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    प्रकाश और पूजा का दिव्य संगम

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीOctober 22, 2025No Comments4 Mins Read
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    उजागर रातों की कविता
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    शरद ऋतु में त्योहारों की खुशियाँ चारों ओर छा जाती हैं। इस समय का आकर्षण ऐसा होता है कि समय कैसे बीतता है, पता ही नहीं चलता। ऐसे ही आनंदमय समय में असम और पूरे भारतवर्ष के जन-जीवन के द्वार पर दीपावली का प्रकाशमय और गौरवशाली उत्सव दस्तक देता है।

     

     

    हालाँकि यह उत्सव केरल की कोई सामाजिक परंपरा नहीं है, फिर भी इसका एक समृद्ध इतिहास और संस्कृति है। यह उत्सव शक्ति के विनाश और भय पर चिरकालिक विजय की स्थापना करता है। भारतीय संस्कृति में दीपावली का प्रकाश उत्सव और काली पूजा को धार्मिक आस्था से विशेष रूप से महिमामंडित किया गया है। कुछ भाषाओं में इसे श्यामा पूजा के नाम से भी जाना जाता है।

     

     

    वास्तव में, दीपावली और बलि पूजा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—एक बाह्य प्रकाश का उत्सव है, तो दूसरा उस प्रकाश के आंतरिक स्रोत की पूजा। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार बलि उत्सव से कई महान अनुष्ठान जुड़े हुए हैं। प्राचीन ग्रंथ ‘पद्मपुराण’ जैसे ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है, जो इसके प्राचीन परंपरा की ओर संकेत करते हैं।

     

     

    एक सामान्य विश्वास के अनुसार, यही वह दिन है जब भगवान श्रीराम चौदह वर्षों का वनवास समाप्त कर, रावण को पराजित कर लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। उनके विजयी लौटने की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर नगर को अद्भुत और अलौकिक रूप से सजा दिया था।

     

     

    इसलिए इस दिन को अंधकार पर प्रकाश और प्रकाश पर प्रकाश की विजय के रूप में याद किया जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार, दीपों का यह पर्व उसी दिन मनाया जाता है जब भगवान श्री विष्णु ने नवसुन्न नामक एक अमर को पृथ्वी पर कैद कर, उसकी जेल में बंद एक स्त्री को मुक्त किया था। इसे भी इस शुभ पर्व की शुरुआत के रूप में मान्यता प्राप्त है।

     

     

    इसी कारण, इस शुभ संध्या पर प्रत्येक घर में सुख और सौभाग्य की देवी महालक्ष्मी की पूजा की जाती है, जो त्योहार के आर्थिक और पारिवारिक पक्ष को उज्जवल बनाती है।

     

     

    काली पूजा में देवी काली की आराधना होती है। वह गहरे काले रंग की हैं, जो अतीत के अनियंत्रित, सुप्त निराकार सत्ता की शक्ति हैं। उनका नग्न शरीर उनकी असीम और शाश्वत प्रकृति का प्रतीक है। वे अतीत, वर्तमान और भविष्य—इन तीनों पर अपने दृष्टिकोण की एकता का प्रतिनिधित्व करती हैं।

     

     

    उनकी गरदन में पचास माला हैं, जो पचास यौन अंगों का प्रतीक हैं, जिनसे शब्द और प्रकाश की उत्पत्ति होती है। उनके ऊपर के बाएँ हाथ में तलवार है, जो अज्ञानता को काटने का प्रतीक है, जबकि नीचे के बाएँ हाथ में असुर के विनाश का संकेत है। उनका दाहिना हाथ भय से मुक्ति और लौकिक व आध्यात्मिक मंगल का आशीर्वाद प्रदान करता है।

     

     

    इस देवी ने महादेव को पहचान कर अपने विराट रूप को इस प्रकार स्थापित किया कि शक्ति की अविभाज्य ऊर्जा के रूप में स्वयं शिव भी प्रकट हो सके। इस तरह ब्रह्मांड की सृष्टि में शिव और शक्ति अभिन्न हैं।

     

     

    इस पूजा का एक राजकीय अर्थ भी है। काली पूजा के ठीक पहले वाले दिन को ‘भूत चतुर्दशी’ कहा जाता है। इस दिन पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए शाम को शरीर पर चौदह दीपक जलाए जाते हैं।

     

     

    दीपावली के दिन घर को साफ कर, दीपों और रोशनी से सजाया जाता है। यह सजावट केवल बाह्य नहीं होती, बल्कि यह मन और आत्मा की शुद्धता का प्रतीक होती है। दीपों की श्रृंखला अज्ञान के अंधकार को दूर करती है। यह सूर्य के प्रकाश से जीवन को भर देती है और एक अंत में एक नई शुरुआत का प्रतीक बनती है।

    अंत में कहा जा सकता है कि दीपावली भारतवर्ष में सुख, एकता और प्रकाश लाती है, वहीं काली पूजा समाज के हर व्यक्ति के जीवन में शक्ति, भक्ति और आंतरिक शांति की आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करती है।

    ये दोनों उत्सव बाह्य प्रकाश और आंतरिक ऊर्जा के एक अद्वितीय सम्मिलन हैं। आतिशबाजी और दीपों के क्षणिक प्रकाश के समानांतर, हमारे अंतःकरण में भक्ति, प्रेम और ज्ञान का शाश्वत प्रकाश भी प्रज्वलित होता है—यही है दीपावली और काली पूजा का मूल उद्देश्य।

    यह प्रकाश पर्व और काली पूजा व्यक्ति की सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक विकास का एक महान मंच है।

    —

    *मूल लेखिका*: मनीषा शर्मा
    *अनुवादक*: रितेश शर्मा
    *पता*: जलुकबाड़ी, गुवाहाटी
    *फोन नं.*: 7663026301

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