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    Home » बिहार विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों का रुझान क्या होगा यह अहम सवाल ?
    Breaking News Headlines जमशेदपुर संपादकीय

    बिहार विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों का रुझान क्या होगा यह अहम सवाल ?

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीOctober 4, 2025No Comments7 Mins Read
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    मतदाता सूची पर सियासत
    नेपाल की राजनीति
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    देवानंद सिंह
    बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की बिसात बिछ चुकी है। इस बार चुनावी मुकाबले का सबसे अहम प्रश्न यही है कि मुस्लिम वोटर किस ओर जाएंगे। दरअसल, बिहार की राजनीति में मुस्लिम वोट हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। राजद का पुराना एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण हो, कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक हो, या फिर हाल में एआईएमआईएम और जनसुराज की सक्रियता – हर पार्टी के लिए मुस्लिम मतदाताओं की नब्ज समझना अनिवार्य हो चुका है, लेकिन इस बार का चुनाव सामान्य चुनाव नहीं है। यह चुनाव एक बड़े विवाद वक्फ बोर्ड संशोधन कानून की परछाईं में हो रहा है। यही वजह है कि मुस्लिम वोटर इस बार सिर्फ रोज़मर्रा की राजनीति नहीं, बल्कि अपने धार्मिक और सामाजिक अस्तित्व से जुड़े सवालों को लेकर मतदान करेंगे।

     

     

    केंद्रीय मंत्री और जेडीयू सांसद ललन सिंह ने संसद में साफ कहा था कि वक्फ बोर्ड संशोधन कानून मुस्लिम विरोधी नहीं है। उनके मुताबिक वक्फ ट्रस्ट कोई धार्मिक संस्था नहीं बल्कि एक प्रशासनिक ढांचा है, और इसका उद्देश्य सभी वर्गों में न्याय सुनिश्चित करना है। ललन सिंह का तर्क था कि इस कानून से वक्फ संपत्तियों पर अवैध कब्जे हटेंगे और आम मुसलमानों को फायदा होगा। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि 2013 में उसने वक्फ बोर्ड को लेकर ऐसा पाप किया, जिसे अब मोदी सरकार ने सुधार दिया है, लेकिन सवाल यही है कि मुस्लिम समाज इस दलील को कितना स्वीकार करता है? जमीन पर देखने से साफ होता है कि वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ कई मुस्लिम संगठन खड़े हुए। जेडीयू के मुस्लिम नेता भी इस पर पार्टी लाइन के खिलाफ बयान देने लगे। नीतीश कुमार की चुप्पी को मुस्लिम समाज ने खटकते हुए नोट किया। नतीजा यह हुआ कि जेडीयू पर आरएसएस से नजदीकी बढ़ाने का आरोप लगने लगा।

     

     

    2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने मुस्लिम समाज को साधने की कोशिश की थी। 11 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए गए, लेकिन नतीजा? सभी 11 हार गए। यानी टिकट तो मिले लेकिन मुस्लिम वोट ट्रांसफर नहीं हुआ। मुस्लिम वोटरों ने NDA पर विश्वास जताने से परहेज़ किया और इसका परिणाम यह हुआ कि जेडीयू अपने ही मुस्लिम कार्ड में फेल हो गई। उस समय उर्दू अखबारों के संपादकों ने जेडीयू नेताओं को साफ कहा था कि जब तक बीजेपी के साथ रहेंगे, मुस्लिमों का भरोसा नहीं मिलेगा। यही स्थिति आज 2025 में और भी गहरी हो चुकी है। वजह यह है कि इस बार वक्फ संशोधन कानून, घुसपैठिया विमर्श और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की लगातार बिहार यात्राओं ने मुस्लिम वोटरों की संवेदनशीलता को और अधिक जगा दिया है।

     

     

    2020 के बाद से मुस्लिम समाज में तीन मुद्दों पर असंतोष गहराया। पहला, सत्ता पक्ष में एक भी मुस्लिम विधायक का न होना। दूसरा, बीजेपी का सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना, और बिहार में आरएसएस की सक्रियता और सीमांचल में ‘घुसपैठिया’ विमर्श का फैलना।
    ये तीनों वजहें मिलकर मुस्लिमों के लिए राजनीतिक उपेक्षा का प्रतीक बन गईं। यही कारण है कि इस बार मुस्लिम वोटरों की नाराज़गी का लाभ सीधे तौर पर विपक्षी खेमे को मिल सकता है।

     

     

    राजद का एम-वाई समीकरण लालू यादव की राजनीति का आधार रहा है। लेकिन 2010 के बाद यह समीकरण कमजोर हुआ। 2015 में महागठबंधन की सफलता और 2020 में तेजस्वी यादव की लोकप्रियता ने इसे फिर से मजबूत किया, लेकिन 2025 का चुनाव अलग है। इस बार कमान खुद लालू यादव ने संभाली है। उनकी राजनीतिक सक्रियता ने मुस्लिम समाज को एक भरोसा दिया है कि राजद अब भी वही है जो पहले मुस्लिमों का सबसे बड़ा राजनीतिक सहारा रहा है। वक्फ संशोधन कानून और घुसपैठिया विमर्श ने मुस्लिम वोटरों को राजद की ओर और भी धकेला है। राजद के लिए यह दोहरा लाभ है, यादवों का परंपरागत समर्थन और मुस्लिमों की वापसी। यही वजह है कि 2025 में MY समीकरण सबसे अधिक संगठित रूप में दिख रहा है।

