बिहार के चुनावी इतिहास में इस बार का असाधारण जनादेश कई मायनों में महत्वपूर्ण – देवानंद सिंह
बिहार के चुनावी इतिहास में इस बार का जनादेश कई मायनों में असाधारण रहा। सामान्यतः राज्य की राजनीति में टक्कर, ध्रुवीकरण, जातीय समीकरण और आख़िरी क्षण तक अनिश्चितता बनी रहती है, परंतु इस बार जो परिणाम सामने आए, उन्होंने लगभग सभी अनुभवी विश्लेषकों और राजनीतिक दलों के अनुमान ध्वस्त कर दिए। प्रचार अभियान के दौरान जिस संघर्षपूर्ण मुकाबले की तस्वीर उभर रही थी, वह अंततः केवल एक भ्रम साबित हुई। जनता ने न तो महागठबंधन के बदलाव के आह्वान पर विश्वास किया और न ही प्रशांत किशोर की तथाकथित नई राजनीति के प्रयोग को स्वीकार करने का मन बनाया।
चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण आने वाले दिनों में विस्तृत रूप से किया जाता रहेगा, किन्तु समग्र रूप में यह परिणाम कई गहरे संदेश छोड़ता है, जो न केवल बिहार की आगामी राजनीति, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभाव डालेंगे। इस चुनावी वातावरण की नींव उस समय रखी गई, जब राज्य सरकार ने विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू कराई। यह प्रशासनिक अभियान, जिसका उद्देश्य मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण और अद्यतन का दावा था, जल्द ही राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन गया। महागठबंधन ने इसे खुलकर “मतों की चोरी” की साज़िश के रूप में प्रस्तुत किया।
यह भी सत्य है कि इस प्रक्रिया के दौरान आम लोगों को काग़ज़ी झंझट, पहचान सत्यापन और आवागमन जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कई स्थानों पर लोग नाराज़ भी दिखे। ऐसा प्रतीत होने लगा था कि यह असंतोष बदलाव की लहर को जन्म दे सकता है, परंतु अंत में जनता ने इसे आवश्यक प्रक्रिया मानकर स्वीकार कर लिया। गहराई से देखा जाए तो बिहार के मतदाता अक्सर प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर कठोर रुख़ अपनाते हैं, परंतु वे यह भी पहचानते हैं कि राज्य की व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए कभी-कभी ऐसे कठिन कदम उठाने पड़ते हैं।
दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ओर से सबसे अधिक जिस शब्द का प्रयोग किया गया, वह था, जंगलराज। पिछले दो दशकों में बिहार में हुए कोई भी चुनाव इस प्रभाव से मुक्त नहीं रहे। चाहे लालू-राबड़ी शासनकाल की यादें हों, अपराध और अपहरण का पुराना दौर हो या प्रशासनिक सुस्ती की छवि—इन सभी का संदर्भ बार-बार उछाला गया। दिलचस्प तथ्य यह है कि लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी अब सक्रिय राजनीति में वैसे शामिल नहीं हैं, परंतु उनका राजनीतिक प्रतिरूप आज भी बिहार की राजनीतिक स्मृति में जीवित है। इस बार भी एनडीए ने इसे पूरी ताक़त से हवा दी। तेजस्वी यादव पूरी मुहिम के दौरान इस नैरेटिव को तोड़ने में लगे रहे कि पुराना दौर अब वापस नहीं आएगा। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि बिहार की आज की युवा पीढ़ी नई सोच रखती है और अपराध-प्रशासन के प्रश्न बदल चुके हैं।
उन्होंने अपराध को लेकर पलटवार करते हुए नीतीश सरकार पर आरोप लगाए, यह कहते हुए कि तंत्र फिर से ढीला हुआ है और पुराने तरीके लौट रहे हैं। लेकिन जनता ने इसे मन से स्वीकार नहीं किया। इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि तेजस्वी ने अपने चुनावी वादों, विशेषकर हर घर नौकरी के नारे, को लेकर कोई ठोस रूपरेखा नहीं दी। बिहार की जनता भली-भांति समझती है कि सरकारी नौकरी की प्रक्रिया कितनी जटिल है। अतः यह वादा युवाओं को आकर्षित तो कर गया, परंतु भरोसा नहीं जगा सका।
इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि नीतीश कुमार गठबंधन के चेहरे तो थे, परंतु इस बार उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया। यह स्थिति पिछले बीस वर्षों में पहली बार बनी। साथ ही, उनके स्वास्थ्य को लेकर भी अनेक तरह की चर्चाएं चलती रहीं। लेकिन जब परिणाम सामने आए, तो यह स्पष्ट हो गया कि नीतीश कुमार का राजनीतिक ब्रैंड अब भी बिहार की राजनीति पर सबसे गहरी छाप रखता है।
