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    Home » क्या बिहार में इस बार भी ‘लाल’ लहर दिखेगी?
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    क्या बिहार में इस बार भी ‘लाल’ लहर दिखेगी?

    News DeskBy News DeskNovember 5, 2025No Comments7 Mins Read
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    मतदाता सूची पर सियासत
    नेपाल की राजनीति
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    क्या बिहार में इस बार भी ‘लाल’ लहर दिखेगी?
    देवानंद सिंह
    साल 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव वाम दलों के लिए किसी राजनीतिक पुनर्जागरण से कम नहीं था। दशकों के सूखे और हाशिए पर चले जाने के बाद वाम दलों ख़ासकर सीपीआई (एमएल), सीपीआई और सीपीएम ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों में अपनी उपस्थिति का एहसास एक बार फिर मज़बूती से कराया था। तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा था इन चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया है कि वामपंथ को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। बिहार में उस समय का यह प्रदर्शन न केवल संगठनात्मक ऊर्जा का संकेत था, बल्कि उस वैचारिक पुनर्प्रतिष्ठा का भी प्रतीक था, जो पिछले दो दशकों में वाम दलों से लगभग छिन चुकी थी।

     

    लेकिन राजनीति में स्थायित्व कभी सुनिश्चित नहीं होता। 2021 में जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए, तो वाम दलों को एक भी सीट हासिल नहीं हो सकी। यह परिणाम 34 वर्षों तक शासन कर चुके बंगाल के वाम आंदोलन के इतिहास के लिए किसी झटके से कम नहीं था। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक जैसे राज्यों में भी वाम की उपस्थिति लगभग नगण्य रही। और फिर 2024 के लोकसभा चुनावों में भी वाम दलों की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं देखा गया। यह जरूर है कि बिहार में कुछ स्थानों पर उनके प्रदर्शन ने यह संकेत ज़रूर दिया कि वाम राजनीति का केंद्र अब दक्षिण या पूर्व नहीं, बल्कि उत्तर भारत का यह राज्य बन सकता है। अब जबकि बिहार फिर से चुनावी समर में उतर चुका है, वाम दलों की नज़रें एक बार फिर बिहार की जनता पर टिकी हैं। इस बार भी सीपीआई (एमएल) (लिबरेशन), सीपीआई और सीपीएम तीनों ही दल महागठबंधन का हिस्सा हैं और साझा मोर्चे के तहत मैदान में उतरे हैं। सीटों का बंटवारा तय हो चुका है, सीपीआई (एमएल) 20, सीपीएम 4 और सीपीआई 9 सीटों पर लड़ रही है। तीनों दलों के नेताओं का दावा है कि इस बार 2020 से भी बेहतर नतीजे आएंगे, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी उम्मीदें जमीनी हक़ीक़तों से मेल खाती हैं?

     

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2020 में वाम दलों का प्रदर्शन आंशिक रूप से कोविड-19 की परिस्थितियों का परिणाम था। उस समय बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर अपने घर लौटे थे। आर्थिक संकट, बेरोज़गारी और सरकारी तंत्र की उदासीनता ने वर्गीय असमानता के सवाल को फिर से प्रमुख बनाया। यही वाम की राजनीति की ज़मीन है, और उस समय वह ज़मीन उपजाऊ थी, हालांकि वह यह भी जोड़ती हैं कि 2024 के लोकसभा चुनावों में वाम और आरजेडी गठबंधन ने मगध-शाहाबाद बेल्ट में फिर से अच्छा प्रदर्शन किया। यह इलाका गया, औरंगाबाद, नवादा, अरवल और जहानाबाद जैसे ज़िलों के साथ ऐतिहासिक रूप से वर्ग संघर्षों का गवाह रहा है। शाहाबाद के भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर ज़िले भी वाम की परंपरागत ज़मीन रहे हैं। कुल मिलाकर इन दोनों क्षेत्रों में 36 विधानसभा सीटें आती हैं, और इन्हीं में वाम दलों की सबसे मज़बूत पकड़ मानी जाती है। जानकारों का कहना है कि 2020 में वाम दलों की कुछ हारें बहुत कम मार्जिन से हुई थीं। भोरे, बछवाड़ा और आरा जैसी सीटों पर 500 से भी कम वोटों का फ़ासला था। उदाहरण के तौर पर, भोरे सीट पर जेडीयू के सुनील कुमार ने माले के जीतेंद्र पासवान को महज़ 462 वोटों से हराया था, जबकि बछवाड़ा में सीपीआई उम्मीदवार अवधेश कुमार राय और बीजेपी प्रत्याशी के बीच का फ़ासला 500 से भी कम था। आरा में माले के कयामुद्दीन अंसारी मात्र 3,000 वोटों से हार गए थे।

     

