न्याय, कूटनीति, इतिहास और साहस के प्रतीक हैं राज्यसभा के लिए नामित सदस्य
देवानंद सिंह
भारत की संसद का उच्च सदन राज्यसभा न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मंच है, बल्कि यह उन व्यक्तियों को भी मंच प्रदान करता है, जिन्होंने साहित्य, विज्ञान, कला या सामाजिक सेवा जैसे विविध क्षेत्रों में असाधारण योगदान दिया हो। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80(3) के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा ऐसे विशिष्ट नागरिकों को राज्यसभा के लिए मनोनीत करने का प्रावधान है। गत दिनों, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस संवैधानिक प्रावधान का प्रयोग करते हुए चार नए सदस्यों, वरिष्ठ अधिवक्ता उज्ज्वल देवराज निकम, पूर्व विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला, इतिहासकार डॉ. मीनाक्षी जैन और समाजसेवी शिक्षक सी. सदानंदन मास्टर को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है। यह चयन भारतीय लोकतंत्र की विविधता, संतुलन और समावेशिता को दर्शाता है।

महाराष्ट्र के जलगांव से आने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता उज्ज्वल निकम भारत की न्यायिक व्यवस्था का ऐसा नाम है, जो न केवल अपने कानूनी कौशल के लिए बल्कि न्याय की राह में आने वाले खतरों से डटकर मुकाबला करने के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने 1993 के मुंबई बम धमाकों से जुड़े मामले में विशेष सरकारी वकील के रूप में जो भूमिका निभाई, उसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक अत्यंत चर्चित और सम्मानित शख्सियत बना दिया। इस हमले में 257 लोगों की जान गई थी और देश की न्याय व्यवस्था पर उसकी साख का बड़ा इम्तहान था।

निकम ने इस मामले में 123 अभियुक्तों में से 100 को दोषी सिद्ध कराया और 12 को मृत्युदंड दिलाया। इस दौरान उन्हें लगातार धमकियां मिलीं, लेकिन वे डटे रहे। उनकी सुरक्षा के लिए सरकार ने उन्हें ज़ेड-प्लस श्रेणी की सुरक्षा दी। यही नहीं, उन्होंने अजमल कसाब जैसे आतंकियों के मुक़दमे में भी विशेष सरकारी वकील के तौर पर जन भावनाओं और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए न्याय सुनिश्चित किया, हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में वे बीजेपी के टिकट पर मुंबई उत्तर मध्य से पराजित हुए थे, लेकिन राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में उनका नामांकन उनकी कानूनी विशेषज्ञता और देश के प्रति उनके योगदान को एक उपयुक्त मंच प्रदान करता है।

वहीं, पूर्व विदेश सचिव और वरिष्ठ राजनयिक हर्ष वर्धन श्रृंगला की नियुक्ति उस कूटनीतिक परंपरा को सम्मान देती है, जिसमें सेवानिवृत्त अफसरों को नीति निर्माण में भागीदारी दी जाती है। 1984 बैच के भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी श्रृंगला ने अमेरिका, बांग्लादेश और थाईलैंड जैसे देशों में भारत के राजदूत के रूप में काम किया। उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान संकट, भारत-चीन सीमा तनाव और कोविड-19 के वैश्विक प्रभाव जैसी जटिल परिस्थितियों में विदेश सचिव रहते हुए भारत की विदेश नीति को प्रभावी ढंग से संचालित किया।

2023 में जब भारत ने G20 की अध्यक्षता संभाली, तो उन्हें मुख्य समन्वयक की जिम्मेदारी दी गई। उनके नेतृत्व में G20 सम्मेलन का सफल आयोजन भारत की वैश्विक छवि को सुदृढ़ करने वाला कदम बना। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं श्रृंगला के योगदान की सार्वजनिक सराहना की है।
श्रृंगला की बहुभाषिक क्षमता (अंग्रेज़ी, हिंदी, फ्रेंच, वियतनामी, नेपाली, बंगाली, सिक्किमी) और उनकी वैश्विक समझ उन्हें राज्यसभा में विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े विमर्श में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बनाएगी।

