लेखक: मनीषा शर्मा
इतिहास और पुरातत्व के गहन समन्वय से रचित धर्मक्षेत्र की दस्तावेज नामक यह नई शोध-पुस्तिका पाठकों के लिए एक अनमोल धरोहर बनकर सामने आई है। यह ग्रंथ केवल कागज के पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता के उस गौरवशाली अतीत का जीवंत दस्तावेज है जिसे आधुनिक विज्ञान ने प्रमाणित किया है।
धर्मक्षेत्र की दस्तावेज: इतिहास और पुरातत्व का अनूठा संगम
इतिहास और विरासत की एक अनूठी खोज— विशिष्ट लेखिका मनीषा शर्मा के दीर्घकालीन गहन क्षेत्र-अध्ययन (Field Study) और निरंतर अनुसंधान का प्रतिफल, उनकी नई शोध-पुस्तिका अब पाठकों के बीच उपलब्ध है।
हरियाणा के ऐतिहासिक कुरुक्षेत्र, महाभारत की गाथा, श्रीमद्भगवद्गीता के अमर संदेश और प्रख्यात पुरातत्वविद डॉ. बी. बी. लाल के समग्र अनुसंधानों के आधार पर रचित यह पुस्तक इतिहास के कई अज्ञात और अनछुए अध्यायों का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
कुरुक्षेत्र केवल एक रणभूमि नहीं, बल्कि भारतीय धर्म और दर्शन का आदिपाठ है। सरस्वती नदी के विलुप्त होने से लेकर श्रीकृष्ण की कूटनीति के रहस्यों तक— इस ग्रंथ ने महाभारत के आख्यान को पुरातात्विक साक्ष्यों और वैज्ञानिक प्रमाणों के दर्पण में एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।
असम के अग्रणी प्रकाशन संस्थान “बनलता” द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का आवरण चित्र (Cover Design) डॉ. संजीव बोरा का है। इतिहास और पुरातत्व के एक निष्पक्ष समन्वय से रचित यह विशेष साहित्यिक प्रयास प्रबुद्ध समाज एवं पाठकों के हृदय को स्पर्श करेगा तथा पुरातात्विक अन्वेषण के क्षेत्र में एक नया आयाम प्रदान करेगा।
जो भी जिज्ञासु पाठक इस पुस्तक को प्राप्त करना चाहते हैं, वे कृपया नीचे दिए गए नंबरों पर संपर्क करें:
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पुरातात्विक प्रमाणों की रोशनी में महाभारत
इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि यह पौराणिक कथाओं को कपोल-कल्पना न मानकर उन्हें पुरातात्विक साक्ष्यों की कसौटी पर कसती है। डॉ. बी. बी. लाल जैसे मूर्धन्य पुरातत्वविद के उत्खनन कार्यों का हवाला देते हुए लेखिका ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि कुरुक्षेत्र की भौगोलिक और सांस्कृतिक निरंतरता हजारों वर्ष पुरानी है। सरस्वती नदी के सूखे प्रवाह पथ (पेलियो-चैनल) की उपग्रह से प्राप्त तस्वीरें और भूजल सर्वेक्षण के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह नदी कभी इस क्षेत्र की जीवन रेखा थी, जिसका वर्णन ऋग्वेद से लेकर महाभारत तक में मिलता है।
क्षेत्र-अध्ययन (Field Study) की प्रामाणिकता
मनीषा शर्मा ने अपनी इस पुस्तक में केवल पुस्तकालयों के सहारे शोध नहीं किया, बल्कि उन्होंने वर्षों तक कुरुक्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों का पैदल भ्रमण किया। उन्होंने स्थानीय लोक परंपराओं, मंदिरों के अभिलेखों, टीले (Mounds) की स्थिति और वहां प्राप्त मृद्भांड (Pottery) के टुकड़ों का सूक्ष्म अवलोकन किया। यह फील्ड स्टडी का ही परिणाम है कि पुस्तक में उन स्थलों का भी वर्णन मिलता है जो मुख्यधारा के पर्यटन मानचित्र से बाहर हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस प्रकार का जमीनी शोध भारतीय इतिहास लेखन में एक नई परंपरा की शुरुआत करता है।
प्रकाशन और प्रस्तुति का स्तर
असम स्थित प्रकाशन संस्थान बनलता ने इस पुस्तक को बेहद कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। डॉ. संजीव बोरा द्वारा डिजाइन किया गया आवरण चित्र स्वयं में एक कथ्य लिए हुए है, जो पाठक को पुस्तक खोलने से पहले ही उस कालखंड में ले जाता है। कागज की गुणवत्ता, मुद्रण की स्पष्टता और विषय-सूची की व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्रीय भाषाओं में भी विश्वस्तरीय शोध ग्रंथ प्रकाशित किए जा सकते हैं। यह हिंदी पट्टी के पाठकों के लिए गर्व का विषय है कि पूर्वोत्तर का एक प्रकाशन गृह हिंदी के इतने गंभीर विषय को इतनी गरिमा के साथ सामने लाया है।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि धर्मक्षेत्र की दस्तावेज केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक आंदोलन है— उस विचारधारा का आंदोलन जो इतिहास को मिथक के आवरण से निकालकर वैज्ञानिक तथ्यों के आलोक में देखना चाहती है। यह पुस्तक कुरुक्षेत्र के महत्व को पुनर्स्थापित करती है और नई पीढ़ी के शोधार्थियों को प्रेरित करती है कि वे अपनी विरासत को जानने के लिए केवल ग्रंथों पर नहीं, बल्कि धरती पर भी उतरें।