    इस बार भोरे से माले ने जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष धनंजय को मैदान में उतारा है, जबकि आरा में एक बार फिर कयामुद्दीन अंसारी मैदान में हैं। दिलचस्प यह है कि बेगूसराय की बछवाड़ा, बिहार शरीफ़, राजापाकड़ और करगहर जैसी कुछ सीटों पर कांग्रेस और सीपीआई दोनों ने उम्मीदवार उतार दिए हैं, यानी महागठबंधन के भीतर ही टकराव की स्थिति बन गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन सीटों पर आपसी संघर्ष का फ़ायदा सीधे-सीधे एनडीए को मिलेगा। सीपीआई को अपने संगठन की वर्तमान स्थिति देखते हुए कुछ सीटों पर पीछे हट जाना चाहिए था। राज्य की 33 सीटों पर लड़ रही लेफ़्ट पार्टियों में अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र हैं, लेकिन कुछ शहरी सीटें भी इस बार उनके लिए अहम हैं। जैसे दीघा, फुलवारी, राजगीर और बिहार शरीफ़, दीघा में पिछले तीन बार से बीजेपी का दबदबा रहा है, और इस बार माले ने यहां से अपनी इकलौती महिला उम्मीदवार दिव्या गौतम को उतारा है। फुलवारी में माले के मौजूदा विधायक के सामने जेडीयू के दिग्गज नेता श्याम रजक हैं, जिनकी छवि एक सेक्युलर और जनसंपर्क-सक्षम नेता की रही है।

     

    जानकारों के अनुसार, एनडीए की फ्रीबीज़ पॉलिटिक्स ने वाम दलों के एजेंडे को कमजोर किया है। पहले वाम जिन मुद्दों पर जनसमर्थन जुटाते थे। अब वे सरकार की ‘मुफ़्त योजनाओं’ में समा गए हैं। मुफ़्त राशन, लाल कार्ड, बिजली सब्सिडी जैसी योजनाओं ने उस वर्गीय असंतोष को कुंद कर दिया है जो वाम के लिए ऊर्जा का स्रोत हुआ करता था। वाम दलों की असली ताकत संगठनात्मक नेटवर्क और महिला मतदाताओं तक पहुंच में है। वे न केवल ग़रीबों और मज़दूरों के बीच, बल्कि महिलाओं में भी वैचारिक एकजुटता पैदा करने की क्षमता रखते हैं। नीतीश कुमार की कल्याणकारी योजनाएं प्रभावशाली ज़रूर हैं, लेकिन वाम राजनीति इन योजनाओं के ‘भाषाई फ्रेम’ को चुनौती देती है, यानी विकास को दान नहीं, अधिकार के रूप में पेश करती है। दरअसल, यही वह वैचारिक बिंदु है, जो बिहार में वाम दलों की राजनीति को जीवित रखता है। यहां वाम का संघर्ष केवल सीट जीतने का नहीं, बल्कि वैकल्पिक राजनीतिक विमर्श को जीवित रखने का है, यहां मुख्यधारा की राजनीति जाति और फ्रीबीज़ के इर्द-गिर्द घूमती है, वहीं वाम दल अब भी वर्ग, असमानता और सामाजिक न्याय की भाषा में बात करते हैं।

     

    फिर भी वाम के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। पार्टी का युवा नेतृत्व सीमित है, संगठनात्मक ढांचा बूढ़ा हो चुका है, और गांवों में उनकी पैठ पहले जैसी नहीं रही। परंतु यह भी सच है कि बिहार ही वह राज्य है, जहां वर्ग संघर्ष की राजनीति ने ऐतिहासिक रूप से जनाधार पाया था, चाहे वह भोजपुर आंदोलन का दौर रहा हो या मगध में भूमिहीन किसानों का संघर्ष। यही कारण है कि वाम की वापसी की सबसे अधिक संभावना भी यहीं देखी जाती है।
    इस बार के चुनाव में वाम की सफलता कई बातों पर निर्भर करेगी कि क्या वह महागठबंधन के भीतर अपने एजेंडे को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर पाता है? क्या उम्मीदवारों के चयन में स्थानीय सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखा गया है? और सबसे अहम, क्या वाम दल जनता को यह भरोसा दिला पाएंगे कि वे अब भी राजनीति को वैचारिक रूप दे सकते हैं?

    2020 में लाल झंडे फिर से लहराए थे, लेकिन 2025 में यह सिर्फ़ रंग का नहीं, विश्वास का सवाल है। बिहार की राजनीति जाति और सत्ता के समीकरणों में बंटी रही है, ऐसे में अगर वाम दल इन सीमाओं को पार कर वैकल्पिक राजनीति की नई परिभाषा गढ़ते हैं, तो यह न केवल बिहार बल्कि पूरे देश के राजनीतिक परिदृश्य के लिए संकेतक हो सकता है। आने वाले हफ़्तों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या बिहार फिर से ‘लाल’ होगा या यह लहर 2020 की तरह एक अस्थायी झोंका साबित होगी, लेकिन इतना तय है,  वाम राजनीति अब भी भारतीय लोकतंत्र में उस बहस को जीवित रखती है, जो सत्ता नहीं, व्यवस्था के स्वरूप पर सवाल उठाती है। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।

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