उपराष्ट्रपति चुनाव के बहाने बीजेपी का दक्षिणी दांव और ओबीसी राजनीति का नया मोर्चा
देवानंद सिंह
भारतीय राजनीति में उपराष्ट्रपति का पद भले ही जनता से सीधे जुड़ा न हो, लेकिन इसका चुनाव हमेशा एक व्यापक राजनीतिक संदेश देता है। यह केवल संसद के भीतर चुना जाने वाला संवैधानिक पद नहीं है, बल्कि इससे निकलने वाले संकेत दूर-दूर तक जाते हैं। यही वजह है कि जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने महाराष्ट्र के राज्यपाल और तमिलनाडु के वरिष्ठ नेता सी.पी. राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया, तो इसे महज़ संवैधानिक प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चुनावी रणनीति के रूप में देखा जाने लगा। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफ़े के बाद यह कुर्सी खाली हुई थी, और अब राधाकृष्णन की उम्मीदवारी ने भारतीय राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दिया है। यह नाम जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरे राजनीतिक संकेत अपने भीतर छुपाए हुए है।

तमिलनाडु की राजनीति पिछले पांच दशकों से द्रविड़ पार्टियों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। डीएमके और एआईएडीएमके ने सत्ता का अदला-बदली का खेल खेला है, और भाजपा यहां हमेशा हाशिये पर रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल 4 सीटें मिलीं, जबकि एनडीए सहयोगी एआईएडीएमके ने 66 सीटें जीतीं। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन भाजपा और केंद्र सरकार पर भाषा, क्षेत्रीय पहचान और संघीय ढांचे जैसे मुद्दों पर लगातार हमला करते रहे हैं। ऐसे माहौल में भाजपा के लिए तमिलनाडु में पैठ बनाना बेहद कठिन रहा है। नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले वर्षों में कई सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक कदम उठाए—जैसे संसद भवन में सेंगोल की स्थापना, काशी-तमिल संगमम् का आयोजन, और उत्तर-दक्षिण सांस्कृतिक रिश्तों पर ज़ोर देना। राधाकृष्णन की उम्मीदवारी इसी कड़ी को आगे बढ़ाती है। भाजपा चाहती है कि उपराष्ट्रपति पद जैसे प्रतिष्ठित स्थान पर तमिलनाडु का चेहरा बैठाकर वह दक्षिण भारत में अपनी उपस्थिति का संदेश दे।

लेकिन यह सिर्फ़ क्षेत्रीय राजनीति का मामला नहीं है। राधाकृष्णन की उम्मीदवारी भाजपा के ओबीसी कार्ड से भी जुड़ी है। तमिलनाडु की लगभग आधी आबादी ओबीसी वर्ग से आती है। कांग्रेस और राहुल गांधी लगातार भाजपा पर ओबीसी विरोधी होने का आरोप लगाते रहे हैं। राहुल गांधी ने 2024 के चुनाव अभियान में इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। भाजपा इस आरोप का राजनीतिक उत्तर ढूंढ रही थी। राधाकृष्णन ओबीसी समुदाय से आते हैं, और उनकी उम्मीदवारी भाजपा को विपक्षी नैरेटिव का जवाब देने का मौका देती है। यह एक प्रतीकात्मक संदेश है कि भाजपा अब केवल उच्च जातियों या उत्तर भारत की पार्टी नहीं, बल्कि दक्षिण और ओबीसी राजनीति में भी अपनी दावेदारी पेश कर रही है।

हालांकि यह सवाल भी उठता है कि क्या राधाकृष्णन जैसे अपेक्षाकृत छोटे नाम से भाजपा को बड़ा सामाजिक आधार मिलेगा? विश्लेषक मानते हैं कि उनका व्यक्तिगत राजनीतिक कद उतना बड़ा नहीं कि वह अकेले ओबीसी समुदाय को भाजपा की ओर मोड़ दें। विपक्ष का नैरेटिव अभी भी ज़्यादा प्रभावी दिखता है, लेकिन भाजपा की राजनीति लंबे खेल पर टिकी होती है। वह छोटे-छोटे प्रतीकों और नियुक्तियों के ज़रिए धीरे-धीरे सामाजिक आधार बनाने की रणनीति पर काम करती है। इस नज़रिए से देखा जाए तो राधाकृष्णन का नाम भाजपा की व्यापक रणनीति में एक अहम कदम है।

राधाकृष्णन की संघ पृष्ठभूमि भी इस कहानी का बड़ा हिस्सा है। वे किशोरावस्था से ही आरएसएस से जुड़े रहे हैं, और जनसंघ से लेकर भाजपा तक का सफर एक संघनिष्ठ कार्यकर्ता के रूप में तय किया है। जब जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति बनाया गया था, तब यह चर्चा चली थी कि संघ उस चयन से पूरी तरह खुश नहीं था, क्योंकि धनखड़ संघ पृष्ठभूमि से नहीं आते थे। इस बार भाजपा ने कोई जोखिम नहीं लिया है। राधाकृष्णन की उम्मीदवारी पर संघ की सीधी छाप है। यह भाजपा और संघ के रिश्तों में संतुलन साधने का भी प्रयास है। हाल के दिनों में वक्फ बोर्ड, समान नागरिक संहिता और अन्य मुद्दों पर केंद्र सरकार ने संघ की लाइन को आगे बढ़ाया है। अब संघ को सत्ता संरचना में और मज़बूत हिस्सेदारी देने का संकेत इस उम्मीदवारी से मिलता है।

