत्साहित है। कांग्रेस में नेतृत्व का प्रश्न अक्सर व्यक्ति-केंद्रित गांधी परिवार बनाम गैर-गांधी परिवार बहस में बदल जाता है, लेकिन असली संकट व्यक्ति का नहीं, प्रक्रिया का है। पार्टी में निर्णय कैसे लिए जाते हैं? असहमति को कैसे देखा जाता है? नेतृत्व उभरता कैसे है? आज कांग्रेस में न तो स्पष्ट आंतरिक लोकतंत्र है, न ही नेतृत्व चयन की पारदर्शी प्रक्रिया। नतीजा यह है कि या तो शीर्ष पर चुप्पी रहती है, या फिर विरोधाभासी बयान सामने आते हैं। एक पार्टी जो पूरे देश को नेतृत्व देने का दावा करती है, वह अपने भीतर नेतृत्व निर्माण की प्रक्रिया तक स्थापित नहीं कर पाई, यह अपने आप में गंभीर चेतावनी है।
कांग्रेस की राजनीति आज मुख्यतः संसद और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सिमट गई है। जबकि सत्ताधारी राजनीति सड़क, सोशल मीडिया, सांस्कृतिक विमर्श और भावनात्मक अपील—हर स्तर पर सक्रिय है। विपक्ष यदि केवल संसदीय प्रक्रियाओं तक सीमित रहेगा, तो वह हमेशा पीछे रहेगा। सड़क से सदन तक संघर्ष का अर्थ केवल धरना-प्रदर्शन नहीं है। इसका अर्थ निरंतर जनसंवाद, वैकल्पिक नैरेटिव, स्थानीय मुद्दों पर संगठित हस्तक्षेप और सत्ता की हर कार्रवाई पर राजनीतिक जवाब है। कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह सत्ता को केवल संवैधानिक शब्दावली में चुनौती देगी या राजनीतिक साहस के साथ। आज कांग्रेस जिस सबसे बड़े संकट से जूझ रही है, वह आधे फैसले हैं। न वह पूरी तरह आक्रामक है, न पूरी तरह आत्ममंथन में ईमानदार। न वह नेतृत्व परिवर्तन का साहस दिखाती है, न नेतृत्व को खुली ताकत देती है। यह मध्य मार्ग उसे कहीं नहीं ले जाएगा। इतिहास ऐसे दलों को माफ नहीं करता, जो अपने निर्णायक क्षणों में अस्पष्ट रहते हैं। कांग्रेस को या तो यह स्वीकार करना होगा कि वह सत्ता के वैकल्पिक केंद्र के रूप में पूरी ताकत से खड़ी होगी, या फिर ईमानदारी से यह कहना होगा कि वह अब उस भूमिका में नहीं है।
यह प्रश्न केवल कांग्रेस का नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का है। जब विकल्प कमजोर होता है, तो सत्ता निरंकुश होती जाती है। जब विपक्ष डरता है, तो संस्थाएं झुकती हैं। जब नेतृत्व भ्रमित होता है, तो समाज दिशाहीन होता है। कांग्रेस का पतन केवल एक पार्टी का पतन नहीं होगा; यह लोकतांत्रिक संतुलन के कमजोर पड़ने का संकेत होगा। इसलिए कांग्रेस का आत्मनिरीक्षण केवल उसका आंतरिक मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है। कुल मिलाकर, कांग्रेस के सामने यह ऐतिहासिक क्षण है। यह समय स्मृतियों, प्रतीकों और अतीत की गौरवगाथाओं का नहीं है। यह समय स्पष्ट निर्णय, साहसिक नेतृत्व और वैचारिक स्पष्टता का है। या तो कांग्रेस निर्भीक होकर, संगठित होकर, जनता के बीच जाकर कमान संभाले या फिर यह स्वीकार करे कि वह अपने ऐतिहासिक दायित्व को निभाने में असफल रही है, क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति यह नहीं होती कि सत्ता मजबूत हो जाए, सबसे खतरनाक स्थिति यह होती है कि विकल्प कमजोर पड़ जाए।