इस सूची में तीसरा नाम डॉ. मीनाक्षी जैन का है। यह नाम भारतीय इतिहास लेखन में उस धारा का प्रतिनिधित्व करता है, जो तथाकथित ‘धार्मिक-राष्ट्रीय विमर्श’ को अकादमिक ठोसता के साथ प्रस्तुत करती है। गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाने वाली डॉ. जैन ने सती प्रथा, अयोध्या, मंदिर पुनर्निर्माण जैसे जटिल एवं विवादास्पद विषयों पर अकादमिक शोध किया है। उनकी पुस्तकों सती: एवैंजेलिकल्स, बैपटिस्ट मिशनरीज़ एंड द चेंजिंग कोलोनियल डिस्कोर्स, रामा एंड अयोध्या, और फ्लाइट ऑफ़ डिएटीज़ एंड रीबर्थ ऑफ़ टेम्पल्स जैसे कार्यों ने भारतीय इतिहास लेखन में बहस की नई दिशाएं खोली हैं।
2014 में उन्हें इंडियन काउंसिल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिसर्च (ICHR) का सदस्य बनाया गया और 2020 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी विद्वता, शोधकार्य और सांस्कृतिक बोध की खुले शब्दों में प्रशंसा की है। राज्यसभा में डॉ. जैन की उपस्थिति न केवल शिक्षा और संस्कृति से जुड़े विषयों में विमर्श को समृद्ध करेगी, बल्कि इतिहास के परिप्रेक्ष्य में नीति निर्माण को भी प्रभावित कर सकती है, विशेषकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति और सांस्कृतिक पुनरुत्थान जैसे विषयों पर।
इस सूची में चौथा नाम केरल के कन्नूर जिले से आने वाले सदानंदन मास्टर का है, जो भारतीय राजनीति में साहस की जीवंत मिसाल हैं। एक शिक्षक से लेकर समाजसेवी और फिर राजनीतिक कार्यकर्ता बनने तक उनकी यात्रा संघर्षों से भरी रही है। 1994 में वामपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए हमले में उन्होंने अपने दोनों पैर गंवा दिए थे। यह हमला न केवल व्यक्तिगत त्रासदी था, बल्कि केरल की राजनीतिक हिंसा के दौर की भयावहता को उजागर करता है। इसके बावजूद सदानंदन मास्टर ने शिक्षा और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में अपने योगदान को जारी रखा। वे राष्ट्रीय शिक्षक संघ के उपाध्यक्ष बने और भाजपा के ज़मीनी संगठनात्मक ढांचे में एक प्रमुख स्तंभ बने। 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने कुथुपरम्बा सीट से चुनाव लड़ा। यह वही क्षेत्र है, जहां 1990 के दशक में राजनीतिक हत्याओं की काली छाया थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अन्याय के सामने न झुकने वाले साहसी कार्यकर्ता बताया है। राज्यसभा में उनकी उपस्थिति सामाजिक न्याय, राजनीतिक हिंसा और शैक्षिक नीतियों पर केंद्रित चर्चाओं में नई दृष्टि जोड़ सकती है।
कुल मिलाकर, उक्त चारों नामित सदस्यों की पृष्ठभूमियां अलग-अलग हैं, लेकिन इन सबमें एक साझा तत्व है, वह है भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के प्रति गहन प्रतिबद्धता। चाहे वह अदालतों में आतंकवादियों को सज़ा दिलाने वाले निकम हों, वैश्विक मंच पर भारत की आवाज़ बुलंद करने वाले श्रृंगला, इतिहास की वैकल्पिक व्याख्याओं को अकादमिक स्वरूप देने वाली डॉ. जैन हों या व्यक्तिगत त्रासदी को सामाजिक प्रतिबद्धता में बदलने वाले सदानंदन मास्टर, सभी ने अपने-अपने क्षेत्रों में एक छाप छोड़ी है।

यह नामांकन केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की उस शक्ति का उदाहरण है, जिसमें विचारधारा, पेशेवर विविधता और जीवन संघर्ष, सबको समाहित कर देशहित में नीति-निर्माण का मंच प्रदान किया जाता है। ऐसे में, यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले वर्षों में ये चारों सदस्य संसद की कार्यवाही में न केवल भाग लेंगे, बल्कि उसे गुणवत्तापूर्ण और जनपक्षधर दिशा भी प्रदान करेंगे।

