- राजद से नाराज़गी के बहाने झामुमो को अपनी दिशा तय करनी होगी
अमन शांडिल्य
झारखंड की राजनीति में एक बार फिर अस्मिता और आत्मसम्मान का प्रश्न उभर आया है। झामुमो नेता सुदिव्य सोनू का यह कहना कि “राजद ने हमें धोखा दिया” केवल चुनावी बयान नहीं, बल्कि झारखंड की पहचान और राजनीतिक सम्मान से जुड़ा एक गहरा संकेत है।
राजद का इतिहास झारखंड विरोध से भरा रहा है। यह वही पार्टी है जिसके सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कहा था — “झारखंड हमारी लाश पर बनेगा।”
आज वही राजद झामुमो की सरकार का हिस्सा है। यह दृश्य झारखंड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है — जिन्होंने झारखंड के अस्तित्व को नकारा, वही आज उसकी राजनीति की धुरी बन गए हैं।
गुरुजी की विरासत: आंदोलन से समझौते तक
शिबू सोरेन उर्फ गुरुजी झारखंड आंदोलन के सबसे बड़े प्रतीक रहे हैं। उन्होंने जंगल, जमीन और जल पर झारखंडियों के हक की लड़ाई लड़ी। पर आज उनकी पार्टी ऐसे गठबंधन में बंधी दिखती है, जिसने कभी झारखंडी अस्मिता को “विभाजनकारी राजनीति” बताया था।
गुरुजी की विरासत सम्मान और स्वाभिमान की थी, लेकिन सत्ता की राजनीति ने उसे धीरे-धीरे समझौतों की राजनीति में बदल दिया है।
हेमंत सोरेन की राजनीति सिद्धांत या समीकरण?
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखंड को नई दिशा देने का वादा किया था। लेकिन कांग्रेस और राजद के साथ गठबंधन ने उनकी वैचारिक स्थिति को कमजोर किया है।
यह सच है कि राजद और कांग्रेस के साथ रहकर झामुमो को मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं का समर्थन मिला, पर सवाल यह भी है कि इसके बदले में क्या झारखंडी पहचान को पीछे छोड़ दिया गया?
राजद हमेशा से झामुमो को बराबरी का नहीं, “छोटा साथी” मानता रहा है। चाहे सीट बंटवारे का मामला हो या नेतृत्व का सम्मान — हर बार झामुमो को समझौता करना पड़ा है।
भाजपा-आजसू से दूरी, राजद-कांग्रेस से निकटता — विरोधाभास स्पष्ट
यह भी एक राजनीतिक विडंबना है कि झामुमो आज उन दलों के साथ है जिन्होंने झारखंड के निर्माण का विरोध किया था, और उन दलों से दूर है जिन्होंने उसका समर्थन किया था।
भाजपा और आजसू राज्य निर्माण के समर्थक थे, जबकि राजद और कांग्रेस इसके विरोधी।
ऐसे में सवाल उठता है — क्या सत्ता का गठबंधन झारखंडी अस्मिता से बड़ा हो गया है?
झामुमो को तय करनी होगी अपनी दिशा
सुदिव्य सोनू का बयान झामुमो के भीतर की बेचैनी का संकेत है।
झारखंड की जनता यह भलीभांति समझती है कि आंदोलन से जन्मी पार्टी अगर अपने सिद्धांतों से समझौता करती है, तो उसकी विश्वसनीयता खत्म हो जाती है।
शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन को अब यह तय करना होगा कि वे झारखंड की अस्मिता के प्रतीक बने रहेंगे या सत्ता के समीकरणों के कैदी बनेंगे।
गुरुजी की विरासत सम्मान की थी — उसे किसी भी कीमत पर गठबंधन की मजबूरियों में गुम नहीं होने देना चाहिए।
