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    Home » गोपाल खेमका हत्याकांड बिहार सरकार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह
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    गोपाल खेमका हत्याकांड बिहार सरकार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह

    News DeskBy News DeskJuly 10, 2025No Comments6 Mins Read
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    गोपाल खेमका हत्याकांड बिहार सरकार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह

    देवानंद सिंह

    बिहार में राजधानी पटना के पॉश इलाके में गत दिनों कारोबारी गोपाल खेमका की दिनदहाड़े हुई हत्या न केवल एक भयावह आपराधिक वारदात थी, बल्कि यह राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह भी है। डीएम ऑफिस और एसपी ऑफिस के पास हुए इस हत्याकांड ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अपराधी अब सत्ता और प्रशासन की छांव में नहीं, बल्कि उसकी आंखों में आंख डालकर चुनौती दे रहे हैं। गोपाल खेमका हत्याकांड में इस्तेमाल किया गया हथियार शूटर उमेश यादव ने राजा से खरीदा था। पुलिस ने अब उसी हथियार के सप्लायर राजा का एनकाउंटर कर दिया है। खेमका की हत्या उसी हथियार से की गई थी, जो राजा से खरीदा गया था। ऐसे में, राज्य सरकार, विशेषकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नेतृत्व में जेडीयू, अब उस नैरेटिव को संभालने के लिए जूझ रही है, जिसे वे वर्षों से सहेजते आ रहे हैं, बिहार में अब जंगलराज नहीं, शासन का राज है।

     

    लेकिन खेमका हत्याकांड और उससे पहले सीवान, वैशाली, गया, और छपरा में हुई कई संगीन वारदातें यह संकेत देने लगी हैं कि अपराध पर नियंत्रण का दावा अब महज़ आंकड़ों की बाज़ीगरी बन कर रह गया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देकर भले ही राज्य सरकार खुद को देश के अपेक्षाकृत ‘कम अपराधग्रस्त’ राज्यों की सूची में दर्शाने की कोशिश करे, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट हैं, क्योंकि अपराध का असली प्रभाव आंकड़ों से नहीं, नागरिकों के मन में उपजते भय और अविश्वास से आंका जाता है, और आज बिहार में वह भय गहराता जा रहा है।

     

    नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा में ‘सुशासन बाबू’ की छवि एक महत्वपूर्ण स्तंभ रही है। 2005 में जब उन्होंने पहली बार सत्ता संभाली, तो लालू प्रसाद यादव के ‘जंगलराज’ के विरोध में एक नया प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने का वादा किया। अपराध, भ्रष्टाचार और अराजकता से त्रस्त जनता को उम्मीद की एक किरण दिखी और यही कारण रहा कि नीतीश कुमार ने एक लंबा राजनीतिक समय सत्ता में बिताया, चाहे वह बीजेपी के साथ हो या आरजेडी के साथ।

    लेकिन 2025 की तस्वीर 2005 से बहुत अलग है। उम्रदराज होते नेता, लगातार दल-बदल, और जनभावनाओं से कटता हुआ सत्ता प्रतिष्ठान आज उस नीतीश कुमार की छवि को धूमिल कर रहा है, जो कभी बिहार में बदलाव की उम्मीद थे। गोपाल खेमका की हत्या उस विश्वास के पतन की प्रतीक है, जो जनता ने वर्षों में इस शासन में अर्जित किया था।

     

    2025 के अंत में या 2026 की शुरुआत में बिहार में विधानसभा चुनाव संभावित हैं। ऐसे में, खेमका हत्याकांड जैसे मामले न केवल राज्य सरकार की छवि पर चोट करते हैं, बल्कि विपक्ष के लिए एक सशक्त हथियार भी बनते हैं। आरजेडी, कांग्रेस और वाम दल पहले से ही नीतीश कुमार पर ‘डगमगाती प्रशासनिक पकड़’ और ‘अस्थिर गठबंधन राजनीति’ का आरोप लगाते रहे हैं। अब अपराध के ताज़ा मामलों ने उन्हें एक ठोस ज़मीन मुहैया कराई है।

     

    तेजस्वी यादव बार-बार दोहराते आ रहे हैं कि नीतीश कुमार की सरकार अब केवल दिखावटी है और असल सत्ता नौकरशाही व बीजेपी के हाथों में है। खेमका हत्याकांड ने इस नैरेटिव को बल दिया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी इसे ‘न्यू-जंगलराज’ करार देकर राज्य की राजनीति में नया विमर्श गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। पटना में हुए इस हत्याकांड की शैली, जिस तरह व्यवसायी को घेर कर, बेहद सुनियोजित तरीके से गोली मारी गई, यह संकेत देती है कि अपराध अब आत्मस्फूर्त या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सुनियोजित और संगठित रूप ले रहा है। बिहार में पहले से ही शराबबंदी के नाम पर उभरते अवैध नेटवर्क, बालू माफिया, रंगदारी और अपहरण उद्योग ने सत्ता की नाक के नीचे समानांतर व्यवस्थाएं खड़ी कर दी हैं।

