लेखक: देवानंद सिंह
पुणे में लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार-2026 समारोह केवल एक सम्मान समारोह नहीं था, बल्कि राष्ट्र निर्माण, राष्ट्रीय सुरक्षा और युवाओं की भूमिका पर गंभीर विमर्श का मंच भी बना। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने युवाओं से निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के लिए समर्पित होने का आह्वान किया, वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति को मजबूत करने में डोभाल के योगदान की सराहना की। दोनों नेताओं के वक्तव्यों में राष्ट्रवाद, नेतृत्व और जिम्मेदारी का स्पष्ट संदेश दिखाई दिया।
राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका
अजीत डोभाल का यह कहना कि भारत इतिहास के एक महत्वपूर्ण अवसर के दौर से गुजर रहा है, विचारणीय है। आज भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, रक्षा, अंतरिक्ष, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक कूटनीति में देश की भूमिका लगातार मजबूत हुई है। ऐसे समय में युवाओं की ऊर्जा और प्रतिभा यदि राष्ट्र निर्माण की दिशा में लगे, तो भारत के विकास की गति और तेज हो सकती है।
डोभाल ने स्वतंत्रता और अधिकारों के साथ कर्तव्यों की भी चर्चा की। यह एक ऐसा पक्ष है, जिस पर अक्सर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। लोकतंत्र केवल अधिकारों की मांग का नाम नहीं है, बल्कि संविधान के प्रति सम्मान, कानून का पालन, सामाजिक सौहार्द और नागरिक जिम्मेदारियों के निर्वहन का भी नाम है। स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग को याद करते हुए उन्होंने युवाओं से राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की अपील की, जो निश्चित रूप से प्रेरणादायक संदेश है।
दूसरी ओर, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अजीत डोभाल की भूमिका को राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के संदर्भ में रेखांकित किया। यह निर्विवाद है कि पिछले वर्षों में भारत ने सुरक्षा और रणनीतिक मामलों में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर निर्णय संस्थागत प्रक्रिया, विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों, सशस्त्र बलों, कूटनीतिक तंत्र और राजनीतिक नेतृत्व के सामूहिक प्रयासों का परिणाम होते हैं। किसी एक व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय उपलब्धियां सामूहिक संस्थागत क्षमता की देन भी होती हैं।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का स्मरण इस अवसर को और अधिक सार्थक बनाता है। तिलक ने केवल “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” का उद्घोष ही नहीं किया, बल्कि जनजागरण, शिक्षा, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक एकता को भी स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनाया। सार्वजनिक गणेशोत्सव और शिवाजी महोत्सव जैसे आयोजनों के माध्यम से उन्होंने समाज को संगठित करने का कार्य किया। उनके विचार आज भी नागरिक सहभागिता और राष्ट्रीय चेतना के संदर्भ में प्रासंगिक हैं।
आज के भारत में राष्ट्रवाद का अर्थ केवल भावनात्मक नारों तक सीमित नहीं रह सकता। इसका वास्तविक स्वरूप ईमानदार नागरिकता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक समरसता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास में दिखाई देना चाहिए। यदि युवा नवाचार, उद्यमिता, अनुसंधान, सामाजिक सेवा और ईमानदार सार्वजनिक जीवन में योगदान दें, तो यही राष्ट्रभक्ति की सबसे प्रभावी अभिव्यक्ति होगी।
यह भी आवश्यक है कि राष्ट्रीय हित की चर्चा लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ संतुलित रहे। लोकतंत्र में असहमति, संवाद और आलोचना भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितना कि राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा। एक सशक्त राष्ट्र वही होता है, जहां नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों के प्रति समान रूप से सजग हों।
अंततः, अजीत डोभाल का युवाओं के नाम संदेश और लोकमान्य तिलक की विरासत हमें यही याद दिलाती है कि राष्ट्र निर्माण किसी एक सरकार, नेता या संस्था का कार्य नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। यदि देश का युवा वर्ग अपने ज्ञान, परिश्रम और चरित्र को राष्ट्रहित के साथ जोड़ सके, तो भारत का भविष्य न केवल सुरक्षित होगा, बल्कि विश्व मंच पर और अधिक प्रभावशाली भी बनेगा। यही लोकमान्य तिलक के विचारों और आज के भारत की आकांक्षाओं का वास्तविक सम्मान होगा।
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