पीएम मोदी के लाल क़िले से आरएसएस की तारीफ़ के निहितार्थ
देवानंद सिंह
स्वतंत्रता दिवस केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं है, बल्कि यह वह अवसर है, जब भारत का प्रधानमंत्री लाल क़िले की प्राचीर से देश की दिशा और दशा पर अपनी दृष्टि प्रस्तुत करता है। यह भाषण सामान्यतः सरकार की उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य की योजनाओं पर केंद्रित होता है, किंतु 2025 के स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कुछ ऐसा किया, जो पिछले ग्यारह वर्षों में नहीं हुआ था। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का सार्वजनिक मंच से उल्लेख करते हुए उसकी सौ साल की यात्रा की सराहना की और उसे दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ तक कह दिया।

यह प्रसंग केवल औपचारिक प्रशंसा तक सीमित नहीं है। यह ऐसे समय में हुआ है, जब भाजपा और आरएसएस के बीच रिश्तों में तनाव की चर्चाएं तेज़ रही हैं और चुनावी राजनीति की चुनौतियां सामने खड़ी हैं। सवाल यह है कि आखिर मोदी ने स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसर पर संघ का नाम क्यों लिया और इसके राजनीतिक, वैचारिक और रणनीतिक मायने क्या हैं?
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने 103 मिनट लंबे भाषण में 82वें मिनट पर आरएसएस का उल्लेख किया। उन्होंने कहा,
आज से सौ साल पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म हुआ। सौ साल की राष्ट्र सेवा का यह गौरवपूर्ण स्वर्णिम पृष्ठ है। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के संकल्प को लेकर स्वयंसेवकों ने मातृभूमि के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। सेवा, समर्पण, संगठन और अप्रतिम अनुशासन इस संगठन की पहचान रहे हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ है।

यह बयान केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। मोदी ने आरएसएस को औपचारिक रूप से उस राष्ट्रनिर्माण प्रक्रिया में शामिल दिखाया, जिसे वे स्वतंत्रता दिवस पर रेखांकित कर रहे थे। यह ज़िक्र ऐसे समय हुआ है, जब भाजपा और संघ के रिश्तों में खटास की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षित बहुमत नहीं मिला। विश्लेषकों ने इसका एक बड़ा कारण यह बताया कि आरएसएस के स्वयंसेवकों ने ज़मीनी स्तर पर उतनी सक्रियता नहीं दिखाई, जितनी पहले दिखाते थे।
चुनाव से पहले भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का यह बयान भी चर्चा में रहा कि भाजपा अब इतनी सक्षम हो चुकी है कि उसे संघ की ज़रूरत नहीं। इस बयान को संघ ने पारिवारिक मामला कहकर टाल दिया, लेकिन भीतर ही भीतर असंतोष बढ़ा। इसके बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत के कई अप्रत्यक्ष बयान सामने आए, जिनमें उन्होंने भाजपा नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाए।
इस पृष्ठभूमि में मोदी का आरएसएस की प्रशंसा करना रिश्तों को संतुलन में लाने और संभावित टकराव को ठंडा करने का प्रयास माना जा सकता है।

पिछले डेढ़ साल से मोदी और आरएसएस नेतृत्व के बीच इस बात पर संघर्ष रहा है कि भाजपा को किस तरह चलाया जाए। मोदी का मॉडल केंद्रीकृत और सत्तावादी है, जबकि संघ आम सहमति पर ज़ोर देता रहा है। यही वजह है कि पार्टी अध्यक्ष का चुनाव लंबे समय से टलता रहा है, और इस पर संघ असहज रहा है। मोदी ने वर्षों तक आरएसएस के समर्थन को टेकन फॉर ग्रांटेड लिया, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में संघ ने उन्हें यह एहसास दिलाया कि बिना स्वयंसेवकों की जमीनी ताक़त भाजपा की चुनावी मशीनरी कमजोर पड़ सकती है। यही कारण है कि अब मोदी रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहे हैं।
आगामी महीनों में बिहार विधानसभा चुनाव और उसके बाद असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी के चुनाव होने हैं। ऐसे में, संघ की भूमिका निर्णायक हो सकती है। बिहार जैसे राज्यों में संघ की सीधी राजनीतिक ताक़त भले सीमित हो, लेकिन उसके पास वर्ड ऑफ़ माउथ यानी मौखिक प्रचार और स्थानीय स्तर पर वातावरण बनाने की क्षमता है। यदि, संघ कार्यकर्ता भाजपा के प्रति उदासीन रवैया अपनाते हैं या विपक्षी दलों को समर्थन देने का संकेत देते हैं, तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। मोदी का लाल क़िले से संघ की प्रशंसा करना इस लिहाज़ से देखा जा सकता है कि वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि संघ आने वाले चुनावों में भाजपा के खिलाफ चुपचाप काम न करे।