     

    गोपनीय सूत्रों के अनुसार, खेमका हत्याकांड में भी कारोबारी प्रतिस्पर्धा, जमीन विवाद और राजनीतिक संरक्षण जैसे कई संदिग्ध पहलुओं की जांच चल रही है, जिसमें एक बिल्डर का नाम सामने आया है। यदि, यह सिद्ध होता है कि किसी संगठित गिरोह या राजनीतिक रसूख से जुड़े लोगों की संलिप्तता रही है, तो यह बिहार के चुनावी विमर्श में कानून-व्यवस्था को केंद्रीय मुद्दा बना सकता है। नीतीश कुमार को लेकर बिहार की राजनीति में एक स्पष्ट द्वैधता रही है। एक ओर जनता को उनकी नीतियों पर गहरा भरोसा रहा, खासकर शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के सुधार को लेकर, लेकिन दूसरी ओर उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता बार-बार गठबंधन बदलने और ‘डबल स्टैंडर्ड्स’ के चलते कमजोर हुई है।

     

    अब सवाल यह है कि क्या जनता 2025 के चुनाव में भी नीतीश कुमार को ‘विकास और स्थिरता’ का पर्याय मानकर वोट देगी, या फिर अपराध और अव्यवस्था के मुद्दे जनता को किसी नए नेतृत्व की ओर मोड़ देंगे? विशेषकर तब, जब युवा मतदाता, जो 2005 के ‘जंगलराज’ को केवल इतिहास की किताबों से जानता है, आज के हालात को अपने वर्तमान के रूप में देख रहा है।

    भाजपा वर्तमान में जेडीयू के साथ सत्ता में है, इस तरह की घटनाओं पर सार्वजनिक रूप से उतनी मुखर नहीं दिखती, जितनी विपक्ष अपेक्षा करता है। इसका एक कारण यह भी है कि वह नीतीश कुमार की आलोचना कर अपने ही गठबंधन को कमजोर नहीं करना चाहती, लेकिन भाजपा का एक तबका लगातार मानता रहा है कि नीतीश कुमार की प्रशासनिक पकड़ अब ढीली हो चुकी है और पार्टी को 2025 के चुनाव में अपनी स्वतंत्र रणनीति तैयार करनी चाहिए।

     

    संभावना है कि अगर कानून-व्यवस्था के मसले लगातार गहराते रहे, तो भाजपा अंततः इस मुद्दे को नीतीश से अलग होकर भुनाने की कोशिश कर सकती है, जैसा वह यूपी में ‘गुंडा राज’ का नैरेटिव गढ़कर अखिलेश यादव के खिलाफ कर चुकी है। बिहार की राजनीति में अपराध कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन उसकी प्रकृति बदलती रही है। लालू यादव के दौर में अपहरण और रंगदारी उद्योग के लिए चर्चित अपराध, आज जमीन, व्यवसाय और शराब तस्करी से जुड़े आर्थिक-अपराधों में तब्दील हो गए हैं, लेकिन जितनी जल्दी यह अपराध अपनी प्रकृति बदल रहा है, उतनी ही सुस्त होती दिख रही है राज्य की कानून-व्यवस्था। इस सुस्ती का सीधा असर चुनावी मानस पर पड़ेगा, क्योंकि अपराध सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा भी है।

    गोपाल खेमका की हत्या एक व्यक्ति की मौत भर नहीं है, वह एक समाज के भरोसे का विघटन है। बिहार सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब अपराध को नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि जनता के टूटते विश्वास को वापस अर्जित करने की है। यह तभी संभव है जब अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, राजनीतिक हस्तक्षेप से पुलिसिंग को मुक्त किया जाए, और मुख्यमंत्री स्वयं इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख लें।

    चुनाव आते-आते विपक्ष इस हत्या को ‘राज्य प्रायोजित जंगलराज’ के रूप में प्रस्तुत करेगा, और नीतीश कुमार को फिर से वही पुरानी कसौटी पर कसा जाएगा, क्या वे अपराध पर लगाम कस सकते हैं? क्या वे अभी भी ‘सुशासन बाबू’ हैं? आने वाले चुनाव में बिहार की जनता इस प्रश्न का जवाब देगी, लेकिन फिलहाल सवाल नीतीश सरकार के सामने खड़ा है, और जवाब समय पर देना होगा, वरना इतिहास केवल जंगलराज को याद नहीं रखेगा, बल्कि सुशासन के पतन को भी दर्ज करेगा।

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