श्राद्धकर्म में नेमरा पहूंचे विधानसभा अध्यक्ष रबीन्द्रनाथ महतो, मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन और उनके परिवारजनों से मुलाकात कर बंधाया ढांढस
निजाम खान। राष्ट्र संवाद
रांची: झारखंड की राजनीति और समाज में गहरी पैठ रखने वाले दिशोम गुरु स्वर्गीय शिबू सोरेन के निधन के बाद पूरे राज्य में शोक की लहर है। रविवार को मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के पैत्रिक आवास नेमरा में आयोजित श्राद्धकर्म कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष रबीन्द्रनाथ महतो भी शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने दिवंगत नेता को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की और पुण्यात्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
श्राद्धकर्म के दौरान विधानसभा अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन और उनके परिवारजनों से मुलाकात कर उन्हें ढांढस बंधाया। उन्होंने कहा कि स्व. शिबू सोरेन केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वे पूरे झारखंड के जनमानस के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शक थे। उनका जीवन संघर्ष और समाजसेवा के अद्भुत उदाहरणों से भरा रहा। आदिवासी समाज, वंचित तबकों और झारखंड की अस्मिता की रक्षा के लिए उन्होंने जो लड़ाई लड़ी, वह इतिहास के पन्नों में हमेशा दर्ज रहेगी।
इस मौके पर बड़ी संख्या में राज्य भर से लोग, जनप्रतिनिधि और पार्टी कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। सभी ने दिशोम गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की और उनके योगदान को याद किया। सभा में वक्ताओं ने कहा कि शिबू सोरेन का जीवन समाज को समर्पित था। वे हमेशा गरीबों और किसानों की आवाज बने। उनकी सहजता और सादगी ने उन्हें जन-जन का नेता बना दिया।
विधानसभा अध्यक्ष रबीन्द्रनाथ महतो ने कहा कि शिबू सोरेन का व्यक्तित्व इतना विराट था कि उन्हें किसी एक दल या समाज की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। उन्होंने झारखंड की अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष किया और झारखंड को अलग राज्य बनाने की लड़ाई में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
श्राद्धकर्म स्थल पर गहरा भावुक माहौल था। मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन स्वयं पिता की स्मृतियों में डूबे हुए थे। वे समय-समय पर उपस्थित लोगों से मिलते और उनके सांत्वना संदेशों को स्वीकार करते रहे। विधानसभा अध्यक्ष समेत अन्य नेताओं ने हेमन्त सोरेन और उनके परिवार को यह भरोसा दिलाया कि पूरे राज्य की जनता उनके साथ खड़ी है।
श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह संदेश दिया गया कि शिबू सोरेन भले ही शारीरिक रूप से अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विचारधारा, संघर्ष और समर्पण हमेशा जीवित रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
इस प्रकार नेमरा में आयोजित श्राद्धकर्म केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि झारखंड की आत्मा को झकझोर देने वाला अवसर बन गया।