     

     

    एआईएमआईएम ने 2020 में सीमांचल में पांच सीटें जीतकर सबको चौंकाया था। ओवैसी ने मुस्लिमों को यह संदेश दिया कि वे अपनी अलग राजनीतिक ताकत बन सकते हैं, लेकिन समस्या यह है कि एआईएमआईएम को अक्सर बीजेपी की बी-टीम कहा जाता रहा। यही टैग मुस्लिम वोटरों को सोचने पर मजबूर करता है। इस बार एआईएमआईएम ने राजद से गठबंधन की कोशिश की लेकिन राजद ने इनकार कर दिया। अब ओवैसी अकेले मैदान में उतरेंगे या किसी छोटे दल के साथ गठबंधन करेंगे – यह अभी तय नहीं है। लेकिन इतना साफ है कि अकेले लड़ने पर उन्हें सीमांचल में कुछ सीटें मिल सकती हैं, मगर पूरे बिहार में उनकी पकड़ कमजोर रहेगी। मुस्लिम वोटरों का बड़ा हिस्सा इस बार एआईएमआईएम की बजाय राजद के साथ जाना चाहता है।

     

     

    प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने 75 मुस्लिम उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है। यह एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग हो सकता है। लेकिन सवाल यही है कि क्या मुस्लिम वोटर प्रशांत किशोर के साथ खड़े होंगे? अभी तक मुस्लिम समाज में जनसुराज को लेकर कोई ठोस लहर नहीं दिखती। पीके का संगठन गांव-गांव काम कर रहा है, लेकिन मुस्लिम वोटर उन्हें एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में कितनी जल्दी स्वीकार करेंगे – यह चुनाव का सबसे बड़ा सवाल है।

     

     

    तेज प्रताप यादव का अलग तेवर भी इस चुनाव में चर्चा में है। लेकिन वास्तविकता यह है कि मुस्लिम वोटर तेजस्वी और लालू यादव की राजनीति से अधिक प्रभावित हैं। तेज प्रताप का व्यक्तिगत करिश्मा मुस्लिम वोटों को आकर्षित करने में सक्षम नहीं दिखता। बीजेपी इस बार भी अपने “सबका साथ, सबका विकास” फॉर्मूले पर चुनाव में उतरेगी। लेकिन सवाल यही है कि क्या मुस्लिम समाज इस नारे पर भरोसा करेगा? 2014, 2019 और 2020 के अनुभव बताते हैं कि मुस्लिम वोटरों ने बीजेपी से दूरी बनाए रखी। वक्फ संशोधन कानून और घुसपैठिया विमर्श ने इस दूरी को और गहरा कर दिया है।

    बीजेपी मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश जरूर करेगी, लेकिन वास्तविकता यही है कि बिहार में उसका आधार हिंदुत्व और विकास की राजनीति पर है, न कि मुस्लिम समर्थन पर। महागठबंधन की रणनीति साफ है – मुस्लिम वोटरों को पूरी तरह अपने पक्ष में करना। राजद, कांग्रेस और वाम दल इस मुद्दे पर एकजुट हैं। वक्फ संशोधन कानून का विरोध कर वे मुस्लिमों को यह संदेश देना चाहते हैं कि एनडीए मुस्लिम विरोधी है और महागठबंधन ही उनका असली राजनीतिक आश्रय है।बिहार की लगभग 35-40 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। सीमांचल, पटना, गया, अररिया, किशनगंज, सीतामढ़ी, मधुबनी जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता 20-40% तक हैं। यही सीटें चुनाव का रुख तय करती हैं।

    अगर, मुस्लिम वोट एकजुट होकर राजद या महागठबंधन की ओर जाते हैं तो यह एनडीए के लिए बड़ा खतरा होगा। लेकिन अगर एआईएमआईएम या जनसुराज ने इन वोटों को बांट दिया तो बीजेपी-जेडीयू को फायदा मिल सकता है। कुल मिलाकर, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 वास्तव में मुस्लिम वोटरों के लिए लिटमस टेस्ट है। वक्फ बोर्ड संशोधन कानून ने उन्हें अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को नए सिरे से परखने पर मजबूर कर दिया है। राजद को भरोसा है कि एम-वाई समीकरण इस बार पहले से अधिक मजबूत है।

    एआईएमआईएम अपनी पहचान बचाने और विस्तार करने में जुटा है। प्रशांत किशोर मुस्लिमों को नया विकल्प देना चाहते हैं। बीजेपी-जेडीयू की कोशिश है कि मुस्लिमों की नाराज़गी को विकास के मुद्दे से संतुलित किया जाए, लेकिन जमीन पर सच्चाई यही है कि मुस्लिम वोटरों का बड़ा झुकाव इस बार राजद की ओर दिख रहा है।

    एआईएमआईएम और जनसुराज को अवसर मिल सकता है, लेकिन निर्णायक शक्ति नहीं। जेडीयू और बीजेपी के लिए यह चुनाव चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वक्फ कानून और सीमांचल के सवालों ने उनकी साख पर असर डाला है। बिहार का 2025 का चुनाव सिर्फ सत्ता बदलने का चुनाव नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि मुस्लिम समाज अपनी राजनीतिक दिशा किस ओर मोड़ता है। क्या वे पारंपरिक राजद की गोद में लौटेंगे? या फिर नई राह चुनेंगे? यही है इस चुनाव का असली सवाल।

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