राष्ट्र संवाद संवाददाता
चांडिल अनुमंडल अंतर्गत दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी से सटे तराई क्षेत्र के आदिवासी गांवों में इन दिनों हाथियों का आतंक चरम पर है। काठजोड़, तुलीन, मकुलाकोचा समेत कई गांवों में शाम ढलते ही ग्रामीणों का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से एक ट्रस्कर (दांत वाला) हाथी लगातार गांवों में प्रवेश कर रहा है। यह हाथी घरों में रखे अनाज को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ जमकर उत्पात मचा रहा है। सोमवार की रात भी हाथी ने खाड़िया बस्ती स्थित नव प्राथमिक विद्यालय का दरवाजा और दीवार तोड़कर मिड-डे मील के लिए रखे चावल को अपना निवाला बना लिया।
ग्रामीणों का कहना है कि जंगल में पर्याप्त भोजन नहीं मिलने के कारण हाथी गांवों की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, एक और चौंकाने वाली वजह सामने आई है। बताया जा रहा है कि क्षेत्र में चल रही अवैध महुआ शराब भट्टियों से निकलने वाली गंध हाथियों को आकर्षित कर रही है। महुआ, गुड़ और रासायनिक पदार्थों से तैयार की जाने वाली सामग्री हाथियों के लिए “आसान आहार” बन गई है। इसे खाने के बाद हाथी मस्त होकर गांवों में उत्पात मचाते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि हाथी इन अवैध शराब भट्टियों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। जिस कार्रवाई को प्रशासन और उत्पाद विभाग नहीं कर पा रहा, वह काम गजराज कर रहे हैं। इससे शराब माफियाओं में हड़कंप मचा हुआ है।
सोमवार रात की घटना में हाथी ने काटजोड़ गांव में शराब भट्टी को नुकसान पहुंचाने के बाद नीमडीह प्रखंड के लुपुंगडीह पंचायत स्थित खाड़िया बस्ती स्कूल में भी अनाज खा लिया। इसके बाद पथरडीह गांव में एक घर को क्षतिग्रस्त कर दिया। ग्रामीणों ने एकजुट होकर हाथी को खदेड़ा, लेकिन रास्ते में उसने कई घरों और खेतों को नुकसान पहुंचाया।
घटना के दौरान तिल्ला पंचायत के कई घरों को भी क्षति पहुंची, जबकि खेतों में लगी फसलों को रौंद दिया गया। इससे किसानों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।
ग्रामीणों ने वन विभाग और उत्पाद विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि अवैध शराब कारोबार पर कार्रवाई नहीं होने से हाथियों का गांवों में आना बढ़ गया है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष गहरा रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हाथियों को जंगल में पर्याप्त भोजन क्यों नहीं मिल पा रहा है, और आखिर कब तक ग्रामीण इस भय के साए में जीने को मजबूर रहेंगे?

