डीपीडीपी एक्ट: निजता की ढाल या पत्रकारिता की ढाल पर चोट?
देवानंद सिंह
अगस्त 2023 में भारत सरकार ने लंबे इंतज़ार और कई मसौदों पर विचार-विमर्श के बाद डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 ( डीपीडीपी एक्ट) को संसद के दोनों सदनों से पारित करवा कर राष्ट्रपति की मंज़ूरी प्राप्त की। इस क़ानून का उद्देश्य नागरिकों के निजी डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। एक ऐसा लक्ष्य, जिसे 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निजता को मौलिक अधिकार घोषित किए जाने के बाद अनिवार्य माना जाने लगा था, लेकिन जैसे ही यह क़ानून आकार लेता गया, इसकी भाषा और प्रावधानों को लेकर कई वर्गों विशेषकर पत्रकार संगठनोंने गंभीर आपत्तियां उठाईं। इन आपत्तियों का मूल तर्क यह है कि अगर, वर्तमान स्वरूप में यह क़ानून लागू किया गया, तो यह न केवल खोजी पत्रकारिता बल्कि जनहित में की जाने वाली संवेदनशील रिपोर्टिंग पर भी प्रतिकूल असर डाल सकता है।

इस क़ानून के तहत किसी भी व्यक्ति या संस्था को किसी व्यक्ति का निजी डेटा एकत्र करने से पहले उसकी स्पष्ट सहमति लेनी होगी। डेटा का उपयोग केवल वैध और स्पष्ट उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी डेटा एकत्र करने वाले पर होगी।
क़ानून व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह अपना दिया हुआ डेटा हटाने की मांग कर सके। उल्लंघन की स्थिति में 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, जिसे सरकार 500 करोड़ रुपये तक भी बढ़ा सकती है। निजी डेटा की परिभाषा बेहद व्यापक है, जिसमें नाम, पता, फोन नंबर, तस्वीर, स्वास्थ्य और वित्तीय जानकारी से लेकर इंटरनेट ब्राउज़िंग हिस्ट्री से लेकर डेटा प्रोसेसिंग में एकत्र करना, संग्रहीत करना और प्रकाशित करना शामिल है। इसके अनुपालन की जिम्मेदारी डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया पर होगी, जिसे शिकायतों की सुनवाई और दंड निर्धारण जैसे अधिकार होंगे।

पत्रकार संगठन यह मानते हैं कि निजी डेटा का उपयोग लगभग हर प्रकार की पत्रकारिता में किसी न किसी रूप में होता है। उदाहरण के लिए, भ्रष्टाचार की पड़ताल में किसी अफसर के व्यक्तिगत विवरण सामने आ सकते हैं, जो इस क़ानून के तहत ‘निजी डेटा’ की श्रेणी में आएंगे।सबसे बड़ी चिंता यह है कि सरकार के पास कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति का डेटा साझा करने का आदेश देने की शक्ति होगी। पत्रकारों को आशंका है कि अगर, यह शक्ति विवेकपूर्ण और पारदर्शी तरीके से न बरती गई, तो गुप्त सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा पैदा होगा। यह न केवल स्रोतों की सुरक्षा को खतरे में डालेगा, बल्कि संवेदनशील सूचनाओं के प्रवाह को भी बाधित करेगा। जब 2018 में इस क़ानून का पहला ड्राफ्ट आया, तो उसमें पत्रकारिता से संबंधित प्रावधानों में स्पष्ट छूट दी गई थी। यही स्थिति 2019 और 2021 के ड्राफ्ट में भी रही, लेकिन 2023 में अंतिम रूप में पारित क़ानून में यह छूट पूरी तरह हटा दी गई।

