क्या एनडीए अपनी सत्ता बरकरार रखेगा, या तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन एक बार फिर वापसी करेगा?
देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति हमेशा से भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं और सामाजिक समीकरणों का आईना रही है। मंगलवार को जब राज्य की जनता ने दूसरे चरण के मतदान में अपनी भागीदारी निभाई, तो इसके साथ ही 2025 के विधानसभा चुनाव का मतदान प्रक्रिया पूरी हो गई। पहला चरण 6 नवंबर को संपन्न हुआ था, और अब 14 नवंबर को मतगणना के साथ यह तय होगा कि बिहार की सत्ता पर किस गठबंधन का झंडा फहराएगा।
243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में सरकार बनाने के लिए किसी भी दल या गठबंधन को 122 सीटों की दरकार है। इस बार का चुनाव दो प्रमुख गठबंधनों सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और विपक्षी महागठबंधन के बीच सीधी टक्कर के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, इस बार एक तीसरा चेहरा भी उभरा है जन सुराज, जो पहली बार चुनावी अखाड़े में उतरा है, और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कुछ सीमित क्षेत्रों में प्रभाव डाल सकता है।
मतदान समाप्त होते ही देश के लगभग सभी प्रमुख सर्वेक्षण एजेंसियों और मीडिया घरानों ने अपने एग्ज़िट पोल जारी किए हैं। दिलचस्प बात यह है कि लगभग सभी एग्ज़िट पोल एनडीए के पक्ष में हैं और उसे बहुमत से अधिक सीटें मिलती दिखा रहे हैं। हालांकि, एग्ज़िट पोल की भविष्यवाणियां हमेशा वास्तविक परिणामों से मेल नहीं खातीं, यह भारत की चुनावी राजनीति का अनुभवजन्य सच है।
मैटराइज़-आईएएनएस के एग्ज़िट पोल ने एनडीए को 147 से 167 सीटों के बीच जीत की संभावना जताई है, जबकि महागठबंधन को 70 से 90 सीटों और अन्य को 2 से 6 सीटें दी गई हैं। इस सर्वे के अनुसार, एनडीए को कुल 48 प्रतिशत और महागठबंधन को 37 प्रतिशत मत मिलने का अनुमान है। दलवार वितरण देखें तो बीजेपी को 65-73, जेडीयू को 67-75, एलजेपी (रामविलास) को 7 तक, हम को 4-5 और आरएलएम को 1-2 सीटें दी गई हैं।
वहीं, चाणक्य स्ट्रैटेजीज़ के अनुसार, एनडीए को 130-138 सीटें और महागठबंधन को 100-108 सीटें मिल सकती हैं। यह अनुमान अन्य एग्ज़िट पोल्स की तुलना में एनडीए की स्थिति को थोड़ा कमजोर दिखाता है, लेकिन सत्ता के दावेदार के रूप में उसे बनाए रखता है। दैनिक भास्कर के सर्वे में एनडीए को 145-160 सीटें, महागठबंधन को 73-91, जन सुराज को 0-3 और अन्य दलों को 5-7 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इसी तरह पीपल्स पल्स ने एनडीए को 133-159, महागठबंधन को 75-101, जन सुराज को 0-5 और अन्य को 2-8 सीटें दी हैं। पीपल्स इनसाइट ने एनडीए को 133-148 सीटों और महागठबंधन को 87-102 सीटों पर बढ़त दी है।
सबसे चौंकाने वाला सर्वे पोल डायरी का रहा, जिसने एनडीए को 184-209 सीटों का जबरदस्त बहुमत दिया है, जबकि महागठबंधन को केवल 32-49 सीटों तक सीमित बताया है। यह अनुमान बाकी सर्वेक्षणों से काफी अलग है और इसकी विश्वसनीयता पर राजनीतिक हलकों में सवाल भी उठे हैं। पी-मार्क और डीवी रिसर्च दोनों के अनुमानों में भी एनडीए को स्पष्ट बढ़त दिखाई गई है, क्रमशः 142-162 और 137-152 सीटों तक। वहीं, जेवीसी एग्ज़िट पोल ने एनडीए के लिए 135-150 और महागठबंधन के लिए 88-103 सीटों का अनुमान दिया है।