नीतीश नौ बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। उन्होंने कई बार राजनीतिक पाला बदला, कभी भाजपा का साथ छोड़ा, फिर लौटे, कभी महागठबंधन का हिस्सा बने। इन सभी उतार-चढ़ाव के बावजूद उनका व्यक्तिगत विश्वास जनता के मन में कायम रहा। इसकी बड़ी वजह उनकी बेदाग़ छवि और प्रशासनिक सख़्ती है। बिहार जैसे जटिल सामाजिक ढांचे वाले राज्य में एक साफ़ सार्वजनिक छवि बड़ी पूंजी है, और नीतीश इसे बार-बार साबित कर चुके हैं।
दोनों चरणों में रिकॉर्ड मतदान हुआ। आमतौर पर जब मतदान का प्रतिशत बढ़ता है, तो माना जाता है कि परिवर्तन की लहर चल रही है। इस बार भी विश्लेषक यह मानकर चल रहे थे कि जनता बदलाव का संकेत देना चाहती है, परंतु जिस बदलाव को महागठबंधन या अन्य दल प्रदर्शित करना चाहते थे, जनता ने उसे ठोस विकल्प के रूप में नहीं देखा।
राजनीति में परिवर्तन तभी संभव होता है, जब जनता को आगे ले जाने वाला व्यक्ति या दल उसे अधिक विश्वसनीय लगे। बिहार में आज भी यह विश्वास नीतीश के पास है। परिणामों ने साफ़ बता दिया कि जनता ने स्थिरता, अनुभव और प्रशासनिक विश्वसनीयता को प्राथमिकता दी है। यह चुनाव इसलिए भी याद रखा जाएगा कि बिहार में पहली बार फ्रीबीज की खुली घोषणा देखने को मिली। दोनों खेमों में महिलाओं और युवाओं को आकर्षित करने की होड़ लगी रही।
नीतीश सरकार की ओर से चुनाव से कुछ ही दिन पहले लगभग डेढ़ करोड़ महिलाओं के खातों में दस हज़ार रुपये भेजे गए। यह जनसांख्यिकीय समूह पहले से ही शराबबंदी की वजह से नीतीश समर्थक माना जाता है। ऐसे में यह कदम निर्णायक साबित हुआ। महागठबंधन ने भी युवा बेरोज़गारों को सरकारी नौकरी का वादा किया, परंतु भरोसे की कमी और तंत्र की सीमाओं ने इसका प्रभाव कम कर दिया।
प्रशांत किशोर ने बिहार में अपनी पार्टी के माध्यम से नई राजनीति का नारा दिया था। उन्होंने जनसुराज अभियान के दौरान गांव-गांव जाकर संवाद स्थापित किए, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को बहस के केंद्र में रखा, परंतु चुनावी नतीजों में इसका असर दिखाई नहीं दिया। अपेक्षाएं ज्यादा थीं, क्योंकि वह पहले कई राजनीतिक दलों के रणनीतिकार रह चुके थे, परंतु जनता ने प्रयोग के बजाय स्थिरता को प्राथमिकता दी। इसी प्रकार AIMIM और अन्य छोटे दल भी कोई प्रभाव नहीं छोड़ सके। इससे यह संदेश स्पष्ट गया कि बिहार की जनता अभी भी द्विध्रुवीय राजनीति के ढांचे से बाहर आने को तैयार नहीं है।
आरजेडी और कांग्रेस के लिए यह समय गहरे आत्ममंथन का है। सीटों पर तालमेल आख़िरी समय तक न हो पाना उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। विपक्ष को सत्ता विरोधी लहर को संगठित रूप से भुनाने का अवसर मिला था, परंतु वे सामंजस्यहीनता और नेतृत्व के अभाव में उसे खो बैठे। सबसे बड़ा प्रश्न अब यह है कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा। नीतीश को न स्वीकारा गया और न नकारा गया। यह स्थिति राजनीतिक रूप से बेहद रोचक है। सबसे बड़ा उलटफेर यह हुआ कि भाजपा राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिससे सरकार पर उसकी छाप और मजबूत होगी। भविष्य में भाजपा की भूमिका न केवल सरकार संचालन में बढ़ेगी, बल्कि वह अब राज्य की नीतिगत दिशा भी तय करने की स्थिति में होगी। यह बदलाव बिहार की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित करेगा।
बिहार का यह जनादेश केवल एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि जनता का परिपक्व निर्णय भी है। इसने यह साफ़ किया है कि जनता भावनात्मक नारों से परे जाकर ठोस नेतृत्व चाहती है। स्थिरता अभी भी अनिश्चित प्रयोगों पर भारी पड़ती है। राजनीतिक स्मृति और पुराने शासनकाल की छवि अब भी निर्णायक कारक बनी हुई है। जनकल्याण योजनाओं के सीधे लाभ राज्य की राजनीति में सबसे प्रभावी साधन हैं, और अंततः, नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के सबसे मजबूत और स्थायी स्तंभ बने हुए हैं। बिहार ने हमेशा की तरह इस बार भी स्पष्ट संदेश दिया है कि विश्वास ही राजनीति की सबसे बड़ी पूंजी है।

