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    सरकार आलिम-फाज़िल की परीक्षा कॉलेज व यूनिवर्सिटी स्तर से ले पसमांदा नेता की मांग

    Nizam KhanBy Nizam KhanOctober 12, 2025No Comments3 Mins Read
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    सरकार आलिम-फाज़िल की परीक्षा कॉलेज व यूनिवर्सिटी स्तर से ले पसमांदा नेता की मांग

    उर्दू पर सियासत करने वालों को मौलाना रकीब की नसीहत।

    राष्ट्र संवाद सं जामताड़ा

    झारखंड के प्रमुख पसमांदा नेता मौलाना रकीब अंसारी ने कहा है कि राज्य सरकार को चाहिए कि आलिम और फाज़िल की परीक्षा कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी स्तर से ली जाए, ताकि मदरसा तालीम को मज़बूती मिल सके और छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने का रास्ता आसान बने। उन्होंने कहा कि मदरसों में चलने वाली वस्तानिया, फोकानिया और मौलवी परीक्षाओं के लिए झारखंड एकेडमिक काउंसिल द्वारा निर्धारित किताबें जारी की जानी चाहिए। मान्यता प्राप्त मदरसों और स्कूलों में वे किताबें समय पर पहुँचें, इसके लिए सरकार को ठोस व्यवस्था करनी चाहिए। मौलाना ने अफ़सोस जताया कि आज एक अजीब विडंबना सामने है जो लोग उर्दू शिक्षक बनने की प्रक्रिया में काउंसलिंग से छूट गए, वही लोग आज उर्दू बचाओ के नारे लगा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आलिम और फाज़िल डिग्री की मान्यता का सवाल केवल डिग्री का नहीं, बल्कि क़ाबिलियत और ईमानदारी का भी है।मौलाना अंसारी के मुताबिक, बहुत से लोग जो इस मुद्दे पर शोर मचा रहे हैं, उन्होंने शायद कभी वस्तानिया से फाज़िल तक की किताबें ढंग से न पढ़ी हैं, न देखी हैं। पाठ्यक्रम क्या है, कौन-सी किताब किस जमात में पढ़ाई जाती है, और उर्दू तालीम का असली मक़सद क्या है यह जानना तो दूर, कई लोगों को उर्दू में सही तरह से बोलना या लिखना भी नहीं आता, मौलाना ने आगे कहा कि जब ऐसे लोग उर्दू के नाम पर नेताओं से मुलाकातें करते हैं और राजनीति करने लगते हैं, तो वे उर्दू की सेवा नहीं बल्कि उसकी साख को नुक़सान पहुँचा रहे होते हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि किसी भी ज़बान की हिफ़ाज़त नारों या फोटो सेशन से नहीं, बल्कि इल्म, ईमानदारी और अदब की समझ से होती है। उर्दू वह ज़बान है जिसने हिंदुस्तान की तहज़ीब और मोहब्बत को जोड़ा है। इसे बचाने का हक़ उन्हीं को है जो इसे दिल से जानते और समझते हैं, मौलाना रकीब अंसारी ने यह भी कहा कि डिग्री हासिल कर लेना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन अगर उस डिग्री के पीछे का इल्म अधूरा रह जाए, तो वह सिर्फ़ एक काग़ज़ का टुकड़ा रह जाता है। अब वक़्त आ गया है कि हम डिग्री बचाओ से आगे बढ़कर उर्दू पढ़ाओ, समझाओ और निभाओ की ओर कदम बढ़ाएँ, वरना उर्दू का दर्द सिर्फ़ यादों और नारों में रह जाएगा।

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