मोदी का यह कदम भाजपा और संघ के बीच क्विड प्रो क्वो यानी लेन-देन की राजनीति का हिस्सा हो सकता है।
भाजपा चाहती है कि उपराष्ट्रपति जैसे पदों पर उसकी पसंद के नेता नियुक्त हों। संघ का जोर इस पर है कि पार्टी अध्यक्ष का पद उसकी पसंद के व्यक्ति को मिले। संभव है कि दोनों के बीच कोई समझौता हो, और कॉम्प्रोमाइज़्ड फॉर्मूला के तहत ऐसा अध्यक्ष चुना जाए, जो मोदी-शाह के लिए स्वीकार्य भी हो और संघ के लिए भी भरोसेमंद।
प्रधानमंत्री मोदी का संघ की तारीफ़ करना आलोचनाओं से भी घिरा। असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस पर आरएसएस का महिमामंडन स्वतंत्रता संग्राम का अपमान है, क्योंकि संघ ने आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई थी और कई बार अंग्रेजों के साथ खड़ा दिखाई दिया।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की भावना का उल्लंघन बताया और कहा कि मोदी अपने 75वें जन्मदिन से पहले संघ को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे पद पर बने रह सकें। कुछ विश्लेषकों ने भी यह सवाल उठाया कि जब आज़ादी की लड़ाई के महत्वपूर्ण आंदोलनों—असहयोग आंदोलन, दांडी मार्च और भारत छोड़ो आंदोलन में आरएसएस की कोई उपस्थिति नहीं थी, तब स्वतंत्रता दिवस के भाषण में उसकी प्रशंसा किस आधार पर की जा रही है।

दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में मोहन भागवत ने बयान दिया कि नेताओं को 75 वर्ष की उम्र पार करने के बाद पद छोड़ देना चाहिए। यह टिप्पणी मोदी की ओर संकेत के रूप में देखी गई, क्योंकि सितंबर में वे 75 साल के हो जाएंगे। भाजपा में लंबे समय से यह परंपरा रही है कि 75 वर्ष पार करने वाले नेता सक्रिय राजनीति से अलग हो जाते हैं, लेकिन क्या मोदी इस परंपरा का पालन करेंगे? अमित शाह पहले ही साफ कर चुके हैं कि मोदी अपना कार्यकाल पूरा करेंगे।
इस पृष्ठभूमि में संघ की तारीफ़ को इस रूप में भी देखा जा रहा है कि मोदी अपने 75वें जन्मदिन से पहले संघ के साथ समीकरण साधने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उनके नेतृत्व को चुनौती न दी जाए।
आरएसएस पर यह आरोप लंबे समय से लगता रहा है कि उसने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई। बल्कि कई बार उसकी प्राथमिकता कांग्रेस और गांधी-विरोध रही। नाथूराम गोडसे, जिसने महात्मा गांधी की हत्या की, उसका शुरुआती जुड़ाव संघ से था और फांसी से पहले उसने संघ की प्रार्थना गाई। इन तथ्यों के कारण जब प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस पर संघ की प्रशंसा करते हैं तो आलोचक इसे स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत का अपमान मानते हैं, लेकिन वास्तविकता यह भी है कि आजादी के बाद संघ ने संगठनात्मक रूप से भारतीय राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी है। भाजपा की राजनीतिक यात्रा संघ की कार्यशैली और वैचारिक दिशा के बिना अधूरी है, इसलिए मोदी का भाषण केवल प्रशंसा नहीं बल्कि राजनीतिक संतुलन साधने की कवायद है।
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लाल क़िले से आरएसएस की प्रशंसा करना एक बहुआयामी राजनीतिक संदेश है। पहला, भाजपा और संघ के बीच चल रही खटपट को शांत करने का प्रयास, दूसरा आने वाले चुनावों में संघ की जमीनी ताक़त का उपयोग सुनिश्चित करना, तीसरा उपराष्ट्रपति और पार्टी अध्यक्ष जैसे पदों पर समझौते का मार्ग प्रशस्त करना, 75 वर्ष की उम्र के बाद भी अपने नेतृत्व को चुनौती से बचाना, हालांकि इस कदम ने नए विवाद भी खड़े कर दिए हैं। आलोचक इसे स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसर का राजनीतिकरण मानते हैं और संघ की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल उठाते हैं। अंततः यह कहा जा सकता है कि मोदी का यह कदम केवल प्रतीकात्मक प्रशंसा नहीं बल्कि आने वाले वर्षों की राजनीति को आकार देने वाला एक रणनीतिक दांव है। यह दांव कितना सफल होगा, यह बिहार और उसके बाद के चुनावों में संघ के रुख से तय होगा।