यह बदलाव क्यों हुआ, इस पर सरकार ने अब तक स्पष्ट कारण नहीं बताया है। नतीजतन, पत्रकार संगठनों ने इसे लेकर औपचारिक स्पष्टीकरण की मांग की है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का कहना है कि पत्रकारिता की परिभाषा को केवल स्थापित मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पेशेवरों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, क्योंकि डिजिटल और स्वतंत्र पत्रकारिता के दौर में कई फ्रीलांसर भी महत्वपूर्ण खोजी कार्य कर रहे हैं।
यूरोप का जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर), और सिंगापुर के डेटा प्रोटेक्शन क़ानून पत्रकारिता के लिए विशेष छूट प्रदान करते हैं। 2018 की जस्टिस बी.एन. श्रीकृष्ण कमेटी ने भी स्पष्ट चेतावनी दी थी कि अगर, पत्रकारों को इस क़ानून का पूरी तरह पालन करना पड़े, तो इसका व्यावहारिक परिणाम यह होगा कि कोई भी व्यक्ति अपने ख़िलाफ़ होने वाली रिपोर्ट के लिए सहमति नहीं देगा। यह सीधे-सीधे स्वतंत्र प्रेस की बुनियाद को कमजोर करेगा। इस क़ानून के प्रभाव का एक और पहलू सूचना का अधिकार (आरटीआई) क़ानून से जुड़ा है। पहले आरटीआई में यह प्रावधान था कि निजी जानकारी तब रोकी जा सकती है, जब उसका कोई स्पष्ट सार्वजनिक हित न हो, और अधिकारी को यह साबित करना होता था कि जानकारी उजागर करना निजता पर अनावश्यक हमला होगा, लेकिन डेटा प्रोटेक्शन क़ानून के साथ किए गए संशोधनों ने इस संतुलन को उलट दिया है। अब आरटीआई के तहत निजी जानकारी को सार्वजनिक करने पर सीधा प्रतिबंध है, चाहे उसमें सार्वजनिक हित क्यों न जुड़ा हो। इससे भ्रष्टाचार, नियुक्तियों में अनियमितता और अन्य प्रशासनिक मामलों पर निगरानी कमजोर पड़ सकती है। पूर्व दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस अजीत प्रकाश शाह और आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज जैसे विशेषज्ञों ने इसे सूचना के अधिकार की बुनियाद के लिए खतरा बताया है। सरकार का कहना है कि क़ानून से पत्रकारों के कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ेगा, और अगर जानकारी जनहित में है, तो वह पहले की तरह साझा होती रहेगी। हालांकि, पत्रकार संगठनों का तर्क है कि मौखिक आश्वासन कानूनी गारंटी का विकल्प नहीं हो सकता। उन्होंने मांग की है कि क़ानून में स्पष्ट प्रावधानों के ज़रिये पत्रकारिता के लिए छूट दी जाए, या कम से कम तब तक अस्थायी छूट दी जाए जब तक संशोधन नहीं होते।

निजता का अधिकार और सूचना का अधिकार, दोनों ही लोकतंत्र में आवश्यक हैं, लेकिन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। निजता की सुरक्षा का उद्देश्य नागरिकों को डेटा के दुरुपयोग से बचाना है, लेकिन अगर यह सुरक्षा इतनी कठोर हो जाए कि सत्ता में बैठे लोगों की जवाबदेही घटा दे, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत हो सकता है। पत्रकारिता का सार यही है कि वह सत्ता, नीति और संस्थानों पर प्रश्न उठा सके। अगर, हर रिपोर्टिंग के पहले ‘सहमति’ का प्रावधान लागू हो जाए, तो भ्रष्टाचार, घोटालों और कदाचार के मामलों का खुलासा लगभग असंभव हो जाएगा।
जीडीपीआर की तर्ज़ पर, खोजी और जनहित पत्रकारिता के लिए डेटा प्रोटेक्शन क़ानून में विशेष प्रावधान होना चाहिए। क़ानून में यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी परिस्थिति में पत्रकार के स्रोत की पहचान सार्वजनिक न की जा सके। संशोधनों को इस तरह बदला जाए कि निजता और सार्वजनिक हित के बीच पुराना संतुलन बना रहे। ‘पत्रकार’ की परिभाषा में फ्रीलांसर, स्वतंत्र पत्रकार और डिजिटल रिपोर्टर भी शामिल हों। डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और प्रेस की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

कुल मिलाकर, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट एक ऐसे युग में आया है, जहां डेटा का दुरुपयोग एक गंभीर खतरा है। इस लिहाज़ से नागरिकों की निजता की रक्षा के लिए यह क़ानून एक अनिवार्य कदम है, लेकिन निजता की ढाल कहीं ऐसी न बन जाए, जो लोकतंत्र की सबसे अहम प्रहरी, स्वतंत्र प्रेस की तलवार को कुंद कर दे, पत्रकारिता और निजता में टकराव अवश्यंभावी है, लेकिन परिपक्व लोकतंत्र वही है जो इन दोनों के बीच संतुलन साध सके। सरकार के मौखिक आश्वासनों से आगे बढ़कर, ठोस कानूनी प्रावधानों के ज़रिये यह संदेश देना ज़रूरी है कि निजता की रक्षा के साथ-साथ सच्चाई बोलने और सुनने का अधिकार भी सुरक्षित है।

