साम्प्रतिक सामाजिक पतन के लिए कसूरवार कौन …
वर्तमान समय का समाज नैतिक पतन की ओर अग्रसर है। जिन लोगों द्वारा समाज बनाए गए, वही लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं। क्योंकि, जिस तरह हमारे समाज में व्यक्तियों के बीच सद्भाव, सहयोग और करुणा है, उसी तरह उनके मन में नफरत, लालच और हिंसा भी पैदा हो सकती है। इसलिए सामाजिक व्यवस्था सुगम बनाए रखने के लिए ज्यादातर मामलों में कुछ लिखित या अलिखित नियम होते हैं, जिनका उल्लंघन करना समाज की नजर में बेहद अपमानजनक और दंडनीय होता है। सुन्दर एवं तटस्थ सामाजिक व्यवस्था के लिए सद्भाव एवं सहयोग आवश्यक है।

हम सभी को ऐसी स्थिति से मुक्त करके समाज को सही दिशा में ले जाना होगा। अब हम एक ऐसी पैचीदा मोड़ पर खड़े हैं जहाँ समाज मानवीय मूल्यों के गिरावट से जूझ रहा है।
चारों ओर सौहार्द की जगह विभाजन के बीज अंकुरित हो रहे हैं। विश्वास की जगह संदेह ने ले ली है । परिवर्तन के नाम पर भोगवाद को प्राधान्य दिया जा रहा हैं । यह प्रवृत्ति समाज के लिए एक बुरा संकेत लेकर आई हैं। समाज का यह अप्रिय वातावरण अक्सर मन पर बोझ डालता हैं । इसलिए मूल्यों की बुनियाद हिला देने वाली ऐसी कई बातें दिमाग में तहलका मचाती हैं । आज के समाज में हमने मानवीय मूल्यों की कमी देखी है। यदि हमें किसी समाज में मूल्यवोध वाले लोग मिलते हैं अर्थात जहाँ लोग दिल से एक दूसरे के प्रति ईमानदार, दयालु, संयमी, शांतिपूर्ण, सदाचारी, प्रेमपूर्ण, धर्मनिरपेक्ष ,

भाईचारापूर्ण हो तो उस समाज को आदर्श समाज कहा जा सकता है ,उस देश को एक आदर्श राष्ट्र के रूप में पहचाना जायेगा। एक आदर्श व्यक्ति , मूल्यवोध समझते हैं, सदैव सभी धर्मों के प्रति समान रूप से उदार रहता है। किसी भी धर्म के प्रति असहिष्णु नहीं होते । आज हमारे समाज के यांत्रिकीकरण की होड़ में मानवता दिग्भ्रमित हो गई है। भोगवादी मानसिकता ने हमारे नैतिक मूल्यों को छीन लिया है। जीवश्रेष्ठ की क्रूरता के उदय में मानवता छीन ली गयी है। शंकर-माधव के सौहार्दवाले देश में हिंसा और प्रतिशोध की आग भड़क रही हैं ।

मनुष्य को संसार का सर्वोत्तम प्राणी माना जाता है। परन्तु सर्वोत्तम प्राणियों के ही मानवीय गुण लुप्त होते जा रहे हैं। लोग अब दानव बनते जा रहे हैं । दुनिया भर में हिंसा और हत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। दुनिया में लोगो की अमानवीय गतिविधियाँ अन्य प्रजातियों के लिए अत्यधिक खतरा पैदा कर रही हैं और पूरी दुनिया अशांति से दिन कांट रहे हैं । हमें दुनिया में अपने लिए जो संभावनाएं हैं, उसे नष्ट नहीं करना चाहिए। यदि हम सभी बुद्धिमान हैं, हम सभी स्वस्थ हैं, हम सभी खुश और आनंदित हैं, तो हम सद्भाव में रह सकते हैं। ऐसे कई नेता हैं जो समकालीन समाज के पतन के लिए जिम्मेदार हैं। वे सत्ता के लिए दल बदलते रहे हैं, जैसे कपड़े बदल रहे हो । उनका लक्ष्य सिर्फ सत्ता की बागडोर अपने पास रखना है । भारतीय इतिहास की किसी भी संवेदनशील मुद्दे का सम्पूर्ण सत्य जानकारी या ज्ञान के बिना यदि सभी लोग अपनी सुविधानुसार राजनीति करते हैं या राष्ट्र परिचालन करते हैं तो राष्ट्र का विनाश या एक जाति की पतन की संभावनाएं बहुत अधिक बन जाती हैं ।

लेखिका : मनीषा शर्मा
जालूकबारी , गुवाहाटी
अनुवादक :रितेश शर्मा

