वोटर लिस्ट विवाद के बीच बिहार में चुनाव आयोग के सामने निष्पक्षता बनाए रखने की चुनौती
देवानंद सिंह
इस साल के आखिर में बिहार विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। अनुमान है कि करीब 7.4 करोड़ मतदाता लोकतंत्र के इस पर्व में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। चुनाव आयोग ने अभी हाल ही में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआईआर) के बाद फाइनल वोटर लिस्ट जारी की है। कागज़ पर देखें तो यह एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना होता है, लेकिन बिहार में इस बार यह साधारण प्रक्रिया ही सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद बन गई।
ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जब अगस्त में जारी हुई थी, तब उसमें करीब 65 लाख नामों को हटाया गया था। यह आंकड़ा इतना बड़ा था कि न सिर्फ आम जनता, बल्कि पूरे विपक्ष ने इसे चुनाव आयोग की नीयत पर सवाल खड़े करने का आधार बना लिया। माहौल ऐसा बना कि जैसे किसी व्यवस्थित षड्यंत्र के तहत लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित किया जा रहा हो। अदालत तक मामला पहुंचा और आम जनता सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाती रही। अब जब फाइनल वोटर लिस्ट जारी हुई है, तो उसमें 17.9 लाख नए नाम जुड़ गए हैं, लेकिन इंटेंसिव रिविजन से पहले की स्थिति की तुलना करें तो अब भी करीब 47 लाख वोटर सूची से बाहर हैं।
सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर नामों का कटना-बढ़ना आखिर क्यों हुआ? क्या यह एक सामान्य प्रक्रिया है या इसमें कोई व्यवस्थित त्रुटि और जल्दबाज़ी छिपी है? और इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था, जिसकी विश्वसनीयता लोकतंत्र की नींव है, क्या उसने बिहार की जनता के सामने भरोसे की परीक्षा खड़ी कर दी है?
वोटर लिस्ट का महत्व केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह लोकतंत्र की आत्मा है। एक भी पात्र मतदाता अगर सूची से बाहर रह जाए तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाती है। बिहार जैसे राज्य में, जहां जातीय समीकरण, धार्मिक आधार और सामाजिक असमानताएं चुनावी राजनीति को गहराई से प्रभावित करती हैं, वहां वोटर लिस्ट का हर छोटा-बड़ा बदलाव राजनीतिक व्याख्या का विषय बन जाता है।
65 लाख नाम हटने का आंकड़ा इतना बड़ा था कि उसने स्वाभाविक रूप से विपक्ष को यह कहने का मौका दिया कि चुनाव आयोग एक पक्ष विशेष को लाभ पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। यह आरोप भले ही पूरी तरह राजनीतिक हों, लेकिन जब प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी और जल्दबाज़ी दिखती है, तो ऐसे आरोपों को जनता के बीच जगह मिल ही जाती है।
एसआईआर प्रक्रिया के दौरान सबसे बड़ी दिक्कत दस्तावेज़ों को लेकर आई। बहुत से लोगों के नाम सिर्फ इसलिए कट गए क्योंकि उनका आधार या कोई अन्य पहचान पत्र समय पर अपडेट नहीं था। ब्लॉक और जिला स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियों को भी स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं मिले। नतीजा यह हुआ कि आम लोग घंटों कतारों में खड़े रहे और किसी को यह तक पता नहीं था कि आखिर कौन-सा दस्तावेज़ पर्याप्त होगा।
इस अफरातफरी ने न सिर्फ नागरिकों को परेशान किया, बल्कि लोकतंत्र के एक बुनियादी सिद्धांत समान मताधिकार को भी चोट पहुंचाई। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया, तब जाकर आयोग ने कुछ सफाई दी और अतिरिक्त समय भी दिया, लेकिन तब तक जनता के मन में यह धारणा बन चुकी थी कि यह प्रक्रिया केवल तकनीकी अपडेट नहीं है, बल्कि इसमें कहीं न कहीं राजनीतिक नीयत भी छिपी है।
