त्वरित टिप्पणी:भगवा आतंकवाद का झूठा नैरेटिव बेनकाब
देवानंद सिंह
मालेगांव ब्लास्ट मामले में अदालत का फैसला भारतीय राजनीति के एक लंबे और विवादित अध्याय का अंत है। सभी आरोपियों के बरी होने से यह स्पष्ट हो गया कि वर्षों तक ‘भगवा आतंकवाद’ का जो नैरेटिव रचा गया, वह ठोस सबूतों पर नहीं बल्कि राजनीतिक फायदे के लिए गढ़ी गई कहानी थी।

यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील रहा। आरोपियों ने डेढ़ दशक तक अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए संघर्ष किया, जबकि उन्हें मीडिया ट्रायल और राजनीतिक बयानबाजी ने पहले ही ‘दोषी’ करार दे दिया था। इस दौरान न केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा नष्ट हुई बल्कि समाज में अविश्वास और विभाजन भी गहराया।
अदालत का यह फैसला न्यायपालिका की ताकत और निष्पक्षता का प्रतीक है। यह संदेश भी देता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और किसी खास विचारधारा या समुदाय को बिना ठोस सबूतों के आतंकवाद से जोड़ना न केवल न्याय के साथ खिलवाड़ है बल्कि देश की सामाजिक एकता को भी चोट पहुंचाता है।

अब समय आ गया है कि राजनीतिक दल और जिम्मेदार संस्थान इस घटना से सबक लें। देश को ऐसी राजनीति से बचाना होगा, जो बिना प्रमाण के आरोपों पर अपना एजेंडा चलाती है। मालेगांव का फैसला हमें याद दिलाता है कि नैरेटिव चाहे जितना भी जोरदार क्यों न हो, सच्चाई और न्याय अंततः विजयी होते हैं।

*मालेगांव ब्लास्ट केस एक नज़र*
सितंबर 2008: मालेगांव में बम धमाका, 6 लोगों की मौत, दर्जनों घायल
2008–2009: साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित सहित कई गिरफ्तार
2010: तत्कालीन सरकार और कुछ राजनीतिक दलों ने “भगवा आतंकवाद” शब्द का इस्तेमाल किया
2016: एनआईए ने चार्जशीट में कई आरोपियों को क्लीन चिट दी
2025: विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी किया
अदालत ने कहा – “मामले में आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं।”

