कीर स्टार्मर की यात्रा से भारत-ब्रिटेन संबंधों को मिली नई उड़ान
देवानंद सिंह
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की हालिया भारत यात्रा ने दोनों देशों के बीच संबंधों को एक नई दिशा और ऊंचाई प्रदान की है। यह दौरा केवल औपचारिक राजनयिक संवाद नहीं था, बल्कि एक ऐसे व्यापक आर्थिक, तकनीकी और शैक्षिक गठजोड़ की नींव रखने का प्रयास था, जो आने वाले दशक में वैश्विक शक्ति-संतुलन पर भी असर डाल सकता है। जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रिटेन यात्रा के बाद हुआ यह उच्चस्तरीय संवाद, भारत-ब्रिटेन संबंधों के नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
स्टार्मर की यह यात्रा एक व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ की गई, जहां प्रतीकात्मकता से अधिक ध्यान परिणामों पर था। उनके साथ ब्रिटेन के उद्योग जगत के प्रमुख प्रतिनिधि, विश्वविद्यालयों के कुलपति, और इनोवेशन सेक्टर के निवेशक शामिल थे। यह स्पष्ट संदेश था कि ब्रिटेन भारत को केवल एक उभरते बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक साझेदार के रूप में देख रहा है, जिसके साथ मिलकर वह वैश्विक आर्थिक पुनर्गठन में भागीदार बन सकता है।
इस दौरे का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम विस्तृत आर्थिक और व्यापार समझौते के क्रियान्वयन को लेकर हुई सहमति रही। इस समझौते को अंतिम रूप देने के लिए एक जॉइंट कमिटी गठित करने की घोषणा की गई है। यह समझौता दोनों देशों के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है, क्योंकि इसके तहत भारत-ब्रिटेन व्यापार पर लगे टैरिफ में भारी कमी लाई जाएगी। इस डील के बाद ब्रिटेन से भारत आने वाले सामानों पर औसत टैरिफ 15% से घटकर मात्र 3% रह जाएगा, वहीं भारत से ब्रिटेन निर्यात होने वाले लगभग 99% उत्पादों पर टैरिफ पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। इसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों और ब्रिटिश उपभोक्ताओं दोनों पर पड़ेगा, जहां एक ओर भारतीय उद्योगों को नए बाजार मिलेंगे, वहीं ब्रिटिश उपभोक्ताओं को सस्ते और विविध उत्पाद उपलब्ध होंगे।
वर्तमान में दोनों देशों के बीच लगभग 56 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है। इस आंकड़े को 2030 तक दोगुना यानी 100 अरब डॉलर से अधिक करने का लक्ष्य रखा गया है। यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य तभी संभव है जब व्यापार बाधाओं को कम किया जाए और निवेश के प्रवाह को अधिक सुगम बनाया जाए। इसी दिशा में यह समझौता एक बड़ा कदम है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह साझेदारी ऐसे समय में हो रही है जब भारतीय उद्योग, विशेषकर टेक्सटाइल सेक्टर, अमेरिकी टैरिफ नीतियों से दबाव में है। अमेरिका द्वारा लगाए गए अतिरिक्त शुल्कों ने भारतीय निर्यात को नुकसान पहुंचाया है, जबकि चीन और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को कम टैरिफ का लाभ मिला है। अनुमान है कि अगले वर्ष भारत के टेक्सटाइल निर्यात में 10% तक गिरावट आ सकती है। ऐसे में ब्रिटेन के साथ यह समझौता भारतीय उद्योगों के लिए राहत लेकर आया है, क्योंकि यह उन्हें एक वैकल्पिक, स्थिर और लाभदायक बाजार प्रदान करेगा।
स्टार्मर की यात्रा का एक और ऐतिहासिक परिणाम शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में देखा गया। ब्रिटेन के 9 शीर्ष विश्वविद्यालयों को अब भारत में अपने कैंपस खोलने की अनुमति दी गई है। यह कदम शिक्षा क्षेत्र में एक संरचनात्मक परिवर्तन लेकर आएगा। अब भारतीय छात्रों को उच्च गुणवत्ता वाली ब्रिटिश शिक्षा अपने ही देश में प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। यह विशेष रूप से उन छात्रों के लिए राहत की बात है जो अमेरिका की कठोर वीज़ा नीतियों के कारण विदेश में पढ़ाई के अवसरों से वंचित हो रहे थे। भारत में ही विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की उपस्थिति से न केवल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी, बल्कि अनुसंधान, नवाचार और स्टार्टअप संस्कृति को भी बल मिलेगा।
यह पहल भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) की उस भावना से भी मेल खाती है जिसमें विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कार्य करने की अनुमति देने की बात कही गई थी। यह दिखाता है कि भारत अब केवल ज्ञान प्राप्तकर्ता नहीं बल्कि ज्ञान भागीदार बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
भारत और ब्रिटेन दोनों ही डिजिटल इनोवेशन के क्षेत्र में अग्रणी बनने की दिशा में काम कर रहे हैं। इस यात्रा के दौरान इंडिया-यूके टेक इनोवेशन पार्टनरशिप 2.0” की घोषणा की गई, जिसके तहत दोनों देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी, क्वांटम कंप्यूटिंग, और ग्रीन टेक्नोलॉजी पर संयुक्त अनुसंधान करेंगे।
