“ठेका मजदूरों को न वेतन, न सुविधा — भाटिन माइंस में बढ़ा असंतोष, आंदोलन की तैयारी में मजदूर”
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जादूगोड़ा:यूसील के भाटिन माइंस में कार्यरत ठेका मजदूरों की स्थिति दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। ठेका कंपनी एमएफबी जिओ टेक द्वारा इस महीने अब तक मजदूरों को वेतन नहीं दिया गया है, जिससे वे आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।
मजदूरों का कहना है कि आमतौर पर हर महीने की 2 या 3 तारीख तक वेतन मिल जाया करता था, लेकिन अब 6 तारीख गुजरने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ। इससे उनके घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, और जरूरी दवाइयों तक पर असर पड़ा है।
मजदूरों ने पहले भी वेतन में देरी को लेकर यूसील प्रबंधन से कई बार शिकायत की थी, तब ठेका कंपनी को फटकार लगाई गई थी। एक समय पर भुगतान की प्रक्रिया शुरू हुई थी, लेकिन अब वही हालात दोबारा लौट आए हैं।
सिर्फ वेतन ही नहीं, सुविधाओं की भी भारी कमी है। मजदूरों को जूता, यूनिफॉर्म, साबुन तक नहीं मिल रहा, और कैंटीन की व्यवस्था आज तक शुरू नहीं की गई।
विटीसी (VTC) का भुगतान लंबित है, वहीं पीएफ की राशि जमा करने में भी दो से तीन महीने की देरी हो रही है। तय समय से अधिक काम लिया जा रहा है, जिससे कई मजदूर मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार हो चुके हैं।
मजदूरों ने यह भी आरोप लगाया कि 2 साल से वेतन में कोई वृद्धि नहीं हुई है। वहीं, स्किल्ड मजदूरों को आज भी अनस्किल्ड का वेतन दिया जा रहा है, जो शोषण का स्पष्ट उदाहरण है।
प्रबंधन की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। शिफ्ट इंचार्ज और सुपरवाइजर अंडरग्राउंड में उतरकर निरीक्षण तक नहीं करते, सिर्फ औपचारिकता निभा रहे हैं।
मैकेनिक विभाग के अधिकारी एस.के. सिंह 15 वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं। जहां अन्य अधिकारियों का तबादला होता रहा है, वहीं इनका तबादला आज तक नहीं हुआ। मजदूरों का आरोप है कि इन्हें यूसील के बड़े अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है, जिससे इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती।
स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब 60 वर्ष से अधिक उम्र के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को दोबारा काम पर रखा गया है, जबकि युवा मजदूरों की उपेक्षा की जा रही है।
इस सब के बीच मजदूरों का गुस्सा उफान पर है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो वे विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।
यूसील प्रबंधन और ठेका कंपनी की निष्क्रियता, अब मजदूरों की सहनशक्ति के बाहर जा चुकी है — यह सिर्फ श्रम का शोषण नहीं, एक सुनियोजित लापरवाही है।