कुल मिलाकर, अधिकांश एग्ज़िट पोल एनडीए के पक्ष में रुझान दिखा रहे हैं, लेकिन अंतर इतना व्यापक है कि परिणामों से पहले किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाज़ी होगी। यह याद रखना ज़रूरी है कि बिहार में एग्ज़िट पोल और वास्तविक नतीजों के बीच कई बार बड़ा अंतर देखा गया है। 2015 और 2020 के चुनाव इसके सटीक उदाहरण हैं। 2015 में अधिकांश सर्वेक्षणों ने बीजेपी को आगे बताया था, जबकि परिणामों में महागठबंधन को अप्रत्याशित रूप से भारी जीत मिली। वहीं 2020 में कई एग्ज़िट पोल्स ने तेजस्वी यादव की आरजेडी को सबसे बड़ी पार्टी बताया था, परंतु अंततः एनडीए ने बेहद मामूली अंतर से सत्ता बरकरार रखी।
इसलिए इस बार भी विश्लेषक एग्ज़िट पोल्स को एक प्रवृत्ति के रूप में देख रहे हैं, अंतिम सच्चाई के रूप में नहीं। बिहार की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और स्थानीय नेतृत्व की प्रभावशीलता अक्सर गणितीय समीकरणों को उलट देती है। एनडीए गठबंधन इस बार पांच दलों के साथ मैदान में है। बीजेपी और जेडीयू ने बराबर-बराबर 101-101 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) 29 सीटों पर, जबकि राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (एचएएम) 6-6 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं।
दूसरी ओर, महागठबंधन का स्वरूप कुछ अधिक विविधतापूर्ण है। इसमें राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), कांग्रेस, वामपंथी दल और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) शामिल हैं। आरजेडी 143 सीटों, कांग्रेस 61, सीपीआई (एम-एल) 20, वीआईपी 13, सीपीआई (एम) 4 और सीपीआई 9 सीटों पर चुनाव लड़ी है, हालांकि महागठबंधन ने आधिकारिक तौर पर कोई साझा मुख्यमंत्री चेहरा घोषित नहीं किया, लेकिन चुनाव प्रचार के केंद्र में तेजस्वी यादव ही रहे। वहीं, एनडीए की ओर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संयुक्त रूप से प्रचार किया।
इस चुनाव में जन सुराज नामक तीसरा मोर्चा भी चर्चा में है। यह संगठन प्रशांत किशोर द्वारा शुरू किया गया था और इसे राजनीतिक रूप से सिस्टम से बाहर की राजनीति का विकल्प बताया गया। जन सुराज ने सीमित सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन राज्य के युवाओं और पढ़े-लिखे वर्ग में इसकी कुछ स्वीकार्यता दिखी। हालांकि, एग्ज़िट पोल्स के मुताबिक, जन सुराज को कोई बड़ी सफलता नहीं मिलने जा रही। फिर भी, विश्लेषक मानते हैं कि इस मोर्चे का असर कुछ सीटों पर कटवा वोटों के रूप में हो सकता है, जिससे महागठबंधन के वोट बैंक को नुकसान पहुंच सकता है।
बिहार विधानसभा की वर्तमान स्थिति देखें तो बीजेपी के 80, आरजेडी के 77, जेडीयू के 45, कांग्रेस के 19, सीपीआई (एम-एल) के 11, हम के 4, सीपीआई (एम) के 2, सीपीआई के 2, एआईएमआईएम के 1 और 2 निर्दलीय विधायक हैं। यानी, सत्ता संतुलन पहले से ही नाज़ुक है। 2020 में एनडीए मुश्किल से बहुमत के आंकड़े तक पहुंचा था। उस समय भी बीजेपी की तुलना में जेडीयू कमजोर साबित हुई थी और नीतीश कुमार की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठे थे। इसके बाद से दोनों दलों के बीच रिश्ते कई बार तल्ख़ हुए, लेकिन फिर राजनीतिक व्यावहारिकता के चलते उन्होंने गठबंधन बनाए रखा।