अब जो फाइनल लिस्ट आई है, उसमें ड्राफ्ट की तुलना में करीब 17.9 लाख नाम जोड़े गए हैं। पहली नज़र में यह राहत की बात लग सकती है कि जिन लोगों के नाम कट गए थे, उनमें से काफी को वापस जगह मिल गई, लेकिन जब आप समग्र तस्वीर देखते हैं तो पाते हैं कि इंटेंसिव रिविजन से पहले की लिस्ट की तुलना में अब भी 47 लाख लोग बाहर हैं। यह 47 लाख सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि संभावित मतदाताओं का इतना बड़ा समूह है, जो लोकतांत्रिक भागीदारी से वंचित हो सकता है। सवाल यह भी है कि इनमें से कितने लोग वास्तव में अयोग्य थे और कितने सिर्फ प्रक्रिया की जटिलताओं की वजह से सूची से बाहर हो गए? चुनाव आयोग ने यह विकल्प दिया है कि नामांकन की अंतिम तारीख से दस दिन पहले तक पात्र नागरिक अपना नाम जुड़वा सकते हैं। कानूनी अपील का प्रावधान भी मौजूद है। लेकिन व्यवहार में ये विकल्प कितने कारगर साबित होंगे, यह कहना कठिन है।
बिहार की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण हमेशा से निर्णायक रहे हैं। ऐसे में, वोटर लिस्ट में किसी भी समुदाय के नामों का अधिक या कम होना सीधा चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है। विपक्ष को यह कहने का मौका मिल गया कि विशेष वर्गों को सूची से बाहर कर बहुसंख्यक वोटों का समीकरण बदला जा रहा है। भले ही यह आरोप सिद्ध न हों, लेकिन राजनीतिक विमर्श में इनकी गूंज चुनाव तक बनी रहेगी।
दूसरी ओर, जनता की रोजमर्रा की समस्याएं बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, बाढ़, प्रवासी मजदूरों की स्थिति जैसे असली मुद्दे पीछे छूट गए हैं। पूरा विमर्श वोटर लिस्ट पर केंद्रित हो गया है। यानी चुनाव आयोग की प्रक्रिया, जो तकनीकी रूप से निष्पक्ष चुनाव के लिए होती है, वही चुनावी बहस का मुख्य मुद्दा बन गई है। लोकतंत्र केवल संस्थाओं की मजबूती पर नहीं, बल्कि जनता के भरोसे पर भी चलता है। चुनाव आयोग अब तक भारत की सबसे निष्पक्ष और भरोसेमंद संस्थाओं में गिना जाता रहा है। लेकिन बिहार का अनुभव बताता है कि अगर प्रक्रियाएं पारदर्शी न हों और उनमें जल्दबाज़ी या अस्पष्टता दिखे तो यह भरोसा डगमगाने में देर नहीं लगती। यहां सवाल यह नहीं है कि कितने नाम जुड़े या हटे, बल्कि यह है कि जनता को क्यों लगा कि उनसे उनकी नागरिकता या मताधिकार छीनने की कोशिश हो रही है। यही असली संकट है।
बिहार का यह अनुभव बाकी राज्यों के लिए भी एक सबक है। आने वाले वर्षों में हर राज्य में मतदाता सूची का इंटेंसिव रिविजन होना है। अगर, वही जल्दबाज़ी और अस्पष्टता वहां भी दिखाई गई, तो देशभर में अविश्वास का माहौल बन सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को थोपने की बजाय सहमति और संवाद से चलाए। ग्राम पंचायत स्तर से लेकर जिला स्तर तक कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जाए, स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए जाएं, और नागरिकों को समय पर और सरल भाषा में जानकारी मिले। डिजिटल तकनीक का उपयोग तभी सफल है जब वह नागरिकों के लिए आसान बने, न कि उलझन।
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जारी वोटर लिस्ट ने यह दिखा दिया है कि लोकतंत्र में तकनीकी प्रक्रियाएं भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाती हैं। जनता सिर्फ यह नहीं चाहती कि उसका नाम सूची में रहे, बल्कि यह भी चाहती है कि उसे यह विश्वास दिलाया जाए कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी है। इस चुनाव में असली चुनौती मतों की गिनती से पहले ही शुरू हो चुकी है, यानी मतदाता सूची में भरोसा बनाए रखने की चुनौती। बिहार का सबक यही है कि लोकतंत्र में जनता की भागीदारी सिर्फ मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी प्रक्रिया में उसका विश्वास बना रहना चाहिए, और यही वह कसौटी है, जिस पर चुनाव आयोग को अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता को साबित करना होगा।

