लेखक: देवानंद सिंह
संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है। यहां सत्ता पक्ष से सवाल पूछना, सरकार को जवाबदेह बनाना और जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाना विपक्ष का लोकतांत्रिक दायित्व है। लेकिन इसके साथ यह भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है कि संसद की कार्यवाही चलने दी जाए और जनता से जुड़े मुद्दों पर सार्थक बहस हो। दुर्भाग्य से इस बार संसद के मानसून सत्र की तस्वीर लगातार हंगामे और व्यवधान से घिरी दिखाई दी है।
संसद की कार्यवाही पर हंगामे का असर
लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में कार्यवाही बाधित हुई। लोकसभा में राजधानी में विद्यार्थियों पर पुलिस कार्रवाई और उससे जुड़े सवालों को लेकर विपक्षी सदस्यों ने सरकार से जवाब मांगा। विपक्ष ने प्रश्नकाल के दौरान सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की कि प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के आदेश किस स्तर से दिए गए और इस पूरे मामले में गृह मंत्रालय की क्या भूमिका रही। इसके साथ ही अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले की जांच की मांग भी विपक्ष की ओर से उठाई गई।
वहीं राज्यसभा में अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मुद्दे को लेकर विपक्षी सदस्यों के हंगामे से प्रश्नकाल बाधित रहा। सदस्य नारेबाजी करते हुए सदन के बीचोबीच आ गए। सभापति ने सदस्यों से कार्यवाही चलने देने का आग्रह किया, लेकिन हंगामा जारी रहने के कारण अंततः सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित करनी पड़ी। इसी दौरान केरल का नाम परिवर्तन विधेयक, 2026 और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) विधेयक, 2026 भी सदन से पारित हुए। लोकसभा आधिकारिक वेबसाइट पर अधिक जानकारी उपलब्ध है।
संसदीय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल
यहां सवाल किसी एक राजनीतिक दल को कटघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि संसदीय व्यवस्था की विश्वसनीयता का है। विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है, लेकिन सवाल पूछने के लिए सदन को ठप करना क्या उचित तरीका है? दूसरी ओर सत्ता पक्ष को भी यह समझना होगा कि बहुमत केवल विधेयक पारित करने का अधिकार नहीं देता, बल्कि विपक्ष के सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी भी देता है।
इस पूरे सत्र में कई महत्वपूर्ण मुद्दे चर्चा की प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन सदन का बड़ा समय हंगामे और व्यवधान में निकलता दिखाई दिया। लोकसभा हो या राज्यसभा, दोनों सदनों की कार्यवाही बाधित होने की तस्वीर देश ही नहीं, पूरी दुनिया ने देखी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जनता के प्रतिनिधि जिस मंच पर जनता के सवालों का जवाब मांगने और देने के लिए भेजे जाते हैं, वहां सार्थक चर्चा क्यों नहीं हो पा रही है?
जनता के पैसे की बर्बादी का हिसाब
संसद की कार्यवाही पर होने वाला खर्च आखिरकार आम जनता के टैक्स के पैसे से चलता है। सांसदों का वेतन, भत्ते, संसद की व्यवस्था, सुरक्षा और पूरी संसदीय प्रक्रिया पर जनता का पैसा खर्च होता है। यदि सदन बार-बार स्थगित हो और महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस के बजाय नारेबाजी होती रहे, तो यह सवाल जनता के सामने स्वाभाविक रूप से खड़ा होता है इस बर्बादी की जिम्मेदारी कौन लेगा?
यह जिम्मेदारी केवल विपक्ष की नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका जनता देख रही है। विपक्ष को अपनी आवाज बुलंद करनी है तो संसदीय मर्यादा और नियमों के भीतर रहकर प्रभावी तरीके अपनाने होंगे। सत्ता पक्ष को भी विपक्ष के सवालों से बचने के बजाय उन्हें सुनना और उनका जवाब देना होगा। लोकतंत्र में बहुमत सरकार चलाने का अधिकार देता है, लेकिन विपक्ष की आवाज को अनसुना करने का लाइसेंस नहीं देता।
विरोध लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन हंगामा लोकतांत्रिक बहस का विकल्प नहीं हो सकता। संसद राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं, बल्कि देश की नीतियां तय करने और जनता की समस्याओं पर चर्चा करने का सर्वोच्च संस्थागत मंच है।
आज देश की जनता यह देख रही है कि उसके प्रतिनिधि संसद में क्या कर रहे हैं। कौन सवाल पूछ रहा है, कौन जवाब दे रहा है, कौन चर्चा चाहता है और कौन सदन को चलने दे रहा है सबका हिसाब जनता के पास दर्ज हो रहा है।
बहरहाल सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों जनता के प्रति जवाबदेह हैं। संसद का समय और जनता का पैसा किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। पूरे सत्र में यदि सदन हंगामे की भेंट चढ़ता है और जनहित के मुद्दों पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो पाती, तो इसका जवाब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को देना होगा। जनता सब देख रही है और लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का ही होता है। समय आने पर जनता अपने जनप्रतिनिधियों से इस पूरे सत्र का हिसाब जरूर मांगेगी।

