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    क्या विधानसभा चुनाव से पहले फिर करवट लेने वाली है बिहार की राजनीति ?

    Devanand SinghBy Devanand SinghJanuary 7, 2025No Comments5 Mins Read
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    क्या विधानसभा चुनाव से पहले फिर करवट लेने वाली है बिहार की राजनीति ?

    देवानंद सिंह

    बिहार की राजनीति हमेशा से ही उतार-चढ़ाव, संघर्ष और परिवर्तनों का प्रतिबिंब रही है। जब बात नीतीश कुमार की होती है, तो उनकी राजनीति और नेतृत्व को लेकर हमेशा ही राज्य में हलचल बनी रहती है। बिहार में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार को लेकर एक फिर हलचल तेज हो गई हैं, जिसके बाद बिहार सहित पूरे देश के सियासी गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या विधानसभा चुनाव से पहले बिहार की राजनीति एक बार फिर करवट लेने वाली है ? पिछले कुछ दिनों के अंदर जिस तरह की बयानबाजी और तस्वीरें सामने आईं हैं, उससे इस बात की तस्दीक जरूर होती है।

    चाहे आरजेडी नेता तेजस्वी यादव से नीतीश कुमार की मुलाकात की बात हो या फिर इससे पहले आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के उस बयान की बात हो, जिसमें उन्होंने एक चैनल के कार्यक्रम में कहा था कि नीतीश कुमार के लिए उनके दरवाज़े खुले हुए हैं, हालांकि तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार की तस्वीर एक सरकारी कार्यक्रम की थी, जहां पक्ष और विपक्ष का आना एक औपचारिक रस्म होती है, लेकिन कई बार औपचारिक रस्म में ही अनौपचारिक चीज़ें हो जाती हैं।
    लालू के बयान के बाद बिहार में कांग्रेस के नेता शकील अहमद ख़ान ने भी कहा था, गांधीवादी विचारधारा में विश्वास करने वाले लोग गोडसे वादियों से अलग हो जाएंगे, सब साथ हैं, नीतीश जी तो गांधीजी के सात उपदेश अपने टेबल पर रखते हैं।

     

     

    उल्लेखनीय है कि क़रीब एक साल पहले ही नीतीश कुमार ने बिहार में महागठबंधन का साथ छोड़ा था और वापस एनडीए में चले गए थे। वो अगस्त 2022 में दोबारा बिहार में महागठबंधन से जुड़े थे। जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पत्रकारों ने इस मुद्दे पर सवाल किया तो वो ख़ामोश भी दिखे। बिहार में बीजेपी के नेता कई बार इस तरह का बयान भी देते हैं कि वो राज्य में अपना मुख्यमंत्री और अपनी सरकार चाहते हैं। पिछले दिनों बीजेपी विधायक और राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के मौक़े पर कहा था कि अटल जी को सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब राज्य में बीजेपी का अपना मुख्यमंत्री होगा।

     

     

    हाल के समय में देशभर में कई क्षेत्रीय दलों में टूट हुई है, जिनमें महाराष्ट्र की शिव सेना और एनसीपी जैसे दल भी शामिल रहे हैं। बिहार में रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी पार्टी एलजेपी के भी दो टुकड़े हो गए, जिसके लिए चिराग पासवान ने बीजेपी के प्रति नाराज़गी भी जताई थी। इतना ही नहीं, ओडिशा में बीजू जनता दल जैसी ताक़तवर क्षेत्रीय पार्टी भी बीजेपी से हार गई थी।
    क्षेत्रीय पार्टियों के कमज़ोर पड़ने का सीधा फायदा बीजेपी को हो रहा है। ऐसे में, क्या नीतीश के मन में भी बीजेपी का डर है? जो उन्हें सियासी बदलाव के लिए मजबूर कर सकता है।

    हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि नीतीश राजनीतिक तौर पर मज़बूत हैं, इसलिए उनकी चर्चा होती रहती है। अगर, बीजेपी ने नीतीश की पार्टी तोड़ी तो भी उनका वोट नहीं तोड़ पाएंगे। नीतीश के भरोसे ही केंद्र की सरकार चल रही है तो बीजेपी ऐसा क्यों करेगी ? उनका मानना है कि बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्य में बहुत फ़र्क़ है। नीतीश कुमार सियासी तौर पर बहुत अनुभवी नेता हैं, जो हर चाल को पहले ही भांप लेते हैं। नीतीश अगर, आरजेडी के साथ जाते हैं तो भी वो ज़्यादा से ज़्यादा सीएम ही रहेंगे, पीएम नहीं बन जाएंगे। हो सकता है कि नीतीश कुमार बीजेपी पर दबाव बना रहे हों कि वो 122 विधानसभा सीटें चाहते हैं, बाक़ी सीटें बीजेपी अपने सहयोगियों के साथ बांटे।

     

     

    बिहार में विधानसभा की 243 सीटें हैं और राज्य के पिछले विधानसभा चुनाव में जेडीयू को महज़ 43 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि उसने 115 सीटों पर चुनाव लड़ा था, हालांकि इसके बाद भी नीतीश कुमार ही राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। लालू प्रसाद यादव ने नीतीश के लिए दरवाज़ा खुला होने की बात कहकर एक सधी हुई चाल चली है। इसका असर धीरे-धीरे समझ में आएगा। दरअसल, लालू यादव जानते हैं कि एनडीए में किसी भ्रम या टूट का फ़ायदा आरजेडी को होगा, लेकिन यह भी सच है कि नीतीश कुमार की पार्टी अकेले भले ही बहुत कुछ हासिल न कर पाए, लेकिन वो जिस गठबंधन में होती है, उसकी ताक़त काफ़ी बढ़ जाती है, लेकिन नीतीश की डर का यह भी कारण हो सकता है कि लोकसभा चुनावों में बीजेपी नीतीश कुमार से साथ एकता चाहती है, लेकिन विधानसभा चुनाव में वह अपनी ताक़त बढ़ाकर अपने बूते राज्य में सरकार बनाना चाहती है, इसलिए नीतीश कुमार को कमज़ोर करना चाहती है।

     

     

    पिछली बार भी चिराग पासवान की मदद से यह कोशिश की गई। इस सियासी चर्चा के बीच बिहार की सियासत क्या करवट लेगी, यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन फिलहाल तो भ्रम की ही स्थिति कही जा सकती है। उसकी सच्चाई नीतीश कुमार को छोड़कर कोई नहीं जानता है। पिछली बार भी जब नीतीश कुमार ने गठबंधन बदला था तो दो दिन पहले तक उनके मंत्रियों तक को कुछ पता नहीं था, इसीलिए सियासत के मैदान में कब क्या होगा, इस संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।

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