भारत! माँ भारती का पुत्र कहलाने वाला यह देश, जहाँ वेदों में मातृदेवो भव की गूँज सदियों से गूँजती रही, आज उसी ममता के क्षय से कराह रहा है। सिद्धार्थनगर की उस सूखी तालाब की मिट्टी में दफन नवजात की चीख, सिर्फ एक बच्चे की हत्या नहीं—यह पूरे मानव समाज की आत्मा पर वार है। जब माँ की कोख से निकला मासूम, पॉलीथीन की काली थैली में लिपटा कचरे की तरह फेंक दिया जाए, तो समझिए कि हमारा समाज अब ममता का मरुस्थल बन चुका है। यह दर्द सिर्फ उत्तर प्रदेश का नहीं, पूरे भारत का है—जहाँ हर रोज ऐसी कहानियाँ जन्म लेती हैं, और मर जाती हैं। बांसी कोतवाली की यह घटना कोई अचानक दुर्घटना नहीं। विधवा महिला, पति की मौत के बाद मायके की शरण में। गांव का युवक, शादी का झांसा, डेढ़ साल के शारीरिक संबंध। गर्भ ठहरा, तो दबाव। बच्चा पैदा हुआ, तो प्रेमी का बहाना: “बीमार है, ICU में रखना पड़ेगा।” और फिर—नवजात की लाश सूखे तालाब के किनारे। महिला की तहरीर में छिपा दर्द बताता है कि ममता यहाँ दोहरी हत्या का शिकार हुई,पहले बच्चे की, फिर माँ की। वह माँ, जो खुद शिनाख्त करने गई, पुलिस बुलाई—क्या उसकी ममता भी प्रेमी के धोखे में दफन हो गई! समाज ने उसे अकेला छोड़ा, और प्रेमी ने बच्चे को। यहाँ सवाल सिर्फ हत्यारे का नहीं। क्या वह महिला भी दोषी नहीं, जो बच्चे को प्रेमी के हवाले कर आई! या समाज दोषी है, जो विधवाओं को कलंक की नजर से देखता है, अवैध संबंधों को पाप ठहराता है, लेकिन सहारा नहीं देता! पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है, लेकिन सच्चाई साफ है की कैसे ममता की कमी ने एक जिंदगी छीन ली! भारत की नारी—वह जो दुर्गा है, लक्ष्मी है, सरस्वती है—आज ममता की कमी से खोखली हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2023 रिपोर्ट बताती है की हर साल हजारों नवजात शिशु हत्या के शिकार होते हैं, ज्यादातर अवैध गर्भ या लिंग भेद के कारण। उत्तर भारत में लड़कियों की हत्या तो आम, लेकिन लड़के की यह बलि बताती है कि अब ममता लिंग से परे होकर स्वार्थ की शिकार है! शहरीकरण ने गाँवों को शहर बना दिया, लेकिन परिवारों को तोड़ दिया। मायके-ससुराल की जंजीरें टूटीं, लेकिन सहारा खत्म। प्रेम अब शादी का वादा नहीं, शारीरिक भूख। गर्भ ठहरा तो बोझ। अस्पताल का बहाना, ICU की झूठी कहानी—यह सब सोशल मीडिया युग की देन है, जहाँ सच्चाई इंस्टाग्राम रील्स में दफन हो जाती है। शिक्षा बढ़ी, लेकिन नैतिकता घटी। महिलाएँ स्वतंत्र हुईं, लेकिन ममता की जड़ें कमजोर। फेमिनिज्म की आड़ में स्वार्थ पनपा, और बच्चा कचरा बन गया! सोचिए उस नवजात की। आँखें खुली भी न होंगी, दूध की पहली बूँद नसीब न हुई। माँ की गोद की जगह पॉलीथीन। तालाब की मिट्टी में दफन चीखें। यह दर्द सिर्फ माँ का नहीं—हम सब का। क्योंकि जब माँ बच्चे को फेंक दे, तो समाज की नींव हिल जाती है। वृद्धाश्रमों में माँ-बाप अकेले, गटर में नवजात—यह चक्र कहाँ रुकेगा! कोतवाली प्रभारी की बात सही है कि यह मासूम की हत्या और ममता के क्षय का उदाहरण। लेकिन उदाहरण से आगे बढ़ें तो कार्रवाई। कानून सख्त हों देश का। अवैध संबंधों में गर्भ की जिम्मेदारी दोनों पर। सेक्स एजुकेशन स्कूलों में अनिवार्य। विधवाओं के लिए सरकारी सहारा, मनोवैज्ञानिक मदद। गाँवों में जागरूकता अभियान: ममता कोई कमजोरी नहीं, ताकत है। भारत के मानव समाज! यह दर्द भरा लेख कोई सनसनी नहीं, चेतावनी है। सिद्धार्थनगर की तालाब आज सूखी है, कल पूरे देश की ममता सूख जाएगी। माँ की ममता खत्म हुई तो देश खोखला नहीं, खाक में मिल जाएगा। उठो, जागो। हर महिला में माँ देखो, हर बच्चे में भविष्य। नहीं तो अगली पॉलीथीन में तुम्हारा अपना सपना लिपटा मिलेगा।बमातृदेवो भव—यह सिर्फ मंत्र नहीं, जीवन है। बचाओ इसे, वरना हम सब मर चुके होंगे।
– इंद्र यादव / स्वतंत्र लेखक,
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