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    Home » “प्रशांत किशोर के उदय में किसका पतन?” — प्रदीप गुप्ता के आकलन पर एक राजनीतिक दृष्टि
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    “प्रशांत किशोर के उदय में किसका पतन?” — प्रदीप गुप्ता के आकलन पर एक राजनीतिक दृष्टि

    News DeskBy News DeskJuly 21, 2025No Comments3 Mins Read
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    “प्रशांत किशोर के उदय में किसका पतन?” — प्रदीप गुप्ता के आकलन पर एक राजनीतिक दृष्टि

    राष्ट्र संवाद ब्यूरो
    अशोक कुमार ठाकुर

    भारत जैसे जटिल और बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र में चुनावी भविष्यवाणियाँ सटीक विज्ञान नहीं, बल्कि विवेक और अनुभव से की गई समझदारी होती हैं। चुनावी विश्लेषक प्रदीप गुप्ता का बिहार को लेकर किया गया ताज़ा आकलन इसी समझदारी का एक उदाहरण है, जिसमें उन्होंने प्रशांत किशोर के राजनीतिक प्रभाव और उसके संभावित असर की एक संतुलित तस्वीर पेश की है।

     

    गुप्ता के मुताबिक, प्रशांत किशोर वर्तमान में जदयू और कांग्रेस के वोट बैंक में सबसे अधिक सेंध लगा रहे हैं। यह कोई साधारण बात नहीं है। नीतीश कुमार की सेहत को लेकर चल रही चर्चाएं और उनके भविष्य को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता से जदयू के कुछ परंपरागत वोटर विचलित हो रहे हैं — ख़ासकर वे, जो बीजेपी की विचारधारा से सहज नहीं हैं। यही वर्ग धीरे-धीरे प्रशांत किशोर या महागठबंधन की ओर देख रहा है।

     

    बीजेपी के भीतर भी असंतोष की लकीरें उभर रही हैं। गुप्ता का दावा है कि पार्टी के 6% ऐसे समर्थक हैं जो नीतीश कुमार को पसंद नहीं करते। 2020 में ये वोट चिराग पासवान की अगुआई में ‘हनुमान राजनीति’ का हिस्सा बने थे, जिसने पहले दो चरणों में असर भी दिखाया। अब यही वर्ग प्रशांत किशोर की ओर झुकता दिख रहा है — जो भविष्य में दिलचस्प समीकरण रच सकता है।

    हालांकि, इस उभरते समीकरण में एक स्पष्ट रेखा भी खिंचती है। राजद के यादव और मुस्लिम कोर वोटर किसी भी परिस्थिति में पीके के साथ जाने को तैयार नहीं दिखते। कम्युनिस्ट कैडर की ओर से भी उन्हें कोई ठोस समर्थन मिलता नहीं दिखता। ऐसे में प्रशांत किशोर की पकड़ सीमित वर्गों — जदयू के असंतुष्ट, कुछ सवर्ण कांग्रेसी और बीजेपी के एंटी-नीतीश खेमे — तक सिमटी हुई है।

     

    यह आकलन इस बात की ओर इशारा करता है कि बिहार की राजनीति में पीके भले ही एक नए प्रयोग की तरह उभरे हों, लेकिन उनका प्रभाव अभी सीमित और विशिष्ट वर्गीय आधार पर टिका है। आने वाले समय में यह देखना रोचक होगा कि क्या वे इस सीमित प्रभाव को जन आंदोलन में बदल पाएंगे या किसी बड़े दल के समीकरण में फिट होकर अपने लिए एक राजनीतिक जगह तलाशेंगे।

     

    भारत में राजनीति अक्सर गणित नहीं, केमिस्ट्री से चलती है। प्रदीप गुप्ता ने इस बार गणित से परे जाकर उस केमिस्ट्री की गंध को पकड़ा है — जो बिहार की हवा में धीरे-धीरे घुल रही है।

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