ब्रिटेन ने भारत में ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में निवेश की इच्छा भी जताई है। यह केवल तकनीकी सहयोग नहीं बल्कि रणनीतिक तालमेल भी है, क्योंकि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था इन्हीं तकनीकों पर निर्भर करेगी। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टार्मर ने नई दिल्ली में कहा कि भारत के साथ साझेदारी हमारे विकास का लॉन्चपैड है। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिटेन को स्वाभाविक साझेदार बताया। इन शब्दों के पीछे केवल कूटनीतिक सौजन्य नहीं, बल्कि परस्पर लाभ और रणनीतिक विश्वास की भावना झलकती है।
इन मुलाकातों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वे ऐसे समय में हो रही हैं जब वैश्विक राजनीति तेजी से ध्रुवीकृत हो रही है। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, यूरोप में आर्थिक मंदी, और रूस-यूक्रेन संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। इस पृष्ठभूमि में भारत और ब्रिटेन, दोनों ही अपने रणनीतिक विकल्पों का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं। भारत ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वतंत्र नीति पर जोर दे रहा है, जबकि ब्रिटेन ब्रेक्ज़िट के बाद अपने नए व्यापारिक और राजनीतिक गठबंधन खोजने में जुटा है। अमेरिका के बढ़ते दबाव और चीन की विस्तारवादी नीतियों के बीच, भारत-ब्रिटेन की यह नज़दीकी दोनों को एक मजबूत कूटनीतिक विकल्प प्रदान करती है। यह साझेदारी दोनों देशों को वाशिंगटन के साथ बातचीत करते समय अधिक आत्मविश्वास और सौदेबाज़ी की क्षमता देती है।
ब्रिटेन भारत का छठा सबसे बड़ा निवेशक है, जबकि भारत ब्रिटेन में दूसरा सबसे बड़ा निवेशक है। पिछले दशक में ब्रिटिश कंपनियों ने भारत में 30 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। अब नई व्यापारिक समझौते और निवेश संरक्षण नीतियों के तहत यह प्रवाह और तेज होने की संभावना है। भारत में विनिर्माण, हरित ऊर्जा, फार्मा, और स्वास्थ्य क्षेत्र ब्रिटिश निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। वहीं, ब्रिटेन में भारतीय आईटी कंपनियां और स्टार्टअप्स तेज़ी से रोजगार सृजन कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार, केवल भारतीय कंपनियों ने ब्रिटेन में 1 लाख से अधिक नौकरियां सृजित की हैं। नई डील से इन अवसरों में और बढ़ोतरी की उम्मीद है। भारतीय स्टार्टअप्स के लिए लंदन एक ग्लोबल फंडिंग हब बन सकता है, जबकि ब्रिटिश निवेशकों को भारत की विशाल युवा आबादी और उपभोक्ता बाजार तक पहुंच मिलेगी।
कोविड-19 महामारी के दौरान भारत और ब्रिटेन ने वैक्सीन अनुसंधान और मेडिकल सप्लाई चेन में अभूतपूर्व सहयोग दिखाया था। उसी सहयोग को आगे बढ़ाते हुए अब दोनों देशों ने ग्लोबल हेल्थ पार्टरशिप की स्थापना की है। इसका उद्देश्य संयुक्त अनुसंधान, दवा निर्माण, और स्वास्थ्य सेवा प्रशिक्षण में तालमेल बढ़ाना है। भारत, जो अब फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड के रूप में पहचाना जाता है, ब्रिटेन के स्वास्थ्य क्षेत्र में किफायती दवाओं की सप्लाई और तकनीकी सहायता प्रदान कर सकता है। वहीं ब्रिटेन भारत को उच्चस्तरीय स्वास्थ्य प्रशिक्षण और चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में सहयोग देगा।
भारत-ब्रिटेन संबंध केवल आर्थिक नहीं हैं, उनका एक गहरा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आधार भी है। ब्रिटेन में 17 लाख से अधिक भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जो दोनों देशों के बीच लिविंग ब्रिज का काम करते हैं। यह समुदाय दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव, निवेश प्रवाह, और राजनीतिक संवाद को जीवंत बनाए रखता है।सुरक्षा के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ रहा है, साइबर सुरक्षा, समुद्री निगरानी और आतंकवाद-निरोधी साझेदारी अब इन संबंधों का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। हिंद महासागर क्षेत्र में ब्रिटेन की बढ़ती रुचि और भारत की सामरिक भूमिका इन सहयोगों को और गहरा करेगी।
कुल मिलाकर, कीर स्टार्मर की यह यात्रा भारत-ब्रिटेन संबंधों के लिए एक टर्निंग पॉइंट है। यह दर्शाती है कि दोनों देश अब परंपरागत औपचारिकताओं से आगे बढ़कर व्यावहारिक, संतुलित और दीर्घकालिक साझेदारी की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। यह सहयोग केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं रहेगा—यह शिक्षा, तकनीकी नवाचार, स्वास्थ्य, रणनीति और वैश्विक कूटनीति के हर क्षेत्र में प्रभाव डालेगा। भारत और ब्रिटेन दोनों ने यह स्पष्ट किया है कि वे 21वीं सदी की वैश्विक चुनौतियों का सामना साझा दृष्टिकोण से करेंगे, न कि एकतरफा नीतियों से। भविष्य में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था नए संतुलन की ओर बढ़ेगी, तब भारत-ब्रिटेन साझेदारी एक मॉडल एलायंस के रूप में सामने आ सकती है—जहां सहयोग, पारदर्शिता और परस्पर सम्मान आधारभूत सिद्धांत होंगे।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह मुलाकात केवल दो नेताओं की भेंट नहीं, बल्कि दो लोकतंत्रों के बीच नई आशा, नई दिशा और नई संभावनाओं का प्रतीक है। यदि, इस साझेदारी की गति इसी तरह बनी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत और ब्रिटेन न केवल आर्थिक साझेदार बल्कि वैश्विक परिवर्तन के सह-नेता बन सकते हैं।

