लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
सवाल कारोबारी पर हैं और जवाब संघ के नाम से दिए जा रहे हैं, यह आदित्यपुर के ताजा विवाद का केंद्रीय विषय है।
सवाल कारोबारी पर हैं: विवाद की तह तक
आदित्यपुर में सांसद से कथित तनातनी को लेकर शुरू हुई कहानी अब केवल दो प्रभावशाली चेहरों के बीच रिश्तों की खटास तक सीमित नहीं रह गई है। जैसे-जैसे इस पूरे प्रकरण की परतें खुल रही हैं, वैसे-वैसे औद्योगिक संगठन, औद्योगिक भूखंड, सामाजिक संस्थाएं, कारोबारी प्रभाव और राजनीतिक संपर्क जैसे सवाल सामने आते जा रहे हैं। लेकिन इन सवालों का सीधा जवाब देने के बजाय यदि अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे प्रतिष्ठित संगठन का नाम सामने लाकर बहस को दूसरी दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, तो यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है।
आखिर सवाल किससे है? संघ से या उस व्यक्ति से, जिसके कथित आचरण और प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं?
यदि किसी व्यक्ति का संघ से संबंध रहा है, वह संघ के लोगों को जानता है या किसी समय किसी संगठनात्मक गतिविधि से जुड़ा रहा है, तो क्या इससे उसके कारोबारी व्यवहार पर उठने वाले सवाल खत्म हो जाते हैं? निश्चित रूप से नहीं। और यदि किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोप निराधार हैं, तो उसका सबसे मजबूत जवाब किसी संगठन का नाम नहीं, बल्कि दस्तावेज हो सकते हैं।यही इस पूरे विवाद का मूल बिंदु है।
पत्रकारिता में आरोप लगाना जितना आसान है, आरोपों को प्रमाणित करना उतना ही कठिन। लेकिन आरोप लगने के बाद जवाब देने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी कारोबारी पर औद्योगिक संगठन के प्रभाव, भूखंडों के इस्तेमाल, सामाजिक संस्थाओं से जुड़े आर्थिक लेन-देन या राजनीतिक संपर्कों के दुरुपयोग जैसे सवाल उठ रहे हैं, तो इनका जवाब भावनाओं और प्रतिष्ठा के सहारे नहीं दिया जा सकता।
मसलन, धर्मशाला से जुड़े कथित पांच लाख रुपये के दान का सवाल है। यदि राशि दी गई थी तो उसका हिसाब क्या है? किस निर्णय के आधार पर राशि दी गई? समिति या ट्रस्ट की अनुमति थी या नहीं? बैंक रिकॉर्ड क्या कहते हैं? बैठक की कार्यवाही क्या कहती है? इन सवालों का उत्तर सामने आ जाए तो विवाद का एक बड़ा हिस्सा अपने आप समाप्त हो सकता है।
इसी तरह आदित्यपुर के औद्योगिक भूखंडों को लेकर सवाल हैं तो रिकॉर्ड सामने आने चाहिए। किसे भूखंड मिला, किस उद्देश्य से मिला और उसका इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए हुआ या नहीं—यह प्रशासनिक दस्तावेजों से स्पष्ट किया जा सकता है। एसिया जैसे औद्योगिक संगठन की बैठकों और निर्णयों का रिकॉर्ड भी किसी व्यक्ति की छवि से कहीं अधिक विश्वसनीय जवाब दे सकता है।
फिर संघ का नाम बीच में क्यों?
यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए। किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संघ के खिलाफ आरोप मान लेना गलत है। उसी तरह संघ की प्रतिष्ठा को किसी व्यक्ति के लिए सुरक्षा कवच बना देना भी गलत है। संगठन अपनी जगह है और व्यक्ति की जवाबदेही अपनी जगह।
संघ की प्रतिष्ठा किसी व्यक्ति के व्यवहार की जिम्मेदारी नहीं ले सकती और किसी व्यक्ति पर लगे आरोप संघ की प्रतिष्ठा के खिलाफ स्वतः प्रमाण भी नहीं बन सकते।
इसलिए इस पूरे विवाद को ‘संघ बनाम कारोबारी’ बनाने की कोशिश दोनों पक्षों के लिए नुकसानदेह होगी। वास्तविक बहस तो ‘आरोप बनाम प्रमाण’ की होनी चाहिए।
और यही वह जगह है जहां सांसद और कारोबारी के बीच कथित दूरी का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि दोनों के बीच कभी नजदीकी थी और बाद में संबंधों में बदलाव आया, तो इसकी वास्तविक वजह क्या थी? क्या यह सामान्य राजनीतिक मतभेद था या इसके पीछे कोई कारोबारी अथवा संस्थागत कारण था? जनता को इस सवाल का जवाब अटकलों से नहीं, संबंधित पक्षों के स्पष्ट बयान और उपलब्ध तथ्यों से मिलना चाहिए।
प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ सवाल उठना अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है। लेकिन प्रभावशाली होना सवालों से ऊपर होने का प्रमाणपत्र भी नहीं है।
यही बात उन लोगों के लिए भी लागू होती है जो किसी व्यक्ति के खिलाफ लगातार आरोप लगा रहे हैं। पत्रकारिता को भी आरोपों से आगे बढ़कर प्रमाण की ओर जाना होगा। किसी को ‘सफेदपोश’ कह देना पर्याप्त नहीं। यह साबित करना होगा कि आखिर सफेदी के पीछे छिपा क्या है। और यदि कुछ नहीं छिपा है तो जांच और दस्तावेज उसी बात को साबित कर देंगे।
आदित्यपुर का औद्योगिक क्षेत्र किसी एक व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक खेमे का नहीं है। यहां हजारों उद्योगपति, कारोबारी, कर्मचारी और श्रमिक अपनी रोजी-रोटी से जुड़े हैं। इसलिए औद्योगिक संगठन की कार्यशैली अथवा औद्योगिक भूखंडों के इस्तेमाल पर उठने वाला सवाल व्यक्तिगत विवाद कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
अब जरूरत आरोपों की अगली कड़ी लिखने से ज्यादा सच की जांच करने की है।
जिसके खिलाफ आरोप हैं, वह दस्तावेज के साथ सामने आए। जिस संस्था पर सवाल हैं, वह अपना रिकॉर्ड सार्वजनिक करे। प्रशासन के पास यदि रिकॉर्ड है तो वह जांच करे। और यदि आरोप लगाने वाले पक्ष के पास प्रमाण हैं तो वे भी सामने रखे जाएं।
क्योंकि लोकतंत्र में किसी की प्रतिष्ठा केवल आरोपों से नहीं गिरनी चाहिए और किसी की प्रतिष्ठा केवल पद, संगठन या राजनीतिक पहुंच के कारण बचनी भी नहीं चाहिए।
सवाल अगर गंभीर हैं तो जवाब भी गंभीर होना चाहिए।
संघ की आड़ में सवालों को दबाना हो या संघ के नाम पर किसी व्यक्ति को निशाना बनाना दोनों ही रास्ते गलत हैं।
अधिक जानकारी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आधिकारिक वेबसाइट देखें।