2025 का यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक करियर की विश्वसनीयता की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। एक समय में सुशासन बाबू के नाम से लोकप्रिय नीतीश के सामने अब जनता की आकांक्षाएं, बेरोज़गारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे बड़े सवाल के रूप में खड़े हैं।
दो चरणों के मतदान के दौरान रिपोर्टों के अनुसार, पहले चरण में लगभग 61 प्रतिशत और दूसरे चरण में 63 प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ। यह दर पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में थोड़ी अधिक है। उच्च मतदान को राजनीतिक पर्यवेक्षक एंटी-इंकंबेंसी (विरोधी लहर) के रूप में भी देख रहे हैं, जबकि कुछ इसे युवाओं और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का संकेत मानते हैं।बिहार में मतदाता लंबे समय से जातीय आधार पर मतदान करते रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में विकास, रोजगार और कानून व्यवस्था के मुद्दे भी निर्णायक बनने लगे हैं। एनडीए ने अपने अभियान में केंद्र सरकार की योजनाओं और प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता पर भरोसा जताया, जबकि महागठबंधन ने महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार के मुद्दों को प्रमुखता दी।
अगर, एग्ज़िट पोल्स सही साबित होते हैं और एनडीए को बहुमत मिलता है, तो यह न केवल नीतीश कुमार की वापसी को मजबूती देगा, बल्कि बीजेपी की भूमिका को और केंद्रीय बना देगा। बीजेपी बिहार की राजनीति में धीरे-धीरे जेडीयू पर हावी होती जा रही है, और अगर इस चुनाव में भी उसकी सीटें अधिक आती हैं, तो मुख्यमंत्री पद को लेकर भविष्य में फिर तनाव की स्थिति बन सकती है। दूसरी ओर, यदि नतीजे उलटफेर करते हैं और महागठबंधन को अपेक्षा से अधिक सीटें मिलती हैं, तो तेजस्वी यादव की छवि एक नए युग के विपक्षी नेता के रूप में और सशक्त होगी। तेजस्वी ने इस चुनाव में बेरोज़गारी को केंद्रीय मुद्दा बनाया है और युवाओं में उनकी अपील बढ़ी है।
बिहार में विधानसभा चुनावों का इतिहास दिलचस्प रहा है। 1952 में हुए पहले चुनाव से लेकर 2020 तक राज्य ने 17 विधानसभा चुनाव देखे हैं। 2005 में तो ऐसी स्थिति आई कि फरवरी में हुए चुनाव में कोई भी दल बहुमत नहीं जुटा पाया और कुछ महीनों बाद अक्टूबर में दोबारा चुनाव कराने पड़े। यह सिलसिला इस बात का प्रमाण है कि बिहार में जनमत स्थिर नहीं है। यह तेज़ी से बदलता है और अक्सर भावनात्मक व स्थानीय मुद्दों से संचालित होता है। यही कारण है कि एग्ज़िट पोल की सटीकता पर हमेशा प्रश्नचिह्न रहता है।
इन तमाम आंकड़ों, सर्वेक्षणों और राजनीतिक व्याख्याओं के बीच सच्चाई यह है कि 14 नवंबर की सुबह ही तय करेगी कि बिहार किस दिशा में जाएगा। क्या एनडीए अपनी सत्ता बरकरार रखेगा, या तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन एक बार फिर वापसी करेगा? फिलहाल, माहौल में प्रत्याशा और अनिश्चितता दोनों हैं। बिहार का मतदाता हमेशा की तरह चुपचाप अपना फैसला दे चुका है। अब बारी चुनाव आयोग की है कि वह उस फैसले को हमारे सामने लाए। एग्ज़िट पोल केवल रुझान दिखाते हैं, लोकतंत्र का असली फैसला मतपेटी करती है, और बिहार की मिट्टी में यह परंपरा कभी नहीं टूटी।

