एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने संतुलन स्थापित करने की चुनौती
देवानंद सिंह
बिहार में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने न केवल राज्य की वोटर लिस्ट तैयार करने के मौजूदा तरीके पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि नागरिकता, मताधिकार और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर भी गंभीर बहस छेड़ दी है। यह मामला अब केवल तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के बुनियादी सिद्धांतों सार्वभौमिक व समान मताधिकार को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।

स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न, चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर वोटर लिस्ट को अपडेट करने की एक विशेष प्रक्रिया है। सामान्यत: इसमें मृतकों, स्थानांतरित हो चुके व्यक्तियों, या अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं, और नए योग्य नागरिकों के नाम जोड़े जाते हैं, लेकिन बिहार में इस बार जिस तरह इस प्रक्रिया को लागू किया गया है, उसने इसे राजनीतिक और कानूनी विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया है।

वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस बार नागरिकता का निर्धारण एक तरह से SIR का हिस्सा बना दिया गया है, जबकि भारतीय कानून के तहत यह कार्य मुख्यत: केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय से जुड़े प्रावधानों के अंतर्गत आता है, न कि चुनाव आयोग के। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं, और दस्तावेज़ पेश करने का बोझ नागरिकों पर डाल दिया गया है, जिससे लाखों लोग मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।

सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, वृंदा ग्रोवर और प्रशांत भूषण जैसे नामचीन वकीलों ने याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखा। अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। नागरिकता का निर्धारण चुनाव आयोग का काम नहीं है, और दो महीने में 8–9 करोड़ मतदाताओं की नागरिकता की जांच करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी व्यक्ति ने एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं किया है, तो उसका नाम हटाया नहीं जा सकता। साथ ही, जिन लोगों ने पहले वोट डाला है, उन्हें स्वतः भारतीय नागरिक माना जाना चाहिए। कपिल सिब्बल ने दावा किया कि कई जिंदा लोगों को वोटर लिस्ट में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया है। उन्होंने हालांकि डेटा पेश करने से यह कहकर इनकार किया कि उनके पास वह सूची उपलब्ध नहीं है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग के पास अधिकार है कि वह केवल भारतीय नागरिकों के नाम वोटर लिस्ट में शामिल करे, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बाद में यह पाया गया कि बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं और करोड़ों लोग बाहर कर दिए गए हैं, तो अदालत पूरी प्रक्रिया रद्द कर सकती है और पुरानी सूची बहाल करने का आदेश दे सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने अदालत के सामने वोटर लिस्ट बनाने के अंतरराष्ट्रीय अनुभव और चुनौतियां रखीं। उन्होंने बताया कि कई देशों में मतदाता पंजीकरण की जिम्मेदारी राज्य की होती है, जबकि कुछ देशों में यह जिम्मेदारी नागरिकों पर डाल दी जाती है, जहां भी यह जिम्मेदारी नागरिकों पर डाली जाती है, वहां औसतन 25% मतदाता सूची से बाहर रह जाते हैं।
उन्होंने बिहार एसआईआर प्रक्रिया में तीन प्रमुख समस्याएं गिनाईं, जिसमें दस्तावेज़ों की मांग, कठोर समयसीमा, और इतने बड़े पैमाने पर सत्यापन के लिए अपर्याप्त समय व संसाधन प्रमुख रूप से शामिल रहीं।
योगेंद्र यादव ने उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार में बाढ़ की स्थिति के बावजूद, प्रत्येक इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर को रोजाना 4,000 से अधिक फॉर्म्स की जांच करनी होगी, जो वस्तुत: असंभव है। उन्होंने अदालत में दो ऐसे लोगों को भी पेश किया, जिन्हें वोटर लिस्ट में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया था।

उधर, चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को सिर्फ अटकलें बताया और कहा कि उन्हें प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करना चाहिए। उनका तर्क था कि अगर कहीं गड़बड़ी है, तो लोग एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं ताकि नाम सूची में जुड़ सकें, न कि प्रक्रिया को रोकने की मांग करें।
दरअसल, यह मामला केवल तकनीकी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं है। इसमें कुछ गहरे कानूनी और लोकतांत्रिक प्रश्न शामिल हैं। क्या चुनाव आयोग को यह अधिकार है कि वह दस्तावेज़ों के आधार पर नागरिकता की जांच करे, या यह केवल उसके अधिकार-क्षेत्र से बाहर है? अगर, नाम हटाने के लिए कोई प्रमाण आवश्यक नहीं है, लेकिन जोड़ने के लिए कठोर दस्तावेज़ चाहिए, तो यह प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से बहिष्करण की ओर झुक जाएगी।
इतने बड़े पैमाने पर सत्यापन कुछ ही महीनों में करना, विशेषकर बिहार जैसे राज्य में जहां बाढ़, प्रवासन और प्रशासनिक सीमाएं हैं, व्यावहारिक रूप से संभव है या नहीं? भारत का संविधान सभी वयस्क नागरिकों को समान मताधिकार देता है। यदि, तकनीकी प्रक्रियाएं या प्रशासनिक आदेश इस अधिकार को बाधित करते हैं, तो यह लोकतंत्र के मूल ढांचे पर हमला माना जा सकता है।
यदि, याचिकाकर्ताओं की आशंकाएं सही साबित होती हैं, और लाखों नाम वोटर लिस्ट से हट जाते हैं, तो इसका असर केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा।
बड़ी संख्या में मतदाता बाहर होने से चुनावी परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। कमजोर और वंचित वर्ग, जिनके पास आवश्यक दस्तावेज़ नहीं होते, वो प्रभावित होंगे, और यह मामला भविष्य में पूरे देश में वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रियाओं के लिए मिसाल बन सकता है।
कुल मिलाकर, बिहार की एसआईआर प्रक्रिया इस समय एक लोकतांत्रिक टेस्ट केस बन चुकी है। यह न केवल यह तय करेगी कि वोटर लिस्ट कैसे तैयार होनी चाहिए, बल्कि यह भी कि क्या प्रशासनिक सुविधा और दक्षता के नाम पर नागरिकों के मूल अधिकार सीमित किए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब यह चुनौती है कि वह एक संतुलन स्थापित करे। एक तरफ चुनाव आयोग की स्वायत्तता और जिम्मेदारी है, दूसरी तरफ नागरिकों का संवैधानिक अधिकार और प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा।यदि, अदालत यह पाती है कि यह प्रक्रिया असंगत, भेदभावपूर्ण या असंवैधानिक है, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। वहीं, अगर अदालत आयोग के पक्ष में जाती है, तो यह पूरे देश में मतदाता सूची तैयार करने के मौजूदा तरीकों को बदलने की दिशा में पहला कदम हो सकता है। लोकतंत्र की बुनियाद मतदाता की समानता और सहभागिता है। इस आधार को कमजोर करने वाली हर प्रक्रिया पर न केवल कानूनी, बल्कि नैतिक कसौटी पर भी खरा उतरना होगा। बिहार की यह बहस हमें यह याद दिलाती है कि मताधिकार केवल एक राजनीतिक अधिकार नहीं, बल्कि नागरिकता और समानता का सबसे प्रत्यक्ष प्रतीक है, और इसे खोने का मतलब लोकतंत्र की आत्मा को खो देना है।