इस कदम से विपक्ष के भीतर भी असहजता बढ़ने की संभावना है। उपराष्ट्रपति चुनाव केवल भाजपा बनाम विपक्ष नहीं, बल्कि विपक्षी एकता की भी परीक्षा है। 2024 से पहले बना ‘इंडिया गठबंधन’ पहले ही दरारों से जूझ रहा है। जेडीयू, आप और रालोद जैसे दल उससे अलग हो चुके हैं। अब उपराष्ट्रपति चुनाव में भाजपा की रणनीति विपक्षी खेमे में नई चुनौतियां खड़ी कर सकती है। डीएमके के लिए यह स्थिति सबसे पेचीदा है। उम्मीदवार तमिलनाडु से हैं, तो मुख्यमंत्री स्टालिन पर दबाव रहेगा। अगर, वे समर्थन नहीं करते, तो भाजपा इसे उनके खिलाफ इस्तेमाल करेगी। झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ राधाकृष्णन के व्यक्तिगत रिश्ते अच्छे रहे हैं, जब वे राज्यपाल थे, इसलिए जेएमएम का वोट भी खिसक सकता है। शिवसेना (उद्धव गुट) भी हिंदुत्व और संघ की छवि के दबाव में आ सकती है।

भले ही, उपराष्ट्रपति चुनाव जनता से सीधे जुड़ा न हो और केवल सांसद इसमें मतदान करते हों, लेकिन इसके पीछे का संदेश हमेशा जनता तक पहुंचता है। यही राजनीति की खूबसूरती है कि प्रतीक और प्रतीकात्मक संदेश वास्तविक वोटों से भी ज़्यादा असर डालते हैं। जानकारों का मानना है कि भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं, बल्कि दक्षिण भारत और ओबीसी वर्ग की भी पार्टी है।
इस पूरी रणनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू है 2026 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव। भाजपा अभी तक इस राज्य में कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं कर पाई है।एआईएडीएमके की ताकत कमजोर हो रही है और डीएमके-कांग्रेस गठबंधन मज़बूती से खड़ा है। ऐसे में, भाजपा चाहती है कि वह ओबीसी राजनीति और सांस्कृतिक प्रतीकों के सहारे धीरे-धीरे इस समीकरण को तोड़ने की स्थिति में आए। राधाकृष्णन की उम्मीदवारी को इसी दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।
राजनीति में अक्सर छोटे नाम बड़े संकेत लेकर आते हैं। राधाकृष्णन का नाम शायद राष्ट्रीय स्तर पर उतना चर्चित न हो, लेकिन भाजपा ने इसे कई निशाने साधने के लिए इस्तेमाल किया है। यह तमिलनाडु में राजनीतिक सेंधमारी का प्रयास है, ओबीसी राजनीति में सक्रिय दखल का संकेत है, संघ और भाजपा के बीच संतुलन साधने की कोशिश है, विपक्षी गठबंधन में भ्रम और दरार पैदा करने की रणनीति है, और साथ ही सांस्कृतिक-प्रतीकात्मक राजनीति के ज़रिए दक्षिण भारत में अपनी पैठ बनाने का संदेश है।
अब असली सवाल यह है कि विपक्ष इस दांव का जवाब कैसे देगा। क्या डीएमके और अन्य क्षेत्रीय दल भाजपा की इस रणनीति को समझकर मजबूती से एकजुट रहेंगे या फिर अंदरूनी दबावों और व्यक्तिगत समीकरणों के चलते बिखराव बढ़ेगा? भाजपा की राजनीति में लंबे खेल का महत्व हमेशा रहा है। उपराष्ट्रपति चुनाव का परिणाम चाहे पहले से तय-सा क्यों न लगे, लेकिन इसके राजनीतिक प्रभाव आने वाले वर्षों की दिशा और दशा तय करेंगे।
कुल मिलाकर, राधाकृष्णन की उम्मीदवारी यह बताती है कि भाजपा अपनी राजनीति को उत्तर भारतीय दायरे से बाहर ले जाकर पूरे भारत में विस्तार देने के गंभीर प्रयास में है। वह यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी केवल हिंदी पट्टी या उच्च जातियों तक सीमित नहीं है, बल्कि तमिलनाडु से लेकर झारखंड तक, ओबीसी से लेकर सांस्कृतिक प्रतीकों तक, हर मोर्चे पर उसकी मौजूदगी और दावेदारी है। यही भारतीय राजनीति की जटिलता है कि संवैधानिक पद पर एक नामांकन भी दूरगामी राजनीतिक संकेत बन जाता हैं, और यही कारण है कि इस चुनाव का असर संसद की दीवारों से बहुत आगे जाकर 2026 और 2029 तक की राजनीति में दिखाई देगा।

