पांचकुड़ी के सरहजान और नुर आलम ने पेश किया मानवता की मिसाल,एक अनदेखे इंसान के प्रति संवेदना और सहायता की प्रेरणादायक कहानी
निजाम खान। राष्ट्र संवाद
जामताड़ा: इस तेज़ रफ्तार दुनिया में जहां लोग अक्सर अपने कामों में व्यस्त होकर दूसरों की तकलीफें नजरअंदाज़ कर देते हैं, वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बिना किसी स्वार्थ के इंसानियत का उदाहरण पेश करते हैं। बीती रात करीब 7 बजे ऐसी ही एक सच्ची और भावुक कर देने वाली घटना सामने आई जिसने समाज को एक बार फिर यह याद दिलाया कि इंसानियत अब भी ज़िंदा है।
पश्चिम बंगाल के सिउरी रेलवे स्टेशन के पास करीब आठ दिनों से एक असहाय व्यक्ति पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिला के लाभपुर किन्हार के सुखेन मुर्मू बिना अन्न-जल के बेसुध अवस्था में पड़ा था। लोग उसे “पागल” समझकर अनदेखा कर रहे थे — ना कोई पास गया, ना किसी ने उसकी मदद करने की कोशिश की। लेकिन तभी एक संवेदनशील नागरिक जामताड़ा जिला बिक्रमपुर पंचायत के पांचकुड़ी गांव के सरजहान खान और नुर आलम खान की नजर उस पर पड़ी, जिन लोगों ने न केवल उसकी स्थिति को समझा, बल्कि उसकी ज़िंदगी को एक नई दिशा भी दी। उक्त बातें राष्ट्र संवाद को सरजहान खान और नूर आलम खान के द्वारा बताया गया।
दोनों मददगार सरजहान और नुर आलम ने कहा जब उस व्यक्ति से बात की, तो पता चला कि वह किसी काम से सफर कर रहा था और किसी कारणवश उसे सिउरी रेलवे स्टेशन पर उतरना पड़ा। ट्रेन छूटने की अफरा-तफरी में वह चलती ट्रेन से गिर गया, जिससे उसका पैर बुरी तरह जख्मी हो गया। कुछ स्थानीय लोगों ने उसे अस्पताल पहुँचाया, लेकिन इलाज के दौरान उसके पास न तो मोबाइल था, न कोई नंबर, जिससे परिजनों से संपर्क हो सके। दो दिन बाद अस्पताल प्रशासन ने परिवार की जानकारी न होने पर उसे बाहर कर दिया।
बिना चलने-फिरने की स्थिति और भीषण दर्द के कारण वह वहीं पास में सड़क किनारे पड़ा रहा। न किसी से कुछ मांग सका, न कहीं जा सका। पूरे आठ दिन वह बिना देखभाल या सहारे के यूं ही पड़ा रहा।
इस अमानवीय स्थिति में जब सबने मुंह मोड़ लिया, तब इस सजग और दयालु व्यक्ति ने उसकी सुध ली। सबसे पहले उन्होंने उसे रात में खाना उपलब्ध कराया, ताकि वह भूख से राहत पा सके। अगली सुबह वे फिर पहुंचे, उसे नहलाया, साफ कपड़े पहनाए और उसकी मर्यादा व आत्मसम्मान का पूरा ध्यान रखा। इसके बाद उन्होंने उसे बस में बैठाया, जो उसके घर की ओर जा रही थी, और रास्ते खर्च के लिए कुछ आर्थिक सहायता भी दी।
यह न सिर्फ एक इंसान की सहायता थी, बल्कि पूरे समाज के लिए एक उदाहरण थी कि एक संवेदनशील दृष्टिकोण से किस तरह से हम किसी की टूटी ज़िंदगी को फिर से जोड़ सकते हैं।
इस घटना ने यह साबित कर दिया कि छोटे-छोटे कदम भी किसी की ज़िंदगी में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। जब हम किसी गिरे हुए को उठाते हैं, तो सिर्फ उसका नहीं, अपना भी मानवीय अस्तित्व मजबूत करते हैं। यह घटना एक प्रेरणादायक संदेश देती है कि हर व्यक्ति को जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।
आज जब समाज में संवेदनाएं कमजोर पड़ती जा रही हैं, ऐसे उदाहरण हमें सिखाते हैं कि असली ‘महानता’ किसी बड़े पद या पैसे में नहीं, बल्कि दूसरों की तकलीफ में उनका सहारा बनने में है।इंसानियत की इस मिसाल को राष्ट्र संवाद का नमन।

